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कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड: क्या खत्म होगी मराठवाड़ा की प्यास और कम होगी कोंकण की बाढ़? जानिए पूरी परियोजना

महाराष्ट्र सरकार की 87 हजार करोड़ रुपये की कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड परियोजना का उद्देश्य कोंकण के अतिरिक्त बारिश के पानी को मराठवाड़ा तक पहुंचाना है. जानिए इस मेगा प्रोजेक्ट की चुनौतियां, फायदे और विशेषज्ञों की राय.

कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड: क्या खत्म होगी मराठवाड़ा की प्यास और कम होगी कोंकण की बाढ़? जानिए पूरी परियोजना
कोंकण-मराठवाडा वॉटर ग्रिड: क्या यह परियोजना कोंकण की बाढ़ और मराठवाड़ा के सूखे का स्थायी समाधान बन सकती है?

महाराष्ट्र में हर मानसून एक विरोधाभासी तस्वीर देखने को मिलती है. एक तरफ मुंबई और कोंकण में मूसलाधार बारिश से बाढ़, भूस्खलन और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है, तो दूसरी तरफ कुछ ही महीनों बाद मराठवाड़ा के आठ जिले पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं. जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार, मराठवाड़ा पिछले 126 वर्षों के सबसे शुष्क दौरों में से एक का सामना कर रहा है, जबकि कोंकण में हर साल हजारों करोड़ लीटर पानी बिना उपयोग के अरब सागर में समा जाता है. वर्षों से उठ रहा सवाल फिर चर्चा में है, क्या इस अतिरिक्त पानी को मराठवाड़ा तक पहुंचाकर राज्य की दो सबसे बड़ी जल समस्याओं का समाधान किया जा सकता है? इसी सोच के साथ महाराष्ट्र सरकार 'कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड' और मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ा रही है. सरकार का दावा है कि अगर ये योजनाएं पूरी तरह लागू हो जाती हैं, तो कोंकण में बाढ़ की तीव्रता कम करने और मराठवाड़ा की जल सुरक्षा मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं. हालांकि, जल विशेषज्ञ इसे लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं.

एक राज्य, दो अलग-अलग जल संकट

कोंकण और मुंबई क्षेत्र में हर साल औसतन 2,000 से 3,000 मिलीमीटर तक बारिश होती है. पश्चिम की ओर बहने वाली नदियां जैसे वैतरणा, उल्हास, पिंजाल, सावित्री और अन्य भारी मात्रा में पानी लेकर सीधे अरब सागर में मिल जाती हैं. दूसरी ओर, सह्याद्रि पर्वतमाला के पूर्व में स्थित मराठवाड़ा 'रेन शैडो' क्षेत्र में आता है. पश्चिमी घाट अधिकांश नमी को कोंकण में ही बरसा देते हैं, जिसके कारण मराठवाड़ा में वर्षा सामान्य से काफी कम होती है. यही वजह है कि यहां लगभग हर दो-तीन साल में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है.

सरकार की बड़ी योजना क्या है?

महाराष्ट्र सरकार का प्रस्ताव है कि कोंकण की पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों के अतिरिक्त बाढ़ के पानी को सह्याद्रि पर्वतमाला में सुरंगों, लिफ्ट सिंचाई प्रणाली और जलाशयों के माध्यम से गोदावरी बेसिन की ओर मोड़ा जाए. सरकारी योजना के अनुसार लगभग 50-55 टीएमसी अतिरिक्त पानी को मराठवाड़ा तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. इस परियोजना की अनुमानित लागत 87 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है. इसके लिए विश्व बैंक समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से भी सहयोग की संभावना तलाशी जा रही है.

Konkan Marathwada Water Grid Project: मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड से कैसे अलग है ये परियोजना

Konkan Marathwada Water Grid Project: मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड से कैसे अलग है ये परियोजना

कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड और मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड में क्या अंतर है?

