जापान में खेले जा रहे एशियन खेलों में अगर मंगलवार का दिन के हीरो टीम हरमनप्रीत कौर थी, तो बुधवार को यही आकर्षण वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने अपने इर्द-गिर्द समेट लिया. निश्चित तौर पर एशियाई खेलों में 1998 के बाद आए पदक ने करोड़ों भारतीय खेलप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया. पिछले करीब ढाई दशक में भारत इस खेल में पदक जीतने के लिए तरस कर रह गया था. और जब मीराबाई ने सूखा खत्म किया, तो वह एक बार फिर से साल 2020 में टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक जीतने से बाद फिर से सुर्खियों में आ गईं. वह मीरबाई चानू जिनकी फर्श से अर्श तक पहुंचने की कहानी बाकी एथलीटों की तुलना में कहीं ज्यादा त्याग, अभाव और संघर्ष से भरी रही है. चलिए कदम-दर कदम जानिए.
We are so proud of our @mirabai_chanu who is making India proud time and again in Weightlifting events 🇮🇳 https://t.co/Ujl2DnqNkX pic.twitter.com/VPkVYxW7h6
— Kiren Rijiju (@KirenRijiju) September 23, 2026
पालने में ही दिख गए थे मीराबाई के पांव'
जब बात वजन उठाने की आती है, तो अगर मीरबाई को नैसर्गिक प्रतिभा का धनी कह दिया जाए, तो गलत नहीं होगा. सबसे पहले उनकी मां ने उनके टैलेंट को पहचाना क्योंकि वह 12 साल की उम्र में जंगल से लकड़ी के भारी-भरकम कट्ठर आसान से उठा कर घर ले आती थीं. उनकी इस असाधारण शारीरिक क्षमता को देखकर उनकी मां ने महसूस किया कि उनके भीतर खेलों (खासकर ताकत वाले खेलों) के लिए खास प्रतिभा है. इसके बाद उनकी मां ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.शुरुआत में उनका रुछान तीरंदाजी की ओर था, लेकिन बाद में उन्होंने वेटलिफ्टर कुंजुरानी से प्रेरित होकर वेटलिफ्टिंग को करियर चुना

गरीब माता-पिता, संघर्ष ही संघर्ष
एक तरफ मीराबाई का टैलेंट था, तो दूसरी तरफ उनके पिता की गरीबी और संसाधनों का अभाव. चानू के पिता साइखोम कृति सिंह PWD में निचले स्तर के कर्मचारी थे, जबकि माता साइखोम ओंगबी तोम्बी देवी एक छोटी सी दुकान चलाती थीं. छह भाई-बहनों में सबसे छोटी मीराबाई के सपनों के लिए उनके माता-पिता ने बेहद सीमित संसाधनों में भी हमेशा बेटी को वह हर संभव सहयोग किया, जो वे सीमित संसाधनों के साथ कर सकते थे.
शुरुआत से ही करना पड़ा कड़ा संघर्ष
मीराबाई ने खेल चुना, तो शुरुआत से ही सपनों को साकार करने के लिए जरूरत से ज्यादा लोहे के चने चबाने पड़े. उनके घर से ट्रेनिंग सेंटर करीब 22 किमी दूर था. ऐसे में हर रोज जाने का किराया न होने के कारण चानू रेत-बालू ले जाने वाले ट्रक ड्राइवरों से लिफ्ट मांगकर रोज ट्रेनिंग के लिए जाती थीं. वहीं खेल के लिए जरूरी महंगे प्रोटीन डाइट और पेशेवर वेटलिफ्टिंग उपकरण खरीदने के लिए परिवार के पास पैसे नहीं थे, जिसकी वजह से उन्होंने साधारम जूतों में अभ्यास करना पड़ा.
नाकामी ने डिप्रेशन में पहुंचाया, पर नहीं ही टूटा जज्बा
हर दिन और सालों-साल कड़े अभ्यास के बीच मीरबाई को करियर में खासा संघर्ष भी करना पड़ा. साल 2016 के रियो ओलंपिक की नाकामी चानू को ऐसी चुभी कि वह डिप्रेशन में चली गईं, लेकिन इससे उबरते हुए फिर से एक बार उन्होंने खुद को तैयार किया. पीठ और कलाई की गंभीर चोटों तथा 2023 एशियाई खेलों में पदक चूकने के दर्द से जूझते हुए उन्होंने वापसी की. अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने सालों तक घर-परिवार, त्योहारों और शादी-समारोहों से दूर रहने का बड़ा त्याग किया.

अमेरिका में अज्ञात फिजियोथेरेपिस्ट से इलाज का टर्निंग प्वाइंट
साल 2020 में कोविड महामारी के दौरान मीराबाई के बैक (पीठ) और कंधे में गंभीर समस्या पैदा हो गई थी, जिससे उनका स्क्वैट और लिफ्टिंग मूवमेंट पूरी तरह प्रभावित हो गया था. लेकिन भारत में कई डॉक्टरों से इलाज के बाद भी समस्या बनी रही. इसके बाद पूर्व एथलीट और भारतीय ओलंपिक संघ की मदद से उन्हें अमेरिका के मियामी भेजा गया, जहां प्रसिद्ध फिजिकल थेरेपिस्ट डा. एरॉन हार्शग ने महज कुछ हफ्तों में उनके शरीर के बायोमैकेनिक्स को ठीक कर दिया. यही वह टर्निंग प्वाइंट था जिसने उन्हें ओलंपिक पदक के लायक बनाया.
ट्रक ड्राइवरों का 'ऋण' और 150 चालकों को भोजन
बचपन में नोंगपोक काकचिंग गांव से इंफाल तक रोजाना 22 किलोमीटर जाने-आने के पैसे न होने पर बालू-रेत ले जाने वाले ट्रक ड्राइवर उन्हें सुबह 5 बजे रास्ते में लिफ्ट दिया करते थे. इस दौरान ड्राइवर उन्हें केबिन में बिठाते और कभी-कभी रास्ते में चाय-नाश्ता भी कराते. टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक जीतने के बाद जब वे अपने गांव लौटीं, तो उन्होंने सबसे पहले उन 150 से अधिक ट्रक ड्राइवरों की खोज की जिन्होंने बचपन में उनकी मदद की थी. उन्होंने सभी को अपने घर बुलाकर पैर छूकर आशीर्वाद लिया, नए कपड़े (शॉल) दिए और एक भव्य दावत दी.
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