- बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में BJP ने पहली बार सरकार बनाकर राजनीतिक इतिहास में नया अध्याय लिखा है
- बीजेपी ने बंगाली सांस्कृतिक प्रतीकों और राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रयोग कर व्यापक जनसमर्थन हासिल किया है
- बीजेपी की रणनीति में ममता बनर्जी की सरकार की आलोचना, हिंसा का मुद्दा और भयमुक्त मतदान की गारंटी प्रमुख थी
जब देश की राजनीति में ये सांस्कृतिक घटनाएं घट रही थीं. जब वंदेमातरम् गाने पर विवाद चल रहे थे, तब किसी ने वर्ष 2026 की 4 मई के नतीजों के बारे में सोचा भी नहीं था. लेकिन बीजेपी ने बंगाली गौरव, बंगाली संस्कृति, बंगाली भद्रलोक के हर प्रतीक का गुणगान करके वो कर दिखाया जो बंगाल में अप्रत्याशित माना जा रहा है.
रच दिया इतिहास
पश्चिम बंगाल में सत्ता बहुत शर्मीली है. वो बार बार जीतने हारने का मौका नहीं देती है. जिसके सिर का ताज बनी वर्षों तक उसके गले का हार बनती रहती है. 1947 से 1967 तक कांग्रेसी सरकार रही. 1967 से 1977 तक संयुक्त मोर्चा सत्ता में रहा. कुछ दिन राष्ट्रपति शासन भी चला.1977 में वामवादी आए 34 साल सत्ता में रहे. 2011 में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आयी और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं.और अब 2026 है बीजेपी ने इतिहास रच दिया है.
तीन तिगाड़ा काम बनाया
- 2024: ओडीशा- बीजेपी ने पहली बार सरकार बनायी.
- 2025: दिल्ली में बीजेपी ने 27 साल बाद सरकार बनायी.
- 2026 पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने पहली बार सरकार बनायी.
- तीनों जगह बीजेपी ने जो चुनाव जीता वो असंभव के विरुद्ध माना गया है. तीन को अशुभ मानते हैं लेकिन बीजेपी ऑड के खिलाफ इवेन क्रिएट करने में हमेशा श्रेष्ठ मानी जाती है
बंगाल में सांस्कृति राष्ट्रवाद
बंकिम चंद्र चटर्जी. राजा राम मोहन राय.रविन्द्र नाथ टैगोर. स्वामी विवेकानंद. रामकृष्ण परमहंस. सुभाष चंद्र बोस. और वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के सम्मान तक हर बंगाली पहचान को सम्मान दिलाने का दावा बीजेपी करती है...बंगाल...बीजेपी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को बहुत सूट करता है.बंगाल की मिट्टी में वो इमोशन और सेंटीमेंट कूट कूट कर भरा है जो बीजेपी की राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स की खास पहचान है.आधुनिक भारत में इसके जनक बंकिमचंद्र चटर्जी ही माने जाते हैं.इस तरह से माना जा सकता है कि वामपंथ के गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में सेंट्रल लाइन पॉलिटिक्स को किनारे करके राइट विंग का झंडा फहराया गया है.

जहां बलिदान हुए मुखर्जी
बीजेपी का बड़ा पोलिटिकल नारा रहा है. जहां बलिदान हुए मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है और सारा का सारा है. इस नारे से कार्यकर्ता उत्साहित होता है लेकिन ये नारा बीजेपी के बांग्ला कनेक्शन को भी सेटेल करता है. आजादी की लड़ाई के साथ ही जब हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र की लड़ाई शुरू हुई तो जनसंघ के नेता और बीजेपी के विचार पुरूष श्यामाप्रसाद मुखर्जी का एजेंडा ही बीजेपी का सूत्रवाक्य बना. एक निशान, एक विधान, एक प्रधान. आज भी बीजेपी का चरम राष्ट्रवादी विश्वास है.इसके अलावा संविधान में अर्टिकल 370 हटाना हो.
