राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में इस बार दोनों ही प्रमुख दलों - भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस - में टिकट वितरण को लेकर असंतोष का माहौल रहा. पार्टी के उम्मीदवार चयन के फैसले से नाराज होकर दोनों ही पार्टियों में बहुत बड़ी संख्या में बागी उम्मीदवार मैदान में उतर गए हैं. ये नाराज भाजपा और कांग्रेस के हजारों नेता और कार्यकर्ता निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अब भी मैदान में डटे हुए हैं. अनुमान के मुताबिक भाजपा के करीब 9 हजार और कांग्रेस के 8 हजार से ज्यादा बागी चुनाव मैदान में थे. हालांकि, नाम वापसी के बाद अब अधिकृत आंकड़े का इंतजार है.
टिकट वितरण के बाद सामने आई बगावत पर अब भाजपा और कांग्रेस दोनों ने सख्त रुख अपना लिया है. नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पार्टियों ने साफ कर दिया है कि अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव मैदान में डटे बागियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी.
कांग्रेस की कार्रवाई की चेतावनी
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा,"चुनाव लड़ना हर व्यक्ति का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन पार्टी का जिम्मेदार पदाधिकारी या कार्यकर्ता पार्टी लाइन तोड़कर अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ता है तो कार्रवाई तय है. बागियों को समझाने के लिए पार्टी स्तर पर हरसंभव प्रयास किए गए हैं. अब पार्टी लाइन के खिलाफ चुनाव लड़ने वालों पर अनुशासन समिति फैसला करेगी."
डोटासरा ने दावा किया कि निकाय चुनाव में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में सबसे ज्यादा जोश और उत्साह है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने सबसे ज्यादा टिकट बांटे हैं और चुनाव के बाद सबसे ज्यादा बोर्ड भी कांग्रेस के ही बनेंगे.
भाजपा ने भी बागियों को दिया अल्टीमेटम
उधर भाजपा ने भी बागियों को मनाने की कोशिशों के बाद अब कार्रवाई का संकेत दिया है. भाजपा महामंत्री श्रवण सिंह बगड़ी ने कहा कि अधिकतर बागियों को मना लिया गया है. जो अभी भी पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
भाजपा नेताओं ने बागियों को मनाने के लिए फोन और व्यक्तिगत संपर्क किए. प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत की. पार्टी का दावा है कि बड़ी संख्या में बागियों ने नाम वापस ले लिए हैं या अधिकृत प्रत्याशी के समर्थन में आने पर सहमति जताई है.
त्रिकोणीय मुकाबला
श्रीगंगानगर, बालोतरा, जैसलमेर, बाड़मेर और कोटपूतली सहित कई निकायों में बागियों ने दोनों प्रमुख दलों का चुनावी गणित बिगाड़ दिया है. कई वार्डों में मुकाबला अब सीधे भाजपा-कांग्रेस के बीच न रहकर त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो गया है.
अब दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बागियों को साधने के साथ-साथ उनके प्रभाव वाले वार्डों में अधिकृत प्रत्याशियों को मजबूत करने की है. पार्टी नेतृत्व की नजर खासतौर पर उन बागियों पर है, जो संगठन में पहले से जिम्मेदार पदों पर रहे हैं या जिनका अपने वार्ड में मजबूत व्यक्तिगत जनाधार है.
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