महाराष्ट्र की राजनीति में बगावत और वजूद की जंग कोई नई बात नहीं है पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस भी हार के तुरंत बाद इस दर्द से गुज़रेगी इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पर आए इस सियासी संकट को देखकर महाराष्ट्र के दोनों एनसीपी धड़े (शरद पवार और अजीत पवार गुट) अपनी-अपनी पुरानी टूट के जख्मों को सहलाने के साथ-साथ खुद को मजबूत दिखाने की एक बेचैन राजनीतिक हलचल भी पैदा कर रहे हैं.
ममता बनर्जी के समर्थन में सांसद सुप्रिया सुले
शरद पवार गुट की सांसद सुप्रिया सुले जब ममता बनर्जी के समर्थन में खड़ी होती हैं, तो उनके सुरों में सहानुभूति से ज्यादा एक अनुभवी भुक्तभोगी की कड़वाहट और खुद को फिर से खड़ा करने की जिद्द दिखाई देती है. सुप्रिया सुले कहती हैं कि "जो कुछ भी तृणमूल कांग्रेस के साथ हो रहा है, हम पहले ही उस तरह के अनुभवों से गुजर चुके हैं. पहले शिवसेना को तोड़ा गया, फिर एनसीपी को बांटा गया और अब तृणमूल कांग्रेस की बारी है."
कांग्रेस द्वारा टीएमसी के कथित विलय की चर्चा या अफवाहों की सुगबुगाहट पर जब रिपोर्टरों ने पूछा कि कांग्रेस की ओर से NCP(SP) को विलय का प्रस्ताव मिला तो क्या फैसला होगा? इस सवाल पर सुप्रिया सुले ने हल्के अंदाज में कहा कि 'अभी बारिश हुई तो छतरी लूंगी या रेनकोट, पहले बारिश तो होने दो, उसके बाद देखते हैं.' सीधे जवाब में 'नहीं' ना कह पाना भी क्या कुछ कहता है? राजनीतिक विश्लेषक अब इसे भी डिकोड कर रहे हैं.
उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार हुईं भावुक
वहीं, एक दिन बाद अपनी पार्टी का स्थापना दिवस मना रही उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार अपने कार्यक्रम की शुरुआत में अजीत पवार को याद कर भावुक हुईं, पर याद था कि आज भावुक होने से ज़्यादा इस मंच पर पार्टी को समेटने की ज़्यादा ज़रूरत है! अजीत पवार गुट के मंच पर टूट के डर और वजूद बचाने का ड्रामा अपने चरम पर दिखा.
लेकिन इस भावुक क्षण के तुरंत बाद जो हलचल दिखी, वो सबसे महत्वपूर्ण है. अचानक अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन किया और पार्टी के भीतर झांक रहे टूट के डर को दबाने के लिए सीधे धमकी भरे लहजे में कहा कि "अब तक पक्षात जो कुछ हुआ, मैंने सबको संभाला. (अजित पवार) दादा ने सबकी ज़िद पूरी की, पद दिए. लेकिन आगे अगर किसी का अनावश्यक हस्तक्षेप हुआ, तो उस पर जरूर विचार किया जाएगा. दादा की तरह कठोर निर्णय लेने के लिए मैं उनके पदचिह्नों पर चलूंगी."
मंच पर आंसू और तुरंत बाद “अनावश्यक हस्तक्षेप न करने” की यह हिदायत साफ बयां करती है कि अजीत पवार के जाने के बाद इस गुट के भीतर नेताओं को बांधे रखना कितना मुश्किल हो रहा है.
हाल के समय में अजित गुट के प्रफुल पटेल और सुनील तटकरे जैसे बड़े नेताओं की नाराज़गी और इसी नाराज़गी के बीच दूसरे गुट NCP के प्रमुख शरद पवार से उनका मिलना कई अटकलों को हवा दे चुका है, सुनेत्रा के बेटे पार्थ पवार के पार्टी के भीतर बढ़ते क़द पर दिखती बड़े नेताओं की असहजता सुनेत्रा को परेशान कर रही है.
एक तरफ़ शरद पवार गुट में टीएमसी के बहाने खुद को पीड़ित साबित करने की होड़ है, ताकि जनता की सहानुभूति बटोरकर अपनी ताकत दोबारा समेटी जा सके. दूसरी तरफ अजित गुट में जंग चल रही है कि सत्ता और संगठन हाथ से न निकल जाए, इसलिए भावनाओं के नैरेटिव के साथ कठोर बयानों का हंटर चमकाया जा रहा है ताकि कोई नेता कमज़ोरी का फ़ायदा और पार्टी को नुक़सान पहुँचाने की दिशा में ना सोचे!
इस वक़्त देश की राजनीति में वही हो रहा है जिसे महाराष्ट्र ने बीते कुछ सालों में सहा है! जिन ठाकरे और पवार के नामों से राज्य की राजनीति समझी जाती थी आज उनकी राजनीतिक ज़मीन हिचकोले खाती दिखती है, इसलिए हर ऐसे झटके उनके ज़ख़्म को हरा करते हैं और फिर बयानों की झड़ी से दिखाने की कोशिश होती है “ऑल इज वेल”.
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