कश्मीर से बंगाल तक तक घुसपैठ
श्यमाप्रसाद मुखर्जी कश्मीर में प्रवेश के लिए भारतीयों को परमिट की जरूरत का विरोध करते थे. इसी मुद्दे के विरोध में उनके जीवन का अंत भी हुआ.वो चाहते थे अखंड भारत.शर्तों के साथ भारत का विरोध करते थे. बीजेपी ने उनकी इसी भावना को अपनाया.वो अखंड भारत की राजनीति करती है. वो भारत में विदेशी घुसपैठियों का विरोध करती है.बंगाल के चुनाव में भी बीजेपी ने घुसपैठ को मुद्दा बनाया.केन्द्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेशी घुसपैठ को- अवैध मतदाता.शांति व्यवस्था.देश की सुरक्षा.महिला सुरक्षा.तस्करी.दंगे से जोड़ कर प्रचारित किया. विश्वास दिलाया की वो घुसपैठ रोक देंगे.

डेमोग्राफी चेंज
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बार बार बंगाल के वोटर को बताया कि पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में भाषा और समाज बदल रहा है. इसका कारण बांग्लादेश के घुसपैठिए हैं. केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वोटर को बताया कि कैसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पश्चिम बंगाल को बचाया वर्ना वो भी आज के बांग्लादेश का हिस्सा बन जाता है. इसके आगे की बात वोटर ने सोच ली कि जो बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ हुआ है वो कहीं पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं के साथ न शुरू हो जाए इसलिए उसने अपनी सुरक्षा के बारे में गंभीरता से सोचा.मतदान में इसने बड़ी भूमिका निभायी.धार्मिक ध्रुवीकरण में मदद मिली. वोटिंग प्रतिशत बढ़ा.
हिन्दू असुरक्षा और नमाज-हिजाब वादी राजनीति
बीजेपी ने अपने समूचे राजनीतिक अभियान में इस बात पर जोर दिया कि ममता बनर्जी की सरकार हिन्दू विरोधी है. मुस्लिम समर्थक है.जब ममता बनर्जी ने जयश्री राम का नारा लगाने वालों पर गुस्सा दिखाया तो इसे ममता बनर्जी के हिन्दू विरोध का पोस्टर बनाया गया.2023 और 2024 में रामनवमी जुलूस के दौरान हिंसा हुई थी.हाईकोर्ट के दखल के बाद ही जुलूस निकल सका था. रामनवमी की छुट्टी को लेकर भी ममता बनर्जी की सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया. हर कदम नें ममता विरोधी और बीजेपी समर्थक वोटर को एक साथ इकट्ठा किया.बीजेपी ने ममता बनर्जी की उन तस्वीरों का काफी प्रचार किया जिसमें उन्होंने अपने सिर को साड़ी के पल्ले से ऐसे ढका था जैसे हिजाब पहना हो.

मदीना बनाम काली
चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी की सांसद सायोनी घोष ने ‘दिल में मदीना' वाला गाना गया. योगी आदित्यनाथ ने उसके खिलाफ मां काली के बंगाल का नरेटिव क्रिएट किया. टीएमसी तुरंत डिफेंसिव हो गयी.अगली जनसभा से सयोनी घोष ने हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू कर दिया. काली स्तुति करने लगीं. सिख धर्म के धार्मिक उपदेश सुनाने लगीं. ममता बनर्जी ने भी पश्चिम बंगाल में जगन्नाथ पुरी मंदिर की नकल तैयार करवायी. कई जनसभाओं में देवी स्तुति का गान किया.विशेषज्ञों ने इसमें पढ़ा कि टीएमसी बीजेपी के एजेंडे में फंस गयी. डिफेंसिव हो गयी.
बाबरी बनाम राम मंदिर
पश्चिम बंगाल के चुनाव में हर कार्यकर्ता सम्मेलन में बीजेपी के बड़े बड़े नेताओं ने “जयश्री राम” के नारे लगवाए. हुमायूं कबीर के बाबरी मस्जिद आंदोलन को हिन्दुओं के खिलाफ चुनौती की तरह पेश किया. पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार में राम मंदिर निर्माण का भी जमकर जिक्र किया गया. हिन्दू असुरक्षा को हर तरीके से उभारा गया जिससे हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण में मदद मिली.

