Tin Bigha Corridor: अमूमन दूसरे देश की यात्रा के लिए पासपोर्ट और वीजा का जरूरत पड़ती है, लेकिन पश्चिम बंगाल के कूच बिहार जिले में स्थित एक हिस्से में एंट्री के लिए भारतीयों को पासपोर्ट और वीजा लेकर जाना पड़ता है. यह सुनकर भले ही आपको आश्चर्य हो रहा हो, लेकिन यह बात सोलह आने सच है. कूच बिहार जिले के मेखलीगंज सब डिवीजन के पास स्थित इस गांव का पूरा हिस्सा भारतीय सीमा में है, लेकिन नियंत्रण बांग्लादेश के हाथों में है. यह भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के कूचबिहार ज़िले और बांग्लादेश के लालमोनिरहाट ज़िले के पटग्राम उपजिला के बॉर्डर पर है
999 साल के लिए बांग्लादेश को लीज पर दिया
दरअसल, साल 2015 के भारत-बांग्लादेश एन्क्लेव समझौते (Land Boundary Agreement) के बाद 100 से अधिक एन्क्लेव खत्म हो गए, लेकिन दहाग्राम-आंगरपोटा एन्क्लेव में अभी भी वजूद में है, जहां के निवासी मुख्य भूमि तक पहुंच सके, इसके लिए भारत सरकार ने 178 मीटर लंबे और 85 मीटर चौड़े तीन बीघा कॉरिडोर को साल 1996 में 999 साल के लिए बांग्लादेश को लीज पर दे दिया था.
सुरक्षा कारणों से सीधे जाने की अनुमति नहीं
तीन बीघा कॉरिडोर के गांव के लोग एक संकरे रास्ते से होकर बांग्लादेश से जुड़ते हैं. चूंकि यह एक अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र और दूसरे देश का हिस्सा है, इसलिए सुरक्षा कारणों से आम भारतीयों या पर्यटकों को यहां सीधे जाने की अनुमति नहीं होती है. इसके अंदर प्रवेश करने के लिए विशेष अनुमति या पासपोर्ट/दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.
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क्या है तीन बीघा कॉरिडोर?
साल 1996 में भारत सरकार द्वारा 999 साल के लिए बांग्लादेश को लीज पर दिए गए 178 मीटर लंबे और 85 मीटर चौड़े तीन बीघा कॉरिडोर के जरिए बांग्लादेश के दहाग्राम-आंगरपोटा एन्क्लेव के निवासी अपने मुख्य भूमि तक पहुंचते हैं. साल 2015 के भारत-बांग्लादेश एन्क्लेव समझौते के बाद अकेला दहाग्राम-आंगरपोटा एन्क्लेव अस्तित्व में है, जबकि शेष 100 एन्क्लेव खत्म हो गए थे.
एंट्री के लिए स्पेशल परमिट की जरूरत
बांग्लादेश के कंट्रोल में आने वाले भारतीय जमीन तीन बीघा कॉरिडोर में प्रवेश के लिए भारतीयों को स्थानीय प्रशासन की अनुमति अथवा बांग्लादेश सरकार से स्पेशल परमिट (ILP ) लेनी पड़ती है. यहां लॉ एंड ऑर्डर बांग्लादेश का चलता है. यही नहीं, यहां का झंडा और मुद्रा भी बांग्लादेशी होता है. बड़ी बात यह है कि यहां लोगों की चेकिंग भारतीय सुरक्षा बल करते हैं, लेकिन प्रशासकीय अधिकार बांग्लादेश के अधीन है.
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दहाग्राम-आंगरपोटा एन्क्लेव में रहते हैं 20,000 बांग्लादेशी
बांग्लादेश सीमा में स्थित दहाग्राम-आंगरपोटा एन्क्लेव में करीब 20 हजार बांग्लादेशी नागरिक रहते हैं, जहां की जिंदगी, भाषा, संस्कृति और अर्थव्यवस्था सब कुछ बांग्लादेश कंट्रोल करता है. चूंकि यह इलाका सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, इसलिए बिना अनुमति के जाने पर बीएसएफ रोक सकती है. साल 2011 के भूमि सीमा समझौते के अनुसार, गलियारा वर्तमान में खुला है और बांग्लादेशी नागरिकों के लिए 24 घंटे बेरोकटोक आवाजाही है.
बांग्लादेशियों के लिए तीन बीघा कॉरिडोर खोल दिया गया
उल्लेखनीय है 1971 में बांग्लादेश को स्वतंत्रता मिलने के बाद भारतीय PM इंदिरा गांधी और बांग्लादेशी PM शेख मुजीबुर रहमान के बीच 1974 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे. इस समझौते के तहत, भारत ने बांग्लादेश को कॉरिडोर पट्टे पर देने का फैसला किया था और लंबे राजनीतिक और कानूनी संघर्ष के बाद, 26 जून 1992 को, भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर बांग्लादेशी नागरिकों के लिए तीन बीघा कॉरिडोर खोल दिया गया.
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-प्रबीर कुंडू की रिपोर्ट
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