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सरकारी नौकरियों में सबसे ज्यादा आरक्षण किस राज्य में मिलता है? जान लीजिए जवाब

तमिलनाडु सरकारी नौकरियों में लगभग 69% आरक्षण के साथ देश में सबसे आगे है. जबकि राजस्थान, तेलंगाना और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आरक्षण 60% से ऊपर तक पहुंचता है.

सरकारी नौकरियों में सबसे ज्यादा आरक्षण किस राज्य में मिलता है? जान लीजिए जवाब
राजस्थान में समय-समय पर बदलाव के साथ कुल आरक्षण का दायरा लगभग 60-64% के बीच पहुंचा.

देश में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है, इसलिए सरकारें आरक्षण को एक अहम साधन मानती हैं ताकि पिछड़े और वंचित वर्गों को आगे आने का मौका मिल सके. केंद्र सरकार के स्तर पर आरक्षण की तय व्यवस्था है. लेकिन कई राज्य अपने सामाजिक ढांचे और जनसंख्या रेशो के आधार पर अलग-अलग मॉडल अपनाते हैं. ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि किस राज्य में सरकारी नौकरियों में सबसे ज्यादा आरक्षण मिलता है? अगर आपके मन में भी यही जिज्ञासा है, तो चलिए इस सवाल का जवाब जानते हैं.

तमिलनाडु

तमिलनाडु को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में सबसे ज्यादा आरक्षण देने वाले राज्य के रूप में जाना जाता है. यहां कुल आरक्षण लगभग 69% है. जो 50% की सामान्य सीमा से अधिक है. राज्य में ये आरक्षण मुख्य रूप से इन वर्गों में बंटा है, पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति. तमिलनाडु ने इस व्यवस्था को लंबे समय से लागू रखा है और इसे संविधान की नौंवी अनुसूची में शामिल किया गया था. ताकि ये कानूनी रूप से सुरक्षित रहे. इसी वजह से यहां आरक्षण का प्रतिशत अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा माना जाता है.

राजस्थान, तेलंगाना, मध्य प्रदेश

कुछ अन्य राज्यों में भी आरक्षण का दायरा काफी बड़ा है.

  • राजस्थान में समय-समय पर बदलाव के साथ कुल आरक्षण का दायरा लगभग 60-64% के बीच पहुंचा.
  • तेलंगाना और कुछ अन्य दक्षिणी राज्यों में भी आरक्षण 60% से ऊपर तक जाता है.
  • मध्य प्रदेश ने भी पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण बढ़ाया है. हालांकि कई प्रावधान अदालतों की समीक्षा के दायरे में आते रहते हैं.

इन राज्यों में कई बार नया कानून लाया जाता है, फिर उस पर न्यायालय में सुनवाई होती है. यानी आरक्षण का अंतिम स्वरूप अक्सर अदालत की मंजूरी पर निर्भर करता है. कुल मिलाकर देखा जाए तो तमिलनाडु अभी भी सरकारी नौकरियों में सबसे ज्यादा, करीब 69% आरक्षण देना वाला राज्य माना जाता है. अन्य राज्यों में भी आरक्षण बढ़ाने की कोशिशें होती रही हैं. लेकिन कानूनी सीमा, सोशल बैलेंस और कोर्ट केस लगने के कारण अधिकतर राज्यों में ये प्रतिशत बदलता रहता है.

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