क्या किसी को गाली देना भी 'अश्लीलता' के दायरे में आता है? सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में इसे लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सिर्फ गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल, चाहे वह कितनी भी बुरी या असभ्य क्यों न हो, उसे अश्लीलता नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने साफ किया कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अश्लीलता का अपराध नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कानून की नजर में अश्लीलता, अभद्रता और गाली-गलौज से अलग है. कोर्ट ने कहा कि अश्लीलता साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि शब्द कामुक हों, वासना जगाने वाले हों और लोगों को बिगाड़ने या भ्रष्ट करने की क्षमता रखते हों.
जमीन विवाद से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की बेंच ने गाली-गलौज और अश्लीलता के बीच के अंतर को साफ किया.
क्या था पूरा मामला?
ये पूरा मामला 70 साल के एक बुजुर्ग की अपील से जुड़ा था. आरोप था कि अगस्त 2017 में जमीन विवाद को लेकर हुई बहस के दौरान बुजुर्ग ने सामने वाले को भद्दी गालियां दीं और उस पर दरांती से हमला किया, जिससे उसे कई चोटें आईं और नाक की हड्डी टूट गई.
ट्रायल कोर्ट ने बुजुर्ग को कई धाराओं के तहत दोषी ठहराया. मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने उसे IPC की धारा 294 (b) (सार्वजनिक जगह पर अश्लील भाषा का इस्तेमाल करना), 326 और 506 (ii) के तहत दोषी ठहराया.
इसके बाद बुजुर्ग ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने उसे धारा 294(b) और 506(ii) (आपराधिक धमकी) के तहत मिली सजा को रद्द कर दिया, लेकिन धारा 326 (जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत उसकी सजा को बरकरार रखा. कोर्ट ने उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है.
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गाली क्यों नहीं है अश्लीलता?
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गाली और अश्लीलता के बीच के अंतर को साफ किया. कोर्ट ने कहा कि धारा 294 के तहत अश्लीलता को साबित करने के लिए दो चीजें जरूरी हैं: पहला- वह शब्द किसी सार्वजनिक जगह पर कहे गए हों और दूसरी- ऐसे शब्दों को दूसरों को परेशानी या झुंझलाहट हो.
कोर्ट ने साफ किया कि जो शब्द सिर्फ गाली-गलौज वाले या अपमानजनक होते हैं, उनसे नफरत हो सकती है या सदमा लग सकता है लेकिन सिर्फ इसी कारण वे शब्द कानून की नजर में 'अश्लील' नहीं हो जाते.
कोर्ट ने कई पुराने अदालती फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि 1965 में एक मामले में संवैधानिक बेंच ने साफ कर दिया था कि अश्लीलता ऐसा कॉन्टेंट है जो लोगों की सोच को 'बिगाड़ और भ्रष्ट' कर सकती है. बेंच ने 1985 के मामले का हवाला देते हुए कहा कि भद्दी भाषा से घृणा तो हो सकती है लेकिन जरूरी नहीं कि इसका असर लोगों को बिगाड़ने वाला हो.
अदालत ने कई मामलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर गाली-गलौज या भद्दी भाषा में कामुक या यौन रूप से बिगाड़ने वाली कोई चीज न हो तो वह 'अश्लीलता' नहीं मानी जाती.
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