- रूस के दो लॉजिस्टिक्स सेंटरों पर यूक्रेनी ड्रोन हमले में सात लोग मारे गए और चौबीस घायल हुए हैं
- कीव ने मॉस्को के चार साल से यूक्रेन पर हमलों का बदला लेने के रूप में इन हमलों को बताया है
- अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में रूस के पोलैंड और बाल्टिक देशों पर संभावित हमलों की चेतावनी दी गई है
शनिवार को रूस में दो लॉजिस्टिक्स सेंटरों पर यूक्रेनी ड्रोन हमले में 7 लोगों की मौत हो गई और 24 लोग घायल हो गए. कीव का कहना है कि यह मॉस्को की ओर से उसके इलाके पर चार साल से ज्यादा समय से किए जा रहे हमलों का सही बदला है. ताम्बोव इलाके के गवर्नर येवगेनी पेरविशोव ने कहा कि जब दुश्मन के UAV ने वाइल्डबेरीज लॉजिस्टिक्स सेंटर पर हमला किया, तो नाइट-शिफ्ट में काम करने वाले सात कर्मचारियों की मौत हो गई. उन्होंने आगे कहा कि शुरुआती जानकारी के मुताबिक, कोटोव्स्क शहर में हुए इस हमले में 24 लोग घायल हुए हैं.
रूस कहां रुकने का इरादा रखता है?
यूक्रेन समय-समय पर अब रूस में बड़े हमले करने लगा है. लेकिन ये भी है कि वो खुद जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है. जेलेंस्की के खिलाफ धीरे-धीरे उनके ही देश के होने लगे हैं. और अब बात यूक्रेन की सीमाओं से परे नाटो की सीमा तक जा पहुंची है. यूक्रेन के साथ-साथ बेलारूस और रूस के कालिनिनग्राद इलाके के जरिए पोलैंड की भी सीमा लगती है. पोलैंड लंबे समय तक दुनिया के नक्शे से गायब रहा. उसके टुकड़े कर दिए गए और आस-पास के साम्राज्यों ने उस पर कब्जा कर लिया. वह इतिहास कभी पूरी तरह से बीती बात नहीं बना, और यूक्रेन युद्ध ने उसे फिर से सामने ला खड़ा किया है. यह एक चेतावनी है, जिसने पोलैंड को एक ऐसे सवाल का सामना करने पर मजबूर कर दिया जिसे उसने पीछे छोड़ दिया था: रूस की महत्वाकांक्षा असल में कितनी बड़ी है—और मॉस्को कहां रुकने का इरादा रखता है?

पोलैंड पर क्यों खतरा
इसी वजह से पोलैंड की जनता और अधिकारियों ने इस महीने की शुरुआत में आई अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट को इतनी गंभीरता से लिया है. रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि रूस आने वाले महीनों में पोलैंड को निशाना बना सकता है, जो NATO की 'रेड लाइन्स' (सीमाओं) को परखने की उसकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है. पोलैंड सोवियत प्रभाव से बाहर निकलने के बाद से ही रूसी हमले या कब्जे से डरता रहा है. यही डर पश्चिमी गठबंधन में शामिल होने की उसकी उत्सुकता का मुख्य कारण था. हालांकि, पोलैंड अकेला नहीं है. NATO के सूत्रों ने पहले ही बाल्टिक देशों को निशाना बनाने के रूस के इरादों के बारे में चेतावनी दी है. हालांकि रूसी ड्रोन कई बार यूरोपीय हवाई क्षेत्र का उल्लंघन कर चुके हैं, लेकिन पोलैंड और बाल्टिक देशों में चिंता का स्तर कहीं ज्यादा है. इसने इन देशों को अपनी सुरक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रेरित किया है.
क्या है अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट
अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट में साफ तौर पर युद्ध या हमले की बात नहीं कही गई, बल्कि इसमें ठिकानों को सीधे निशाना बनाने और कलिनिनग्राद या सहयोगी बेलारूस के जरिए रूसी सेना की तैनाती की संभावना का जिक्र है. सभी पक्ष यह समझते हैं कि यह टकराव अब पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं है. यह हाइब्रिड रूप ले सकता है, जिसमें ड्रोन, विस्फोटक पैकेज या साइबर हमले शामिल हो सकते हैं. सबसे बुरे हालात की आशंका इसलिए भी सच लग सकती है क्योंकि रूस अराजकता का दायरा बढ़ाने की रणनीति अपना सकता है. मतलब युद्ध ना करके युद्ध जैसी स्थिति बना देना. ईरान ने अमेरिका-इजरायल के साथ टकराव के दौरान इस रणनीति का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया है. उसने कई दिशाओं में हमले किए और होर्मुज जलडमरूमध्य में नेविगेशन में बाधा डाली, जिससे उसकी बातचीत की स्थिति मजबूत हुई. इसका मकसद युद्ध से प्रभावित होने वाले लोगों का दायरा बढ़ाना था.
रूस क्यों करेगा ऐसा
यहां रूस का तर्क ईरान जैसा ही है. कोई भी पड़ोसी देश जो उसका समर्थन नहीं करता, उसे इसमें शामिल माना जाता है. मॉस्को अब अपने अभियान को विशेष सैन्य अभियान नहीं कहता, बल्कि खुले तौर पर इसे युद्ध कहता है. दोनों देशों के बीच एक दिलचस्प समानता यह है कि रूस ने पहले भी यूरोप के खिलाफ खासकर पोलैंड के लिए बाल्टिक सागर के जलडमरूमध्य का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया है. आज, हाल के हफ्तों में रूस के संवेदनशील ठिकानों पर ड्रोन हमलों के बाद, मॉस्को खुद को पूरे यूरोप महाद्वीप के सामने खड़ा पाता है, जो यूक्रेन को हथियार, पैसा और लॉजिस्टिकल मदद दे रहा है.

रूस हारा तो भी खतरनाक
इस मदद के बिना, यूक्रेन न तो दबाव झेल पाता और न ही जबरदस्त जवाबी हमले कर पाता. रूस की नजर में, इस सीधी भागीदारी की वजह से यूरोपीय देश सिर्फ हमदर्द नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार बन गए हैं, जो देश इसमें सबसे ज्यादा शामिल हैं, उन्हें तो सीधे तौर पर दुश्मन माना जाता है. इन घटनाओं से रूस को दुश्मन और खतरे के तौर पर देखने वाली यूरोप की सोच और मजबूत हुई है. यह सोच मौजूदा युद्ध से भी पहले की है और युद्ध खत्म होने पर भी खत्म नहीं होगी. हमेशा से यह माना जाता रहा है कि एक मजबूत रूस खतरनाक है, और कमजोर रूस भी उतना ही खतरनाक. यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में इस गंभीर बात का मतलब है कि अगर रूस जीतता है, तो वह रुकेगा नहीं; अगर वह हारता है, तो उसका मुख्य मकसद बदला लेना होगा. सबसे बड़ी बात ये है कि अब अमेरिका की भी गारंटी नहीं है कि वो रूस को रोकने आएगा या नहीं. दूसरी बात ये कि क्या रूस सिर्फ पोलैंड या बाल्टिक देशों तक आकर रुक जाएगा या खतरा और बड़ा है.
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