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बंगाल में मुस्लिम फैक्टर: 62 सीटों का वो गणित जिसने ममता बनर्जी को चौंकाया और बीजेपी को जिताया

Bengal Elections Result 2026: पश्चिम बंगाल चुनाव में मुस्लिम बहुल 62 सीटों के नतीजे बड़े संकेत दे रहे हैं. इसमें पहली बार बीजेपी ने 17 सीटों पर बढ़त बनाई है जबकि ममता बनर्जी 41 सीटों पर आगे दिखाई दीं. जबकि हुमायूं कबीर, अधीर रंजन चौधरी और RSMJP ने ममता बनर्जी के अजेय दुर्ग में सेंध लगाई है. इस रिपोर्ट में पढ़ें कैसे अल्पसंख्यक मतदाताओं का यह नया 'बंटवारा' बंगाल की राजनीति की पूरी पटकथा बदल रहा है."

बंगाल में मुस्लिम फैक्टर: 62 सीटों का वो गणित जिसने ममता बनर्जी को चौंकाया और बीजेपी को जिताया
  • पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल 62 सीटों में तृणमूल कांग्रेस ने 41 सीटें तो बीजेपी ने 17 सीटों पर बढ़त बनाई
  • मुस्लिम बहुल इलाकों में बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा करती है
  • वामपंथी दल और कांग्रेस मुस्लिम बहुल सीटों पर कमजोर होकर केवल एक-एक सीट तक सिमट गए
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Bengal Elections Muslim Votes: पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 के नतीजों से तस्वीर अब करीब-करीब साफ हो गई है. ये केवल जीत-हार की कहानी नहीं हैं, बल्कि उस सबसे बड़े सियासी बदलाव का संकेत हैं जिसने टीएमसी के सबसे सुरक्षित वोट बैंक में दरार डाल दी है. इन नतीजों में सबसे बड़ा उलटफेर मुस्लिम बहुल आबादी वाली उन 62 सीटों पर दिखा जो तृणमूल कांग्रेस (TMC) का अभेद्य किला कहा जाता रहा है. मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों से आ रहे आंकड़ों ने सभी को हैरान कर दिया है. NDTV के विशेष डेमोग्राफिक्स आंकड़ों के मुताबिक, इस बार अल्पसंख्यक मतदाताओं ने अपनी पुरानी परंपरा से हटकर कुछ अलग संकेत दिए हैं. इन सीटों पर इस बार मुकाबला केवल टीएमसी और बीजेपी के बीच नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय पार्टियों और कद्दावर निर्दलीय चेहरों ने भी दीदी के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा दी है. इस रिपोर्ट में पढ़िए क्या कहते हैं आंकड़े? सबसे पहले इन मुस्लिम बहुल सीटों का रिपोर्ट कार्ड पर बात . 

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अब ये भी जान लेते हैं कि आखिर इस बार के नतीजों क्या परिवर्तन दिखाई दे रहा है 

1. टीएमसी के 'गढ़' में पड़ गई दरार

भले ही ममता बनर्जी की टीएमसी ने 62 में से 41 सीटों पर अपना कब्जा बनाए रखा है, लेकिन पिछली बार की तुलना में बीजेपी की 17 सीटों पर बढ़त एक बड़े 'शिफ्ट' की ओर इशारा करती है. यह साफ है कि अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों में भी अब बीजेपी एक ताकत बनकर उभर रही है.

2. बीजेपी की 17 सीटों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक'

मुस्लिम बहुल इलाकों में बीजेपी का 17 सीटों तक पहुंचना इस चुनाव का बड़ा ट्विस्ट है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय भ्रष्टाचार, 'सिंडिकेट राज' और कुछ क्षेत्रों में विकास की कमी ने अल्पसंख्यक मतदाताओं के एक हिस्से को विकल्प सोचने पर मजबूर किया.

3. हाशिए पर वाम और कांग्रेस

मुस्लिम वोटों के लिए कभी पहली पसंद रहने वाले वामदल और कांग्रेस इन 62 सीटों पर महज 1-1 सीट तक सिमट कर रह गए हैं. इससे यह साफ होता है कि बंगाल का अल्पसंख्यक मतदाता अब 'टीएमसी बनाम बीजेपी' की सीधी लड़ाई में ही खुद को देख रहा है.
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4. हुमायूं कबीर का 'मुर्शिदाबाद धमाका'

पूर्व टीएमसी नेता हुमायूं कबीर की नई पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) ने मुर्शिदाबाद के समीकरण बदल दिए हैं. कबीर खुद रेजीनगर और नौदा जैसी सीटों पर टीएमसी और बीजेपी दोनों के लिए सिरदर्द बन गए हैं. उनके इस उभार ने यह साबित कर दिया है कि स्थानीय मुस्लिम नेतृत्व अब ममता बनर्जी के 'एकछत्र राज' को चुनौती देने के लिए तैयार है.

5. भांगड़ में RSMJP की धमक:

दक्षिण 24 परगना की चर्चित भांगड़ सीट पर इस बार RSMJP के अकबर अली मोल्ला ने सभी को चौंका दिया है. ताजा रुझानों में वे टीएमसी के कद्दावर नेताओं को पीछे छोड़ते हुए बढ़त बनाए हुए हैं. मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में टीएमसी का पिछड़ना बताता है कि ग्रामीण अल्पसंख्यक मतदाता अब नए विकल्पों की ओर देख रहे हैं.

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6. बहरामपुर में अधीर रंजन की 'अग्निपरीक्षा'

कांग्रेस के 'रॉबिनहुड' कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी अपनी पारंपरिक सीट बहरामपुर पर डटे हुए हैं. सुबह के रुझानों में पिछड़ने के बाद अब वे बीजेपी के सुब्रत मैत्र पर बढ़त बनाए हुए हैं. यह जीत या बढ़त संकेत है कि मुर्शिदाबाद में कांग्रेस का 'पंजा' अब भी अल्पसंख्यकों के एक हिस्से में अपनी पैठ रखता है.

कुल मिलाकर 62 मुस्लिम बहुल सीटों के ये आंकड़े महज चुनावी हार-जीत नहीं, बल्कि बंगाल की 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' में आए एक बड़े परिवर्तन की गवाही हैं. दशकों तक 'वोट बैंक' समझा जाने वाला अल्पसंख्यक समुदाय अब केवल एक झंडे के नीचे खड़ा होने के बजाय अपनी राजनीतिक ताकत का बंटवारा कर रहा है. हुमायूं कबीर और अकबर अली मोल्ला जैसे चेहरों का उभरना यह साफ संकेत है कि अब "बीजेपी का डर" दिखाकर एकमुश्त वोट हासिल करने का फॉर्मूला कमजोर पड़ रहा है. मतदाता अब अपनी शर्तों पर स्थानीय सशक्तिकरण और विकास का हिसाब मांग रहा है.

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