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2 फिर 4 किलो की रणनीति! ऐसे कब्जाया मीराबाई ने रजत पर कब्जा, जानें क्यों नहीं पड़ी तीसरे प्रयास की जरूरत

यह एशियाई खेलों में साल 1998 के बाद पहला मौका रहा, जब किसी भारतीय वेटलिफ्टर ने एशियाई खेलों में पदक जीता है

2 फिर 4 किलो की रणनीति! ऐसे कब्जाया मीराबाई ने रजत पर कब्जा, जानें क्यों नहीं पड़ी तीसरे प्रयास की जरूरत
एशियन गेम्स के चौथे दिन भारत को रजत दिलाने वालीं मीराबाई चानू
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जापान में एशियाई खेलों में बुधवार को चौथे दिन खेल शुरू होने से पहले ही तमाम खेलप्रेमियों के बीच सबसे ज्यादा  चर्चा वेटलिफ्टर मीराबाई चानू को ही लेकर थी. हालांकि, सुबह के सीजन में अलग-अलग स्पर्धाओं में तीन पदक आ चुके थे, लेकिन मीराबाई अलग ही पहलू से चर्चा का विषय बनी हुई थीं. और यह विषय था साल 1998 के बाद से एशियन खेलों में वेटलिफ्टिंग में भारत का सूखा. आम से लेकर खास तक और मीडिया में भी यही चर्चा थी कि यह सूखा खत्म होगा या नहीं, लेकिन मीरबाई चानू ने उम्मीदों पर पूरी तरह खरे उतरते हुए सूखा खत्म करते हुए इतिहास भी रच दिया. एक समय मीराबाई आखिरी पलों में उस स्थिति में पहुंच गईं, जहां उन्हें क्लीन एंड जर्क कैटेगिरी में तीसरे प्रयास की जरूरत ही नहीं पड़ी. चलिए डिटेल से जानिए कि एशियाई खेलों में 28 साल के सूखे को खत्म करने के लिए मीराबाई चानू ने क्या रणनीति अपनाई, कैसे उन्होंने क्लीन एंड जर्क वर्ग में इंट्री के बाद रणनीति बदली और क्यों इस वर्ग में तीसरे प्रयास से पहले ही उनका रजत पदक पक्का हो गया!

स्नैच वर्ग में रहा यह स्कोर: दो-दो किलो की रणनीति

मीराबाई चानू ने रणनीतिक रूप से स्नैच कैटेगिरी में ज्यादा वजन पर जोर नहीं दिया. और वह प्लानिंग के तहत ही आगे बढ़ीं. मिले तीन प्रयासों में मीराबाई ने हर प्रयास में दो किलो वजन बढ़ाने की रणनीति बनाई.इसके तहत उन्होंने तीनों प्रयास में क्रमश: 83, 85 और 87 किग्रा भार वर्ग वजन उठाया. और वह अधिकतम 87 किग्रा के साथ साथ दूसरे नंबर पर रहीं. 

इसलिए अपनाई क्लीन एंड जर्क में 4 किलो की रणनीति

जाहिर है कि क्लीन एंड जर्क वर्ग में खिलाड़ी ज्यादा भार उठाता है.  इस कैटेगिरी की  शुरुआत मीराबाई ने 107 किग्रा भार वजन के साथ पहले ही सफल प्रयास से की, तो दूसरे प्रयास में उन्होंने रणनीति रूप से चार किलोग्राम भार वजन का इजाफा करते हुए 111 किलो वजन उठाया.

चानू ने सिर्फ 4 किलो रणनीति  इस वजह से अपनाई क्योंकि तीसरे नंबर पर रहीं इंडोनेशिया की विजानया लुलुक डायना 103 किग्रा के वजन के साथ अपने पहले ही प्रयास में नाकाम हो गईं.

यही वजह रही कि मीराबाई चानू ने डायना की पहले प्रयास की नाकामी को देखते हुए पहले प्रयास के बाद ज्यादा नहीं, बल्कि वेट में सिर्फ 4 किलो का ही इजाफा किया. 

तीसरी कोशिश की जरूरत ही नहीं पड़ी

वास्तव में एक तरफ मीरबाई दूसरी कोशिश के साथ ही पदक अपने खाते में जमा कर चुकी थीं. और इस पर इंडोनेशिया की विजायना की तीसरे प्रयास की नाकामी ने पूरी तरह मुहर लगा दी. डायना दूसरे प्रयास में जरूर 103 किलो वजन उठाने में सफल रहीं, लेकिन तीसरे प्रयास में वह 107 किग्रा वजन उठाने में नाकाम रहीं. और इसी के साथ ही डायना का कुल स्कोर मीराबाई से 7  किलो पीछे रह गया. इस स्टेज तक मीराबाई 198 के साथ दूसरे और डायना 191 के साथ तीसरे नंबर बनी हुई थी, तो बाकी खिलाड़ी पूरी तरह रेस से बाहर हो चुके थे.  ऐसे में मीराबाई चानू के लिए क्लीन एंड जर्क में तीसरे प्रयास के कोई मायने नहीं थे. यह पूरी तरह अप्रासंगिक हो गया. चानू ने तीसरा प्रयास नहीं ही करने का निर्णय लिया क्योंकि रजत पदक पहले ही उनके खाते में जमा हो चुका था. 

..और मीराबाई ने रच दिया इतिहास

आप सोचिए कि जो खिलाड़ी खाते में ओलंपिक खेलों में पदक जमा कर चुका हो, लेकिन एशियाई खेलों में झोली खाली हो, तो उस पर कैसी बीतेगी. उम्र के 33वें साल में यह मीराबाई के लिए आखिरी एशियाड था और दिमाग और दिल पर सालों से पल रहे बोझ के दबाव और चुनौती दोनों के ही साथ मीराबाई चानू एशियाड में उतरी थी.

साल 2014 में चानू ने पहली बार इंचियॉन संस्करण में पहली बार हिस्सा लिया था. तब वह नौवें नंबर पर रहीं. साल 2018 में उन्होंने कमर की चोट ने खेलों से बाहर रहने पर मजबूर किया, तो साल 2023 में  इवेंट के दौरान जांघ में चोट के कारण वह चौथे नंबर पर रहीं. इन्हीं तमाम बातों ने मीराबाई के मन के बोझ को और बढ़ा दिया था, लेकिन इस बार आइची नागोया में मीराबाई ने इतिहास रचते हुए अभी तक रहे सूखे को खत्म करने के साथ ही पदक कब्जाते हुए इतिहास रच दिया

28 साल पहले आया था रजत

भारत के लिए एशियाई खेलों में आखिरी पदक साल 1998 में बैंकाक में हुए संस्करण में आया था. तब ओलिंपिक कांस्य पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी ने 63 किग्रा भार वर्ग में रजत पदक जीता था. और उसके बाद से पिछले छह संस्करणों में भारत इस खेल में पदक के लिए तरस गया था लेकिन साल 1998 के बाद अब आइची नागोया में मीराबाई चानू ने इस सूखे को खत्म कर दिया.

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