भय से मुक्ति
बंगाल में राजनीतिक विजय के लिए बीजेपी ने भय से मुक्ति को अपना सूत्र वाक्य बनाया है. उन्होंने बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ को सामान्य बंगाली की सुरक्षा से जोड़ दिया. मां-बहन-बेटी-घर-संपत्ति की असुरक्षा से जोड़ दिया.दंगे से जोड़ दिया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब 15 अगस्त 2025 को देश के डेमोग्राफिक असंतुलन की बात कही तो शायद किसी ने ये न सोचा होगा कि उसका विस्तार पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तक होगा. लेकिन जब चुनाव शुरू हुए तो डेमोग्राफी का असंतुलन बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया.
CAA का रिवर्स स्विंग
CAA को बीजेपी ने वोटरलिस्ट का शुद्धिकरण कहां. पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों ने इसे एंटी मुस्लिम कहा. प्रो बीजेपी वोटर बढ़ाने की कवायद कहा.सुप्रीमकोर्ट तक पहुंचे लेकिन फैसला कुछ नहीं हुआ.लेकिन पश्चिम बंगाल के न्यूट्रल,लिबरल और प्रोग्रेसिव वोटर को CAA के विरोध में राजनीतिक झूठ और सनक दिखी. हिन्दू वोटर ने माना कि वोटरलिस्ट में ऐसे वोटर हैं जो हिन्दू हित के खिलाफ हैं उनको निकाला जाना अच्छी बात है.संविधान और सरकार पर विश्वास रखने वाले सरकारी कर्मचारी या नॉर्मल वोटर को CAA के विरोध में एंटी स्टेट नक्सल सोच के दर्शन हुए.
खुलेआम हिन्दू-हिन्दू
शुभेन्दु अधिकारी जैसे बीजेपी के नेताओं ने खुलेआम हिन्दू-मुस्लिम वोट का इस्तेमाल किया. शुभेन्दु अधिकारी तो हिन्दू EVM और मुस्लिम EVM जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते सुने गए.इसकी वजह से हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण करने में मदद मिली.
कुछ खास है ये तारीख:
- 30 दिसंबर 2018:- अंडमान-निकोबार में रॉस आईलैंड का नाम बदलकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वीप
- 23जनवरी 2021:- नेताजी सुभाषचंद्र बोस जन्मशती के 125वर्ष का उत्सव पूरे एक साल
- 8 दिसंबर 2022:- जब इंडिया गेट के बगल में सुभाषचंद्र बोस की काली ग्रेनाइट प्रतिमा का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया तो किसी को 4 मई 2026 के नताजों का इल्म भी नहीं था.
- 7 नवंबर 2025:- वंदेमातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर डाक टिकट, सिक्का जारी किया गया
- 8-9 दिसंबर 2025:- वंदेमातरम् पर संसद में विशेष चर्चा हुई
- 6 फरवरी 2926:- वंदेमातरम् के 6 छंद गाने की घोषणा,वंदेमातरम् का प्रोटोकाल
- 23 जनवरी से 29 जनवरी- गणतंत्र दिवस उत्सव में नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती शामिल
विभाजन-हिन्दू वोट-बंगाली अस्मिता और पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में चुनाव की तैयारी बीजेपी ने काफी पहले से शुरू कर दी थी. पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव के बाद पूरे देश में ऐसे आयोजन और व्यक्तियों को सेलिब्रेट किया गया जिनका पश्चिम बंगाल से महत्वपूर्ण रिश्ता है. लेकिन रूझान वही रखा गया. राष्ट्रवाद और हिन्दू हित की बात.अब ये संयोग है या सटीक प्रयोग की पश्चिम बंगाल का चुनाव हिन्दू और मुसलमान की चुनावी गली में आकर फंस गया. विशेषज्ञों का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी यही चाहती थीं कि धर्म के आधार पर सीधा-सीधा ध्रुवीकरण हो जाए. जैसा कि अभी हमने आपको दिखाया भी कि कैसे दक्षिण पंथी राजनीति लगाातर हिन्दू हित पर आधारित है. ऐसा होने की उचित जमीन पश्चिम बंगाल में मौजूद हैं.
