- पश्चिम बंगाल में 15 सालों के टीएमसी शासन के बाद बीजेपी ने पहली बार ऐतिहासिक जीत हासिल की है
- ममता बनर्जी की सरकार पर कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर आलोचना हुई
- आरजी कर कॉलेज दुष्कर्म, संदेशखाली यौन शोषण और शिक्षक भर्ती घोटाले जैसी घटनाओं ने TMC की छवि को नुकसान पहुंचाया
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी एक ऐसा नाम हैं, जिन्हें पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से 'अपराजेय' माना जाता था. लेकिन बदलते समय के साथ बंगाल की राजनीति में भी ऐतिहासिक बदलाव हुआ है और इस बार के चुनाव में टीएमसी के 15 साल के शासन का सूरज अस्त हो गया. बीजेपी ने पहली बार पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत हासिल की है. ममता बनर्जी की सत्ता पर पकड़ ढीली होने के एक नहीं बल्कि कानून‑व्यवस्था, महिलाओं के खिलाफ अपराध, भ्रष्टाचार, सत्ता‑विरोधी लहर, संगठनात्मक चुनौती और विपक्ष की मजबूत रणनीति सहित कई बड़े कारण रहे हैं.

ममता बनर्जी के शासन काल के दौरान कई ऐसी घटनाएं और घोटाले सामने आए, जिन्होंने उनकी छवि को काफी नुकसान पहुंचाया. किसी भी दिग्गज नेता की हार अचानक नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई सालों से पनप रहा असंतोष और बदलती राजनीतिक परिस्थितियां भी होती हैं.
- संदेशखाली की घटना: 2024 में उत्तर 24 परगना जिले के संदेशखाली में महिलाओं ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर यौन शोषण और जमीन हड़पने के गंभीर आरोप लगाए थे. इस घटना ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थी, जिससे ममता बनर्जी की सरकार को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था.
- आरजी कर कॉलेज रेप-हत्या: 2024 में ही कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या की जधन्य घटना सामने आई थी. इसने पूरे देश को झकझोर दिया था. प्रदेश में कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का सबसे मजबूत आधार रहीं महिलाएं इससे काफी नाराज दिखीं. आरजी कर और संदेशखाली में महिलाओं के उत्पीड़न के आरोपों से बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं को टीएमसी से दूर कर दिया.
- शिक्षक भर्ती घोटाला: पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (SSC) के तहत शिक्षक और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जिसमें पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी सहित कई टीएमसी नेता जांच के घेरे में आए. इस मुद्दे ने मध्यम वर्ग और शिक्षित युवाओं पर गहरा असर डाला. इसके साथ ही पिछले कुछ सालों में टीएमसी के कई बड़े नेताओं का नाम घोटालों में आया.
- शारदा और नारदा घोटाला: शारदा चिटफंड घोटाला और नारदा स्टिंग ऑपरेशन ने भी टीएमसी नेताओं की कथित संलिप्तता के कारण सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर दाग लगाए. वहीं जनवरी 2026 में, कोयला तस्करी मामले की जांच के दौरान जब ईडी के अधिकारी बंगाल में छापेमारी करने पहुंचे तो उनपर हमल हुआ और ममता सरकार पर केंद्रीय एजेंसियों के काम में रुकावट डालने का आरोप लगा.
- चुनाव के दौरान हिंसा और धांधली के आरोप: 2021 और 2026 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी के कार्यकर्ताओं पर हिंसा, विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं पर हमले और केंद्रीय बलों के काम में रुकावट के आरोप लगे. साथ ही स्थानीय स्तर पर ग्रामीण इलाकों में 'कट मनी' और 'सिंडिकेट' की शिकायतों ने जमीन पर पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया.
- अल्पसंख्यक वोटों का बिखराव: पारंपरिक रूप से मुस्लिम मतदाता टीएमसी का एकमुश्त समर्थन करते रहे हैं. हालांकि, इस बार हुमायूं कबीर जैसे नेताओं द्वारा बनाई गई नई पार्टियों और कुछ क्षेत्रों में 'अब्बास सिद्दीकी' जैसे कारकों ने अल्पसंख्यक वोटों में सेंध लगाई, जिससे TMC का 'वोट बैंक' समीकरण प्रभावित हुआ. ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और कांग्रेस के बीच भी मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ.
- सत्ता-विरोधी लहर: ममता बनर्जी 2011 से सत्ता में थीं. एक ही दल के लंबे शासनकाल के बाद जनता में अक्सर बदलाव की इच्छा भी जागती है. लंबे समय तक सत्ता में रहने से सरकारी मशीनरी में सुस्ती और जनता की बढ़ती उम्मीदों के बीच की खाई भी बढ़ जाती है. नए मतदाता, जिन्होंने केवल टीएमसी का शासन देखा है, वे रोजगार और औद्योगिक विकास के लिए नए विकल्पों की तलाश कर रहे थे.
- संगठन में बिखराव और अंतर्कलह: ममता बनर्जी पार्टी का चेहरा थीं, लेकिन पार्टी के भीतर 'पुराने बनाम नए' की लड़ाई भी अक्सर सामने आती रही. दूसरे स्तर के नेतृत्व का अभाव दिखा. पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी और वरिष्ठ नेताओं के बीच सामंजस्य की कमी दिखी, जिसका सीधा बीजेपी विपक्ष को मिला. चुनाव के ठीक पहले प्रभावशाली जिला स्तर के नेताओं ने पार्टी छोड़ी, जिसने संगठन को कमजोर किया.
- ध्रुवीकरण और तुष्टीकरण की राजनीति: बंगाल की राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण एक बड़ा हथियार रहा है. इसके कारण भी वोटों का बंटवारा हुआ. विपक्ष ने आक्रामक तरीके से 'तुष्टीकरण' के आरोपों को उठाया और बहुसंख्यक मतों को एकतरफ रखनें में कामयाब रहा. बीजेपी पिछले कुछ सालों में प्रदेश में एक मजबूत विपक्ष बनकर उभरी.
- नंदीग्राम मामले में जुर्माना: नंदीग्राम चुनाव परिणामों को चुनौती देने वाली याचिका के संबंध में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने न्यायाधीश को बदनाम करने की साजिश के आरोप में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. इन घटनाओं के चलते ममता सरकार को विपक्ष की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाए गए थे.
- ऐतिहासिक मतदान प्रतिशत: 2026 के चुनावों में लगभग 92% से अधिक का रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया. राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि जब मतदान का प्रतिशत इतना अधिक होता है, तो वह अक्सर सत्ता परिवर्तन का संकेत होता है और रिजल्ट में भी यही दिखा. ममता बनर्जी 15 सालों बाद प्रदेश में चुनाव हार गईं और बीजेपी पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने जा रही है.

ये भी पढ़ें: देश के 22 राज्यों में बीजेपी-NDA सरकार, जिधर देखो उधर भगवा ही दिखेगा, बंगाल का किला भी जीता
ये भी पढ़ें: बंगाल में बीजेपी की जीत का अंकगणित-SIR, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, घुसपैठ, हिंदू असुरक्षा, TMC की हरी फाइल का हॉरर
ये भी पढ़ें: बंगाल में मुस्लिम फैक्टर: 62 सीटों का वो गणित जिसने ममता बनर्जी को चौंकाया और बीजेपी को जिताया
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं