- जोधपुर, जयपुर और कोटा नगर निगम मेयर चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस को हराकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की
- कांग्रेस के अशोक गहलोत की सक्रियता के बावजूद भाजपा के प्रसन्नचंद मेहता ने छह वोटों से मेयर पद पर जीत हासिल की
- निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से भाजपा को जोधपुर में 53 और जयपुर में 89 वोट मिले, जिससे उसकी जीत सुनिश्चित हुई
राजस्थान के तीन बड़े शहरों के मेयर चुनाव के नतीजों ने नगर निगमों में भाजपा का दबदबा एक बार फिर साबित कर दिया. परिणामों से साफ हो गया कि तमाम कोशिशों के बावजूद जोधपुर में अशोक गहलोत का जादू नहीं चल पाया. वहीं ओम बिरला के गढ़ कोटा में भाजपा कांग्रेस के खेमे में सेंध लगाने में सफल रही. जयपुर के नतीजों ने भी दिखाया कि शहरी मतदाताओं पर भाजपा की पकड़ बरकरार है.
जोधपुर में भाजपा ने पलटी बाजी
जोधपुर मेयर चुनाव के नतीजों में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सियासी गढ़ में कमल खिल गया. तमाम राजनीतिक कोशिशों और बाड़ेबंदी के बावजूद कांग्रेस जीत हासिल नहीं कर सकी. गहलोत खुद कांग्रेस पार्षदों की बाड़ेबंदी के बीच पुष्कर पहुंचे थे, जहां करीब छह घंटे तक रणनीति पर चर्चा हुई. कांग्रेस ने गहलोत के करीबी माने जाने वाले राजेंद्र सिंह सोलंकी को मेयर प्रत्याशी बनाया था. लेकिन मतगणना में भाजपा के प्रसन्नचंद मेहता को 53 वोट मिले और वह मेयर चुने गए. सोलंकी को 47 वोट मिले. इस तरह भाजपा ने छह वोट से जीत दर्ज की.
निर्दलीयों का समर्थन भाजपा के काम आया
100 सदस्यीय निगम में भाजपा के 45 और कांग्रेस के 44 पार्षद थे. 10 निर्दलीय और एक आरएलपी पार्षद की भूमिका निर्णायक मानी जा रही थी. बहुमत का आंकड़ा 51 था. भाजपा ने सात निर्दलीय पार्षदों के समर्थन का दावा किया था और उसका आंकड़ा 52 तक पहुंच गया था. नतीजे आने पर मेहता को 53 वोट मिले. यानी भाजपा को अपने 45 पार्षदों के अलावा आठ अतिरिक्त वोट मिले. कांग्रेस 44 से बढ़कर 47 वोट तक ही पहुंच सकी. चुनाव से पहले बना निर्दलीयों के समर्थन का गणित भाजपा के पक्ष में गया.
गहलोत की सक्रियता भी नहीं आई काम
मेयर चुनाव से पहले कांग्रेस ने जोधपुर में पूरी ताकत झोंक दी थी. पार्षदों की बाड़ेबंदी पुष्कर में की गई थी. अशोक गहलोत ने वहां पहुंचकर पार्षदों से मुलाकात भी की. उनके लिए यह सिर्फ मेयर चुनाव नहीं बल्कि अपने राजनीतिक गढ़ में पार्टी की ताकत दिखाने का अवसर भी था. दूसरी ओर भाजपा ने अपने पार्षदों और समर्थित निर्दलीयों को एकजुट बनाए रखा. आखिर में गहलोत की तमाम कोशिशें कांग्रेस को मेयर की कुर्सी नहीं दिला सकीं और भाजपा ने 45 के शुरुआती आंकड़े को 53 तक पहुंचा दिया.
जयपुर में भाजपा के 78 पार्षद, मेयर को मिले 89 वोट
जोधपुर के बाद जयपुर में भी मेयर चुनाव ने संख्या बल से आगे की तस्वीर दिखाई. 150 सदस्यीय निगम में भाजपा के 78, कांग्रेस के 57 और 15 निर्दलीय पार्षद थे. बहुमत का आंकड़ा 76 था. भाजपा के सुनील कोठारी को 89 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की सुनीता मावर को 60 वोट मिले. एक वोट नोटा में गया. कोठारी ने 29 वोट से जीत दर्ज की. भाजपा को अपने मूल संख्या बल से 11 वोट अधिक मिले, जबकि कांग्रेस को अपने 57 पार्षदों के मुकाबले तीन अतिरिक्त वोट मिले.
मतदान के दौरान हुआ विवाद
मतदान के दौरान कांग्रेस विधायक रफीक खान के निगम परिसर में प्रवेश को लेकर विवाद भी हुआ. इस मुद्दे पर धरना और विरोध देखने को मिला. कांग्रेस ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां भी दर्ज कराईं. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के गढ़ कोटा में भाजपा पहले से मजबूत स्थिति में थी. 100 सदस्यीय निगम में भाजपा के 57, कांग्रेस के 39 और चार निर्दलीय पार्षद थे. बहुमत के लिए 51 वोट चाहिए थे. भाजपा की अनुसुईया गोस्वामी को 65 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की सुनीता सुमन को 35 वोट मिले. गोस्वामी ने 30 वोट से जीत दर्ज की.
कोटा में क्रॉस वोटिंग की चर्चा
कोटा में चुनाव परिणामों के बाद क्रॉस वोटिंग की चर्चा तेज हो गई. भाजपा के 57 पार्षद होने के बावजूद उसके उम्मीदवार को 65 वोट मिले. वहीं कांग्रेस के 39 पार्षद होने के बावजूद उसकी प्रत्याशी को केवल 35 वोट मिले. यानी कांग्रेस के चार वोट कम हुए और भाजपा का आंकड़ा आठ वोट बढ़ गया. तीनों बड़े नगर निगमों के नतीजों को एक साथ देखें तो भाजपा अपने पार्षदों के साथ-साथ निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल करने में भी सफल रही. यही रणनीति उसकी जीत की सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आई. जोधपुर, जयपुर और कोटा तीनों जगह भाजपा ने अलग-अलग परिस्थितियों में जीत दर्ज करते हुए नगर निगमों में अपना दबदबा कायम रखा.
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