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बंगाल में जीत बीजेपी की 'घरवापसी', जहां से रखी गई नींव, वहीं बनने जा रही सरकार-समझिए क्यों भावुक कार्यकर्ता

अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और जनसंघ के पूर्व सदस्यों ने 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गठन किया. अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने. बीजेपी ने पहला आम चुनाव 1984 में लड़ा.

बंगाल में जीत बीजेपी की 'घरवापसी', जहां से रखी गई नींव, वहीं बनने जा रही सरकार-समझिए क्यों भावुक कार्यकर्ता
पश्चिम बंगाल चुनाव जीत से बीजेपी के सभी नेता बहुत खुश हैं.
  • भारतीय जनता पार्टी की पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनने जा रही है, जिससे सभी नेता और कार्यकर्ता भावुक हैं
  • भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी, जो बंगाल के ही रहने वाले थे
  • जनसंघ का 1977 में जनता पार्टी में विलय हुआ था, लेकिन बाद में 1980 में बीजेपी का गठन हुआ था
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बंगाल में मिलने जा रही जीत को लेकर बीजेपी का हर नेता और कार्यकर्ता भावुक नजर आ रहा है. बीजेपी नेता और मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तो कैमरे पर ही भावुक हो गए. बीजेपी के सभी नेताओं की हमेशा से मन में इच्छा थी कि पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार हो. आखिर वो दिन आ गया. मगर इसे 'घरवापसी' क्यों कहा जा रहा है? क्योंकि पश्चिम बंगाल में तो आजतक बीजेपी कभी सत्ता में रही नहीं और इतना भावुक होने की वजह क्या है? जबकि बीजेपी की केंद्र से लेकर कई राज्यों में सरकार है.

जनसंघ से है रिश्ता

1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के गठन सालों बाद उसे ये ऐहसास होने लगा कि समाजसेवा के साथ उसे लोगों की समस्याओं को भी सुलझाना होगा. बंगाल के लाल डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी आरएसएस के संपर्क में आए. फिर 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली के कन्या माध्यमिक विद्यालय परिसर में भारतीय जनसंघ का गठन किया गया. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था. इनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बंगाल में एक शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी के रूप में प्रसिद्ध थे. कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक होने के पश्चात मुखर्जी 1923 में सेनेट के सदस्य बने. अपने पिता की मौत के पश्चात, 1924 में उन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया. 1926 में उन्होंने इंग्लैंड के लिए प्रस्थान किया जहां लिंकन्स इन से 1927 में बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की. 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए और विश्व का सबसे युवा कुलपति होने का सम्मान प्राप्त किया. वो 1938 तक इस पद को सुशोभित करते रहे. अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक रचनात्मक सुधार किये तथा इस दौरान 'कोर्ट एंड काउंसिल ऑफ इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बैंगलोर' तथा इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड के सक्रिय सदस्य भी रहे. 

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ऐसे जुड़े थे आरएसएस से

कांग्रेस प्रत्याशी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें बंगाल विधान परिषद का सदस्य चुना गया, मगर कांग्रेस की तरफ से विधायिका के बहिष्कार का निर्णय लेने के बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. बाद में डॉ. मुखर्जी स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और निर्वाचित हुए. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया. नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच हुए समझौते के पश्चात 6 अप्रैल 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया. इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर-संघचालक गुरु गोलवलकर से परामर्श लेकर मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को राष्ट्रीय जनसंघ की स्थापना की.

पहले आम चुनावों में तीन सांसद बने

1951-52 के आम चुनावों में राष्ट्रीय जनसंघ के तीन सांसद चुने गए, जिनमें एक डॉ. मुखर्जी भी थे. इसके बाद उन्होंने संसद के अंदर 32 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों के सहयोग से नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया. डॉ. मुखर्जी भारत की अखंडता और कश्मीर के विलय के दृढ़ समर्थक थे. उन्होंने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को भारत के बाल्कनीकरण की संज्ञा दी थी. अनुच्छेद 370 के राष्ट्रघातक प्रावधानों को हटाने के लिए भारतीय जनसंघ ने हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद के साथ सत्याग्रह आरंभ किया. डॉ. मुखर्जी 11 मई 1953 को कुख्यात परमिट सिस्टम का उलंघन करके कश्मीर में प्रवेश करते हुए गिरफ्तार कर लिए गए. गिरफ्तारी के दौरान ही विषम परिस्थितियों में 23 जून, 1953 को उनका स्वर्गवास हो गया. 

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ऐसे जनसंघ का हो गया विलय

इसके बाद जनसंघ के 1954 में अध्यक्ष बने मौलि चंद्र शर्मा. उनके बाद फिर 1955 में प्रेम नाथ डोगरा को अध्यक्ष बनाया गया. फिर आचार्य देवप्रसाद घोष ने जनसंघ की कमान 1956-1959 तक संभाली और फिर 1962 में भी अध्यक्ष बने. बीच में 1960 में पीताम्बर दास और 1961 में अवसरला राम राव को अध्यक्ष बनने का मौका मिला. रघु वीर 1963 में जनसंघ अध्यक्ष बने. इसके बाद जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में शामिल बलराज मधोक को 1966-1967 में अध्यक्ष बनाया गया. फिर दीनदयाल उपाध्याय 1967-1968 तक अध्यक्ष रहे. फिर बारी आए अटल बिहारी वाजपेयी ने 1968-1972 तक जनसंघ की कमान संभाली. उनके बाद लालकृष्ण आडवाणी 1973-1977 तक जनसंघ अध्यक्ष रहे. मगर 1977 में आपातकाल के बाद देश की हालत को देखते हुए जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया था. मगर ये सरकार अपना कार्यकाल तक पूरा नहीं कर पाई.

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फिर बनी बीजेपी और छा गई

इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और जनसंघ के पूर्व सदस्यों ने 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गठन किया. अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने. बीजेपी ने पहला आम चुनाव 1984 में लड़ा, लेकिन महज 2 सीटें ही जीत पाई. मगर फिर राम रथ यात्रा ने पार्टी की तकदीर और तस्वीर बदल दी. आज बंगाल को मिलाकर देश के 22वें राज्य में बीजेपी की सरकार बनने जा रही है. केंद्र सरकार में 4 बार सरकार का नेतृत्व कर चुकी बीजेपी, उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं को हमेशा यही लगता था कि जिस बंगाल से जनसंघ के जरिए बीजेपी की नींव पड़ी, वहां अपनी सरकार होनी चाहिए. अब वो सपना पूरा होने जा रहा है तो जाहिर है बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं का भावुक होना लाजिमी है.   

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