बीजेपी अपवाद नहीं है. घुसपैठ से समस्या यूं है कि...धर्म के नाम पर जब देश बंटा तो कहा गया कि जिसने जो मांगा वो वहां रहे...घुसपैठ न करे. ये सेंटीमेंट उस पूर्वोत्तर भारत में सबसे ज्यादा है जिसने विभाजन की हिंसा झेली. बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध का साक्षि बना और विभाजन के बाद से घुसपैठ भी बर्दाश्त कर रहा है. ऐसे प्रदेश में चुनाव की रणनीति बहुत सीधी है.धार्मिक तुष्टिकरण.और ये आज से नहीं अस्सी के दशक है.जब बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में हरिप्रद भारत उर्फ मास्टर मोशाय को अपना पहला अध्यक्ष बनाया था.
2026 तक BJP को कौन लाया?
हरिप्रद भारती उर्फ मास्टर मोशाय 1980 से 1982 तक पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पहले अध्यक्ष रहे. उसके बाद विष्णुकांत शास्त्री. सुकुमार बनर्जी. तपन सिकदर. असीम कुमार घोष.तथागत रॉय.सुकुमार बनर्जी. सत्यब्रत मुखर्जी.राहुल सिन्हा. दिलीप घोष.सुकांता मजूमदार.समिक भट्टाचार्या. पश्चिम बंगाल में बीजेपी के अध्यक्ष बने.
14 प्रेसीडेंट. 46 साल. 0 से 190 से ऊपर MLA. का सफर पूरा हुआ. ये यात्रा बहुत रोचक है. लेफ्ट के खिलाफ राइट की वैचारिक गुंजाइश सबसे ज्यादा थी लेकिन सेंटर वाले जोर लगा कर बैठे रहे. वैचारिक आदर्श की सबसे उपजाऊ जमीन पर पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सत्ता वाली यात्रा हैरान करती है.
बीजेपी के संघर्ष का अंकगणित
1982 से 2011 तक 7 विधानसभा चुनाव हुए लेकिन बीजेपी का स्कोर रहा 0 और वोटों का प्रतिशत 1991 में 11.34% तक पहुंच गया लेकिन 2011 में गिरते गिरते 4% तक पहुंच गया. 2016 में वोट 10% और विधायक 3 बने और 2021 में वोट 38% और विधायक 77 हो गए थे और अब वोट प्रतिशत 40 से ऊपर और सीटें 190 पार हो गईं.
बलिदान का प्रचार
पश्चिम बंगाल में हिंसक राजनीति का इतिहास है. वामपंथी सत्ता में आए तो कांग्रेसी हिंसा का मातम मनाते थे.वाम हिंसा के आंकड़े ममता बनर्जी गिनाती हैं. बीजेपी ने तृणमूल की हिंसा को मुद्दा बनाया.जनसभाओं में दावा किया गया कि 2014 के बाद से करीब 250 बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या की गयी है. पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की वारदात हमेशा सुनाई देती हैं. वोट न देने देना.पर्चा न भरने देना.प्रचार न करने देना.वोट न देने पर घर पर हमला जैसी बातें आम हैं. बीजेपी ने इस पूरे व्यॉलेंस सिस्टम को अपा ने प्रचार का हिस्सा बनाया.नतीजे बताते हैं वोटर ने इसपर विश्वास किया.

