Short Term Memory Loss: सूचना क्रांति के बदलते दौर में सोशल मीडिया और वीडियो ऐप पर रील और शॉर्ट वीडियो स्क्रॉलिंग आज टाइम पास का सबसे बेहतर विकल्प बनकर उभरा है. मौजूदा दौर में प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों का यह सबसे पसंदीदा टाइम पास है, लेकिन शॉर्ट वीडियो स्क्रॉलिंग इंसान की मेमोरी लॉस का बड़ा कारक बनकर उभर रहा है, जिससे लोग शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस की शिकार हो रहे हैं.
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लॉग टर्म मेमोरी का बाधक बन रहा है शॉर्ट टर्म वीडियो?
जानकार बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति घंटों रील स्क्रॉल करता हैं, तो दिमाग की एन्कोडिंग, कन्सालिडेशन और रिट्रीवल की सारी प्रक्रिया चरमरा जाती है. दिमाग की एन्कोडिंग 'इन्फॉर्मेशन ओवरलोड' के चलते कमजोर हो जाती है, क्योंकि हर 15 से 30 सेकंड में रील बदलने से दिमाग को उसे एन्कोड (प्रोसेस) करने का समय ही नहीं मिल पाता है. नतीजा ध्यान भटकता है और चीजें शॉर्ट-टर्म मेमोरी में भी दर्ज नहीं हो पातीं है.
ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम को थका देता है सस्ता डोपामाइन'
जानकारों के मुताबिक हर 15 से 30 सेकेंड में नई रील शॉर्ट टर्म वीडियो देखने वाले के दिमाग में 'डोपामाइन' (खुशी का अहसास कराने वाला न्यूरोट्रांसमीटर) रिलीज होता है, लेकिन शॉर्ट वीडियो में हर बार नए चेहरा, नए विषय और नई जानकारी से मिलने वाला 'सस्ता डोपामाइन' दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम (सीखने के लिए प्रेरक) को थका देता है, जिसके बाद यूजर्स के दिमाग को पढ़ाई जैसी गंभीर चीजें उबाऊ लगती है और वह उसे याद नहीं रख पाता है.
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ब्रेन को यादों को सहेजने का वक्त नहीं देती स्क्रॉलिंग की लत
मौजूदा दौर में इंटरनेट सुलभ और सस्ता है और हर हाथ में स्मार्टफोन है. यूजर सुबह उठने के बाद से रील स्क्रॉल करता है और देर रात क रील स्क्रॉल करके ही सोता है. ऐसे में ब्रेन को स्थाई यादें बनाने के लिए कम 'खाली समय' और विश्राम मिल पाता है. इससे शॉर्ट-टर्म यादें लॉन्ग-टर्म मेमोरी में शिफ्ट नहीं हो पातीं. यही वजह है सुबह देखी रील्स में शाम उड़न छू हो जाती है.
'डिजिटल एम्नेशिया' का शिकार हो सकता है रीलर स्क्रॉलर
गौरतलब है आज स्मार्टफोन की दौर में कोई भी सूचना एक क्लिक की दूरी पर उपलब्ध है. रील और शॉर्ट वीडियो स्क्रॉलिंग के दौर में विविधताओं से भरी सूचनाएं पलक झपकते आती-जाती रहती है, इससे हमारा दिमाग को यादों को सजहने में मेहनत करना छोड़ देता है, जिसे विज्ञान की भाषा में 'डिजिटल एम्नेशिया' या 'गूगल इफेक्ट' भी कहा जाता हैं. डिजिटल एम्नेशिया का शिकार ऐसे व्यक्ति की गूगल पर निर्भरता बढ़ जाती है. इसे कैलकुलेटर से समझ सकते हैं, जिसने सामान्य जोड़-घटाव की योग्यता भी घटा दी है.
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समय-सीमा के निर्धारण से मेमोरी लॉस से बच सकेंगे यूजर्स
रील स्क्रॉलिंग की आदत आसानी से छूटनी मुश्किल हो सकती है, लेकिन इसे 20-20-20 नियम के जरिए सुधारी जा सकती है. यूजर हर 20 मिनट की स्क्रॉलिंग के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लेकर रील स्क्रॉलिंग की लत से छुटकारा पा सकता है और दूर की चीजों पर फोकस करके ब्रेन की मदद सकता है. एक अच्छी नींद से यादों को सहेजने में सबसे अधिक मददगार होती है, इसलिए सोने से 1 घंटा पहले स्क्रॉलिंग की आदत छोड़ना सहायक हो सकता है.
'रील्स बहुत ज़्यादा स्क्रॉलिंग से वर्किंग मेमोरी पर बुरा असर'
गौरतलब है अमेरिका स्थित नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिक रिसर्च से यह पुष्टि होती है कि रील्स, टिकटॉक और यूट्यूब शॉर्ट्स को बहुत ज़्यादा स्क्रॉल करने से शॉर्ट-टर्म और वर्किंग मेमोरी पर बुरा असर पड़ सकता है. हालांकि इससे दिमाग को कोई स्थायी नुकसान नहीं पहुंचता है, लेकिन इसका तेज़ी से चलने वाला फ़ॉर्मेट उस तरीके को बदल देता है जिससे आपका दिमाग अस्थायी जानकारी को प्रोसेस, एनकोड और याद रखता है।
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