इन दोनों परियोजनाओं को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति रहती है. कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड का उद्देश्य कोंकण के अतिरिक्त पानी को मराठवाड़ा तक पहुंचाना है. यह एक इंटर-बेसिन वाटर ट्रांसफर परियोजना है, जिसमें सुरंगें, पंपिंग स्टेशन और बड़े ट्रांसमिशन सिस्टम शामिल होंगे. वहीं मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड एक वितरण प्रणाली है. इसके तहत मराठवाड़ा के 11 प्रमुख बांधों जायकवाड़ी, येलदरी, मांजरा, सिद्धेश्वर, विष्णुपुरी समेत अन्य जलाशयों को पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ा जाएगा. यह बिजली ग्रिड की तरह काम करेगा, ताकि जिस जिले में पानी की कमी हो, वहां दूसरे जलाशय से तुरंत पानी पहुंचाया जा सके.

नदी जोड़ परियोजनाएं भी इसी लक्ष्य का हिस्सा

कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड अकेली परियोजना नहीं है. राज्य और केंद्र सरकार दमनगंगा–पिंजाल, नार–पार, कोंकण–गोदावरी लिंक और अन्य नदी जोड़ परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं. इन परियोजनाओं का उद्देश्य अतिरिक्त मानसूनी जल का बेहतर उपयोग करना और मुंबई महानगर क्षेत्र, उत्तर महाराष्ट्र तथा मराठवाड़ा की दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करना है.

Konkan Marathwada Water Grid Project: मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड की शुरुआत

Konkan Marathwada Water Grid Project: मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड की शुरुआत

इस परियोजना की लंबी है कहानी

पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों का पानी पूर्व की ओर मोड़ने का विचार नया नहीं है. पिछले तीन दशकों से इस पर चर्चा होती रही है. 2014 के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सरकार ने मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड को प्राथमिकता दी और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हुई. 2019 में पहले चरण को मंजूरी मिली. इसके बाद सरकार बदलने, कोविड महामारी, वित्तीय चुनौतियों और पर्यावरणीय मंजूरियों के कारण परियोजना की गति धीमी पड़ गई. हाल के वर्षों में महायुति सरकार ने इसे फिर प्राथमिकता दी है. सरकार अब कोंकण-मराठवाड़ा जलांतरण को नदी जोड़ परियोजनाओं के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है.

Konkan Marathwada Water Grid Project: जानिए क्या है ये प्रोजेक्ट?

Konkan Marathwada Water Grid Project: जानिए क्या है ये प्रोजेक्ट?

क्या इससे कोंकण की बाढ़ खत्म हो जाएगी?

विशेषज्ञों का कहना है कि कोंकण में बाढ़ केवल अतिरिक्त पानी के कारण नहीं आती. इसके पीछे अत्यधिक वर्षा, जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण, नदियों की बदलती धारा और कमजोर जल निकासी जैसी कई वजहें हैं. हालांकि अतिरिक्त पानी को नियंत्रित तरीके से दूसरी दिशा में मोड़ने से बाढ़ की तीव्रता कुछ हद तक कम हो सकती है.

क्या मराठवाड़ा का सूखा खत्म हो जाएगा?

जल नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वास्तव में पर्याप्त पानी कोंकण से मराठवाड़ा तक पहुंचता है और पाइपलाइन नेटवर्क समय पर तैयार होता है, तो पेयजल संकट काफी हद तक कम किया जा सकता है. लेकिन केवल पाइपलाइन बिछाने से समस्या खत्म नहीं होगी. इसके साथ जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, माइक्रो इरिगेशन, फसल पैटर्न में बदलाव और बेहतर जल प्रबंधन भी उतना ही जरूरी होगा.

एक्सपर्ट्स की राय क्या है?

