अक्सर कहा जाता है कि ऊपर वाले की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, लेकिन हमारा सरकारी सिस्टम मानो ईश्वर से भी दो कदम आगे है. यहां सिस्टम चाहे तो जिंदा इंसान को कागजों पर मृत घोषित कर दे, और आप अपनी छाती पीटते रह जाएं कि “हुजूर, मैं जिंदा हूं!”
कानपुर के नरवल तहसील के बांबी गांव से ऐसा ही एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है, जो सिस्टम की संवेदनहीनता की पोल खोल देता है. यहां एक लाचार पिता अपने जीवित बेटे को “जिंदा” साबित करने के लिए तहसील की चौखट पर एड़ियां घिस रहा है.
इसी साल हुआ आयांश का जन्म
बांबी गांव के निवासी जितेंद्र कुमार के घर 9 जनवरी 2026 को किलकारियां गूंजीं. बेटे का जन्म हुआ और उसका नाम आयांश रखा गया. पिता खुशी-खुशी अपने कलेजे के टुकड़े का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए डिजिटल प्रक्रिया पूरी करने लगे. उन्हें क्या पता था कि सिस्टम उनकी खुशियों पर इस तरह पानी फेर देगा. 24 फरवरी 2026 को जब प्रमाण पत्र हाथ में आया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. जो बेटा घर में दूध पी रहा था, उसी का सरकारी रिकॉर्ड में मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया था.
साइबर कैफे-आवेदक को ठहराया जिम्मेदार
जितेंद्र कुमार का कहना है, “साहब, बेटा गोद में खेल रहा है और अफसर कह रहे हैं कि वह मर चुका है. मैं तहसील से लेकर ब्लॉक तक चक्कर काट रहा हूं, लेकिन मेरी कोई सुनवाई नहीं हो रही.” जब इस बड़ी लापरवाही पर बांबी पंचायत के वर्तमान सचिव जुबैर अहमद से सवाल किया गया, तो उन्होंने इसकी जिम्मेदारी साइबर कैफे और आवेदक पर डाल दी. उनका कहना है कि आवेदन करते समय गलती से ‘जन्म' की जगह ‘मृत्यु' का विकल्प चुन लिया गया होगा. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला पिछले पंचायत सचिव के समय का है, उनका इससे कोई लेना-देना नहीं है.
यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. इस संबंध में बातचीत के दौरान पंचायत सचिव जुबैर अहमद ने पुष्टि की कि अब संबंधित पिता को नया जन्म प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है. सवाल यह उठता है कि क्या ग्राम पंचायत अधिकारी और सचिव का काम केवल आंखें मूंदकर डिजिटल हस्ताक्षर करना है? क्या एक महीने के बच्चे का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने से पहले किसी तरह की जांच की आवश्यकता नहीं समझी गई?
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