- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय तक चलने वाले शारीरिक संबंध रेप नहीं
- कोर्ट ने आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत दी और पुलिस जांच में सहयोग करने का आदेश दिया है
- जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की सिंगल बेंच ने इस मामले में अहम आदेश पारित किया है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित रेप केस में एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर करते हुए एक अहम आदेश दिय. अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय तक चलने वाले शारीरिक संबंध को रेप नहीं कहा जा सकता. कोर्ट ने आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि वह पुलिस जांच में सहयोग करेगा. यह आदेश जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की सिंगल बेंच ने दिया है.
मामले के अनुसार आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया जब मामले में कथित पीड़िता जो एक विधवा थी उसने उसके खिलाफ बीएनएस की अलग-अलग धाराओं के तहत FIR दर्ज कराई. आरोपी याचिकाकर्ता ने आजमगढ़ के सिधारी थाने में बीएनएस की धारा 64, 115(2) और 351(3) के तहत एफआईआर दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करते हुए कोर्ट से अग्रिम जमानत देने की मांग की थी.
पीड़िता एक विधवा है, उसका 15 साल का बेटा है
कोर्ट में याची के वकील ने कहा कि याची को इस मामले में झूठा फंसाया गया है. पीड़ित जो एक विधवा है और उसका 15 साल का बेटा है उसने BNSS की धारा 173(4) के तहत एक एप्लीकेशन के आधार पर याची के खिलाफ झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई है. BNSS की धारा 183 के तहत दर्ज किया गया बयान FIR में बताई गई कहानी से बिल्कुल अलग है. धारा 183 के तहत दर्ज बयान में आपसी सहमति से संबंध दिखाया गया है और याचिकाकर्ता के खिलाफ BNS की धारा 64(1) के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। याची का कोई क्रिमिनल इतिहास नहीं है.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि मामले में महिला ने दावा किया कि उसने 2022 से याचिकाकर्ता से बात करना शुरू किया था. हालांकि कोर्ट में सरकार की तरफ से अग्रिम जमानत याचिका का विरोध किया गया. कहा गया कि याची इस मामले में अकेला नामजद आरोपी है. उसने पीड़िता का फायदा उठाते हुए बंदूक की नोक पर उसके साथ जबरदस्ती की और उसके साथ रेप किया.
सहमति से बालिगों के बीच फिजिकल रिलेशन रेप नहीं
सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि FIR में यह नहीं बताया गया कि पीड़िता और याचिकाकर्ता के बीच सहमति से रिश्ता था. BNSS 183 के तहत दर्ज बयान में पीड़िता का दावा है कि उसने साल 2022 से याची से फोन पर बात करना शुरू कर दिया था और उसके साथ शारीरिक संबंध भी बनाए थे.वह लगभग 35 साल की विधवा है जिसका एक 15 साल का बेटा है. सभी तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे फिजिकल रिलेशन को रेप नहीं कहा जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि जहां तक इस घटना का सवाल है जिसमें याची के बारे में कहा गया है कि उसने बंदूक की नोक पर पीड़िता के साथ रेप किया कोर्ट की राय में यह BNSS की धारा 183के तहत दर्ज बयान में बताई गई कहानी से मेल नहीं खाती. कोर्ट ने माना कि BNSS की धारा 183 के तहत दर्ज बयान में याची और पीड़िता के प्रेम संबंध का पता चलता है. मेडिकल जांच के दौरान भी डॉक्टर को दिए गए बयान में पीड़िता और याचिकाकर्ता के 2024 से रिश्ते में होने की बात कही गई है.
कोर्ट ने अग्रिम ज़मानत अर्जी मंजूर की
यहां तक कि याची की पत्नी ने भी पीड़िता को फ़ोन करके बताया कि याची के कई रिश्ते रहे है जिसके बाद उसने याची से सभी तरह का संपर्क बंद कर दिया और उसके बाद अक्टूबर 2025 को याची ने पीड़िता के साथ रेप किया. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि BNSS की धारा 173(4) के तहत एक आवेदन के आधार पर दर्ज की गई FIR में इन डिटेल्स का न होना कोर्ट की राय में प्रथम दृष्टया पूरी प्रॉसिक्यूशन कहानी पर शक पैदा करता है. याची का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. कोर्ट ने मामले के सभी तथ्यों और हालात को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता की अग्रिम ज़मानत अर्जी मंजूर कर ली.
बता दें कि कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने बिना शादी के साथ रह रहे जोड़े को लेकर भी कुछ ऐसी ही टिप्पणी की थी. अदालत ने कहा था कि अगर संबंध सहमति से बने और बाद में दोनों अलग हो गए, तो इसे रेप नहीं माना जा सकता. मामले में महिला ने अपने लिव इन पार्टनर पर शादी का झूठा वादा करके रेप करने का आरोप लगाया था.जबकि दोनों लंबे समय से साथ रह रहे थे और दोनों का एक बच्चा भी है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सवाल उठाया कि महिला शादी से पहले आरोपी के साथ क्यों रहने लगी थी?
सहमति थी तो रेप कैसे?
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अगर संबंध सहमति से बना और दोनों लंबे समय तक साथ रहे, तो बाद में अलग होने पर इसे आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि ऐसे 'लिव-इन रिलेशनशिप' में अक्सर यह हालात बनते हैं कि संबंध टूटने के बाद महिला द्वारा रेप का आरोप लगाया जाता है, जबकि संबंध पहले सहमति से था. महिला के वकील ने कहा कि उसे नहीं पता था कि आदमी पहले से शादीशुदा है. उसकी 4 पत्नियां हैं, वह औरतों का शोषण कर रहा है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हमें दूसरी महिला से कोई मतलब नहीं है. हमें याचिकाकर्ता से मतलब है. जब सहमति से रिश्ता होता है, तो अपराध का सवाल ही कहां उठता है? अब ऐसा ही मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट से भी सामने आया है. अदालत ने भी कुछ ऐसी ही टिप्पणी की है.
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