- भारत की भौगोलिक स्थिति हिंद महासागर के बीचों-बीच है, जो इसे रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है
- भारत तेजी से ऊर्जा बाजारों में एक प्रमुख उपभोक्ता और रिफाइनिंग क्षेत्र में बड़ी ताकत के रूप में उभर रहा है
- भारतीय नौसेना शिपिंग रूट्स की सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभा रही है और समुद्री हमलों का जवाब दे रही है
ईरान युद्ध ने समंदर की ताकत का एहसास दुनिया को करा दिया है. अब तक दुनिया भर में इस बात पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है कि सबसे अहम समुद्री 'चोकपॉइंट्स' पर किसका कंट्रोल है. खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब और मलक्का जलडमरूमध्य. ये चोकपॉइंट्स मिडिल ईस्ट के तेल-गैस मार्केट, एशिया के मैन्युफैक्चरिंग सेंटर्स और यूरोप व उत्तरी अमेरिका के कंज्यूमर मार्केट्स को आपस में जोड़ते हैं. मगर, आने वाले दशकों में सबसे अहम सवाल यह नहीं होगा कि इन रास्तों पर किसका कंट्रोल है, बल्कि यह होगा कि इन्हें खुला रखने में कौन मदद कर सकता है.
दुनिया के लिए भारत क्यों जरूरी
ठीक यहीं पर भारत की भूमिका बहुत अहम होती जा रही है. द जेरुशेलम पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल, अमेरिका और यूरोप के लिए, भारत सिर्फ आर्थिक विकास या उभरती हुई डिफेंस सुपरपावर की कहानी नहीं है. यह एक ऐसे रणनीतिक साझेदार के तौर पर उभर रहा है जो ग्लोबल समुद्री सिस्टम को मजबूत करने में सक्षम है, खासकर ऐसे समय में जब ट्रेड रूट्स, ऊर्जा सुरक्षा और जियोपॉलिटिकल स्थिरता पर भारी दबाव है. खासकर हालिया अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के बाद. दुनिया के नक्शे पर एक नजर डालते ही भारत का सबसे बड़ा फायदा साफ हो जाता है. भारत की भौगोलिक स्थिति उसकी सबसे बड़ी ताकत है. हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित भारत, मिडिल ईस्ट के ऊर्जा-उत्पादक क्षेत्रों, अफ्रीका की उभरती अर्थव्यवस्थाओं और पूर्वी एशिया के मैन्युफैक्चरिंग हब के बीच बसा है. इसकी पश्चिमी तटरेखा फारस की खाड़ी और लाल सागर को जोड़ने वाले समुद्री रास्तों के सामने है, जबकि भारत का अंडमान और निकोबार द्वीप समूह मलक्का जलडमरूमध्य तक रणनीतिक पहुंच प्रदान करते हैं, जो हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच का प्रवेश द्वार है.
भारत क्यों सबसे भरोसेमंद
भारत तेजी से खुद को एक ऐसे देश के तौर पर स्थापित कर रहा है, जो इन चुनौतियों से निपटने में सक्षम है. आर्थिक नजरिए से, भारत पहले से ही दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा बाजारों में से एक है. यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता, LNG के सबसे बड़े आयातकों में से एक और रिफाइनिंग के क्षेत्र में एक बड़ी ताकत है. भारत की मौजूदा रिफाइनिंग क्षमता लगभग 258 मिलियन मीट्रिक टन सालाना है और 2030 तक इसे बढ़ाकर लगभग 310 मिलियन टन करने की योजना है. खाड़ी देश भरोसेमंद एनर्जी मार्केट पर निर्भर हैं और भारत उनके एक्सपोर्ट के लिए सबसे बड़े और तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है. 2024-25 में भारत और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के बीच व्यापार लगभग 178 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो भारत और मध्य पूर्व के बीच आर्थिक निर्भरता की गहराई को दिखाता है. खाड़ी देशों अलावा भारत के इजरायल के साथ भी संबंध गहरे हो रहे हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ दीर्घकालिक साझेदारी है और अफ्रीका तथा यूरोप के साथ जुड़ाव बढ़ रहा है. ईरान और रूस के साथ भारत के निरंतर व्यापारिक और राजनयिक संबंध हमेशा अमेरिका और यूरोप को चिंतित तो करते हैं, लेकिन यही भारत की एक रणनीतिक ताकत भी है.
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समंदर का पहरेदार बना भारत
2008 में अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती-रोधी अभियान शुरू करने के बाद से, भारतीय नौसेना ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट को सुरक्षित करने में मदद की है, जिससे हजारों कमर्शियल जहाजों और हजारों नाविकों की सुरक्षा हुई है. 2024 में समुद्री हमलों में बढ़ोतरी के दौरान, भारत ने 30 से ज़्यादा नौसैनिक जहाज तैनात किए, कई घटनाओं पर कार्रवाई की, राष्ट्रीयता की परवाह किए बिना सैकड़ों लोगों को बचाया और अरबों डॉलर का सामान ले जा रहे कमर्शियल जहाजों को सुरक्षा प्रदान की. इसके अलावा, भारत निकोबार द्वीप समूह में मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड कर रहा है ताकि मलक्का जलडमरूमध्य के पास अपनी स्थिति मजबूत कर सके और हिंद महासागर में चीन की महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला कर सके. ये गतिविधियां एक महत्वपूर्ण सच्चाई को दर्शाती हैं कि भारत केवल वैश्विक व्यापार से लाभ नहीं उठा रहा है, बल्कि इसकी सुरक्षा में भी तेजी से योगदान दे रहा है. इजरायल, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए यह अंतर मायने रखता है. भारत की नौसेना का भी तेजी से विस्तार हो रहा है.
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