बीजेपी की जीत के की-वर्ड
बंगाली गौरव . बंगाली भद्रलोक . बंगाली संस्कृति . भय नहीं भरोसा. भय के विनाश.ममता के गुंडे, के सेंटीमेंट को खूब बढ़ा-चढ़ा कर वोटर के बीच परोसा. ये दिखाया कि वही बांग्ला गौरव के योग्य संरक्षक हैं. BJP की तो जड़े बंगाल से जुड़ी हैं. अब इसके बाद जो दूसरा बड़ा प्रयोग बीजेपी की चुनावी रणनीति में देखने को मिला वो था पूरे चुनाव प्रचार में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह. और नरेन्द्र मोदी ने का दावा किया. बीजेपी ने प्रचार किया कि ममता बनर्जी की पार्टी और कार्यकर्ता गुडे हैं..बंगाल का आम वोटर उनके डर की वजह से ममता बनर्जी को वोट देता है.अब डरने की जरूरत नहीं है. 4 मई के बाद भी केन्द्रीय फोर्सेस बंगाल में बनी रहेंगी ताकि बीजेपी को वोट देने वाले किसी हिंसा का शिकार न हों. मतलब भयमुक्त हो कर वोट करें. 4 मई के बाद तृणमूल के कथित गुंडों को चुन-चुन कर जेल भेजा जाएगा जब रिकॉर्ड 92.8% वोट पड़ा तो बीजेपी ने इसे ऐसे प्रचारित किया मानो ये भयमुक्ति का वोट है. सुरक्षा की गारंटी में एंटी ममता वोटिंग हुई है.
TMC का भय नहीं BJP का भरोसा और उल्टा करके सीधा कर देंगे
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रचार के दौरान कहा “ममता के गुड़ों को चुन-चुन कर ठीक करेंगे”.कानून का राज चलेगा.भय नहीं बीजेपी का भरोसा जीतेगा. केन्द्रीय गृहमंत्री अमितशाह ने कहा कि “23 को मतदान के समय कोई गुंडा घर से न निकले वर्ना 4 मई के बाद उल्टा करके सीधा कर देंगे”
ये दो डायलॉग नहीं पश्चिम बंगाल में बीजेपी की पूरी स्ट्रेटजी हैं. डर के आगे जीत है बीजेपी का सूत्रवाक्य हो गया. प्रचार में बार बार इसबात पर जोर दिया गया कि मतदान के बाद केन्द्रीय फोर्स पश्चिम बंगाल में रहेगी. मतलब अगर ममता को वोट नहीं किया तो राजनीतिक हिंसा की आशंका न के बराबर है. चुनाव आयोग का दावा है कि ढाई लाख केन्द्रीय सुरक्षाबल ने हिंसामुक्त निष्पक्ष चुनाव करवाए. यूट्यूबर कहते हैं कि यूपी के IPS अजयपाल शर्मा के कड़क तेवर वाले वीडियो काम कर गए.वोटर को लगा भयमुक्त वोटिंग संभव है.

राजनीति या नौकरी?
स्थानीय राजनेता और बीजेपी के नेता दावा करते हैं कि.पश्चिम बंगाल में राजनीति का तरीका अलग है. बाकी देश में अगर आप किसी से पूछें कि क्या काम करते हो? तो जवाब में नौकरी,व्यापार या बेरोजगार कहेगा.लेकिन पश्चिम बंगाल में एक और कैटेगरी है- राजनीतिक कार्यकर्ता कहते हैं कि हम TMC करते हैं,बीजेपी करते हैं,कांग्रेस करते हैं,लेफ्ट करते हैं.इसका मतलब ये कि राजनीतिक कार्य में उनकी रोजी रोटी का पक्का इंतजाम होता है. सरकार इस बात की गारंटी देती है कि वर्कर की रोजीरोटी का इंतजाम करेगी बदले में वो जी जान से पार्टी के लिए काम करेगा और सत्ता बचाने में लगा रहेगा क्योंकि सत्ता गयी तो घर का चूल्हा ठंडा हो जाएगा. इसीलिए पश्चिम बंगाल में जो दल पंचायत से शहर के मोहल्ले तक अपने कार्यकर्ता को कमाई के सिस्टम से जोड़ देता है सरकार उसकी बन जाती है.टिक जाती है. सुभेन्दु अधिकारी जो टीएमसी में थे और बीजेपी में हैं इस पूरे सिस्टम को विस्तार से समझाते और बताते हैं.
