ये वीडियो में जो आप आंसू देख रहे हैं, वह किसी गम के नहीं बल्कि खुशी के आंसू हैं. 24 साल के लंबे इंतजार के बाद अपने देश को एशियन गेम्स का मेडल दिलाने वाली इस खिलाड़ी के लिए यह पल किसी सपने के सच होने से कम नहीं था. जैसे ही पदक उनके गले में पड़ा, उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े. यह उन सालों के संघर्ष, मेहनत और मुश्किल हालातों के खिलाफ मिली जीत का भावुक नजारा था. ये इमोशनल कहानी अफगानी महिला साईक्लिस्ट फरीबा हाशिमी की है जिन्होंने महिलाओं की व्यक्तिगत रोड रेस में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया. फरीबा साल 2002 के बाद एशियन गेम्स में मेडल जीतने वाली पहली अफगानिस्तान की महिला खिलाड़ी बन गई.
लड़की से लड़का बनकर ट्रेनिंग करती थीं
फरीबा हाशमी के लिए, साइकिल चलाना कभी सिर्फ एक खेल नहीं था, अफगानिस्तान के उत्तरी फर्याब प्रांत में फरीबा रहते हुए, उन्हें ट्रेनिंग के लिए अपनी पहचान छिपानी पड़ती थी, उन्होंने और उनकी बहन युल्डुज ने एक पड़ोसी की साइकिल उधार ली, 2017 में अपनी पहली रेस में हिस्सा लिया और हेडस्कार्फ, मास्क और धूप के चश्मे पहनकर अपनी पहचान छिपाई, फरीबा ने वह पहली रेस जीती. 9 साल बाद, 23 साल की फरीबा एक ओलंपियन और इटली में रहने वाली प्रोफेशनल साइक्लिस्ट हैं.

पत्थर और बोतलें फेंकी गईं, फिर भी नहीं टूटा हौसला
जैसे-जैसे फरीबा साइकिलिंग करती गईं, वे ऐसी जगहों पर लोगों का ध्यान खींचने लगीं जहां महिलाओं का साइकिल चलाना आम बात नहीं थी. हाशिमी ने बताया है कि ट्रेनिंग के दौरान वे अक्सर पुरुषों के कपड़े पहनती थीं, कभी-कभी बहनें नकली पहचान के साथ भी रेस में हिस्सा लेती थीं, उन्हें बदसलूकी, निगरानी और पत्थर और बोतल फेंककर किए गए हमलों का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी ट्रेनिंग और भी मुश्किल हो गई.
हाशिमी ने एक घटना का ज़िक्र करते हुए बताया कि साइकिलिंग के दौरान एक रिक्शा चालक ने युल्डुज़ को टक्कर मार दी, जिससे उनकी कलाई टूट गई. रेस से पहले हाशिमी के पिता भी उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे, उन्होंने बताया कि उनके पिता साइकिलिंग का समर्थन तो करते थे, लेकिन उन्हें डर रहता था कि कहीं उनकी जान न चली जाए. साल 2021 में हालात पूरी तरह बदल गए, जब अफ़गानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी हुई. आखिरकार हाशिमी ने देश छोड़ दिया और इटली चली गईं.
हाशिमी की कहानी सिर्फ साइक्लिंग में मेडल जीतने के बारे में नहीं है...
अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति कितनी मुश्किल?
तालिबान के शासन में अफगानिस्तान में लड़कियों के हालात बेहद मुश्किल बने हुए है. 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से, तालिबान ने लड़कियों की शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी पर कड़ी पाबंदियां लगा दी हैं, अफग़निस्तान अभी दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों को सेकेंडरी और हायर एजुकेशन से औपचारिक रूप से रोका गया है. लाखों लड़कियां प्राइमरी लेवल से आगे स्कूल नहीं जा पाई हैं, जिससे उनके मौके और भविष्य की संभावनाएं सीमित हो गई हैं.
शिक्षा से जुड़ी पाबंदियों के अलावा, कई महिलाओं और लड़कियों को नौकरी, यात्रा और सार्वजनिक जगहों पर जाने पर भी पाबंदियों का सामना करना पड़ता है. यूनेस्को और यूनिसेफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने चेतावनी दी है कि इन नीतियों के देश पर लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक असर पड़ सकते हैं.
इन चुनौतियों के बावजूद, अफगान लड़कियां जबरदस्त हिम्मत और सहनशक्ति दिखा रही हैं. कुछ लड़कियां अनौपचारिक नेटवर्क और कम्युनिटी की कोशिशों से सीख रही हैं, जबकि कुछ को मौका मिलने पर खेल और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बेहतरीन प्रदर्शन करते देखा गया है. उनकी कामयाबियां अक्सर बड़ी मुश्किलों के बावजूद उम्मीद और दृढ़ संकल्प की मिसाल बनती हैं.
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