जल नीति विशेषज्ञ प्रदीप पुरंदरे सहित कई विशेषज्ञों ने परियोजना की व्यवहार्यता पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि पहले मौजूदा जलाशयों और सिंचाई परियोजनाओं का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए. उन्होंने परियोजना की ऊर्जा लागत, पर्यावरणीय प्रभाव और दीर्घकालिक संचालन पर भी चिंता जताई है. वहीं, कुछ जल विशेषज्ञों और महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण के अधिकारियों का मानना है कि यदि कोंकण का अतिरिक्त पानी वैज्ञानिक तरीके से मराठवाड़ा तक पहुंचाया जाता है, तो यह क्षेत्र की जल सुरक्षा में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है.

सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

परियोजना के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. जैसे 87 हजार करोड़ रुपये से अधिक की लागत, पर्यावरणीय मंजूरियां, वन स्वीकृतियां, सह्याद्रि में लंबी सुरंगों का निर्माण, भारी बिजली खर्च, भूमि अधिग्रहण और वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था. सरकार ने विश्व बैंक सहित कई एजेंसियों से वित्तीय सहयोग की संभावना भी तलाशनी शुरू कर दी है.

कब तक पूरी होगी यह परियोजना?

सरकार का कहना है कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR), तकनीकी अध्ययन और वित्तीय मॉडल पर तेजी से काम चल रहा है. हालांकि अभी तक निर्माण शुरू होने और परियोजना पूरी होने की कोई निश्चित समय-सीमा सार्वजनिक नहीं की गई है.

कोंकण-मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड और मराठवाड़ा वॉटर ग्रिड महाराष्ट्र की सबसे महत्वाकांक्षी जल परियोजनाओं में गिनी जा रही हैं. यदि इन्हें नदी जोड़ परियोजनाओं, जल संरक्षण और आधुनिक जल प्रबंधन के साथ लागू किया जाता है, तो मराठवाड़ा की दशकों पुरानी जल समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई जादुई समाधान नहीं है.

कोंकण की बाढ़ और मराठवाड़ा के सूखे जैसी जटिल समस्याओं का स्थायी समाधान केवल एक परियोजना से नहीं, बल्कि समग्र जल प्रबंधन नीति से ही संभव होगा.

सरकार के दावों पर सवाल

जल विशेषज्ञ प्रदीप पुरंदरे ने NDTV से कहा कि "जब महाराष्ट्र सरकार खुद दावा करती है कि 'जलयुक्त शिवार योजना' सफल रही है और उसने हजारों गांवों को जलसमृद्ध बना दिया है, तो फिर मराठवाड़ा को बाहर से पानी लाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?"  उन्होंने कहा कि सूखाग्रस्त मराठवाड़ा में गन्ने की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है, जिससे पानी की मांग और बढ़ गई है.

"विदर्भ और नासिक क्षेत्र की ऊपरी धारा (अपस्ट्रीम) में बने बड़े और मध्यम सिंचाई परियोजनाएं हमेशा निचले हिस्से यानी मराठवाड़ा को उसके हिस्से का पानी मिलने में बाधा बनती रही हैं. कोंकण से लाए जाने वाले पानी के साथ भी यही स्थिति बनने की आशंका है."

पुरंदरे का कहना है कि बाढ़ के कुल पानी का मुश्किल से 2 से 3 प्रतिशत हिस्सा ही दूसरी दिशा में मोड़ा जा सकता है.

"यह पानी भी साल में केवल 2–3 दिनों तक ही उपलब्ध होता है. इसके लिए बनाई जाने वाली नहरें पूरे साल में केवल 2–3 दिन ही उपयोग में आएंगी. रास्ते में होने वाली पानी की चोरी और रिसाव (लीकेज) को जोड़ दें, तो मराठवाड़ा तक बहुत कम पानी पहुंचेगा, या शायद बिल्कुल भी नहीं."

उन्होंने इस तरह की परियोजनाओं पर सवाल उठाते हुए कहा, "ऐसी परियोजनाओं को वास्तव में 'ड्राई वॉटर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स' (Dry Water Development Projects) कहा जा सकता है. आखिरकार लोगों तक पानी पहुंचेगा ही नहीं."

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