ममता के गढ़ में घुसकर लड़ने का प्लान
BJP की रणनीति में एक बात और खासतौर पर देखने को मिली, सीधी मुठभेड़, वोटर के मन में टीएमसी के खिलाफ विश्वास घटाने और BJP का भरोसा बढ़ाने के लिए सुभेन्दु अधिकारी को सीधा ममता बनर्जी के खिलाफ प्रत्याशी बनाया गया. ये सोची समझी चाल थी. ममता हारेंगी तो उनका सपोर्टर भी हारेगा.ममता का वोट घटेगा.

गुस्से को हथियार बनाया
बीजेपी ने अपना पूरा प्रचार और चुनावी मैनेजमेंट. ममता के प्रति लोगों के मन में आयी नाराजगी. TMC वर्कर के प्रति गुस्सा.सरकार के प्रति गुस्सा. ममता के प्रो मुस्लिम स्टैंड पर गुस्सा. लंबे शासन के प्रति ऊब. हिन्दू-मुस्लिम मतभेद. भय की जगह भरोसा के इर्द-गिर्द तैयार किया. ममता के प्रति सम्मान दिखाते हुए भी उनके शासन को जड़ से उखाड़ने का प्रचार बार बार किया ताकि महौल बने की ममता बनर्जी की सरकार लौट कर नहीं आएगी.
टाटा-बाय-बाय-बंगाल की खाड़ी अबकी ममता की बारी
अमित शाह ने अपने चुनावी भाषणों में ममता बनर्जी को बार बार- बाय-बाय बोला.इस डायलॉग को चुनावी नतीजे में बदलने के लिए पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने चरणबद्ध तरीके से काम किया. ग्राम पंचायत से लेकर शहर के मोहल्ले तक अपनी रणनीति तैयार की. हर जगह और हर स्तर पर इस जगह का खास ख्याल रखा गया कि ममता का अपमान न हो लेकिन उसके प्रति नाराजगी का भी पूरा सम्मान हो सके.वैसे तो कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में जाति और धर्म का कार्ड नहीं चलता. ध्रुवीकरण धर्म के आधार पर नहीं होता लेकिन इस दावे में दम नहीं लगता है क्योंकि बीजेपी ने धर्म.जाति. और संस्कृति के इर्द-गिर्द ही सब प्लान किया.

हरी फाइल का हॉरर
सबको ममता का ये वीडियो याद होगा. ममता का चुनाव मैनेजमेंट संभालने वाली कंपनी पर जब ED रेड पड़ी तो कैसे ममता बनर्जी छापे में घुसी और फाइल लेकर बाहर निकल आयीं. इस तस्वीर को BJP ने ममता बनर्जी के परिवार, सरकार के करप्शन औऱ ममता बनर्जी की तानाशाही का प्रतीक बना कर पेश किया
राजभवन की जंग
कोलकाता राजभवन औऱ सरकार के बीच चले संग्राम की तस्वीरें सबको याद हैं. इसके जरिए बीजेपी ने साबित किया कि ममता बनर्जी को संविधान पर भरोसा नहीं है उनकी कार्यशैली नक्सलियों के जैसी है इसकी वजह से एंटी लेफ्ट वोट ममता के प्रति शंका से भर गया.
वोटर वाली ट्रेन
आपको याद होगा ये वीडियो जो पश्चिम बंगाल के लिए वोटर ले जाने का दावा करती थीं.माना जाता है कि बीजेपी हर चुनाव से पहले कुछ प्रतिशत नया वोटर लाती है तो उस श्रेणी में इसे भी जीत के मैनेजमेंट का हिस्सा बताया गया.
नितिन "नवीन"
पश्चिम बंगाल में पार्टी के साथ भद्रलोक और कायस्थ वोट को जोड़ने के लिए बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन का भी बेहतर इस्तेमाल किया गया.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी के चुनाव प्रबंधन के कमांडर
अमित शाह के नेतृत्व में एक प्रारंभिक टीम बनी. जिसमें सेकेंड इन कमांड थे सुनील बंसल जिन्हें काफी पहले ही प्रभारी का काम सौंपा गया था. और उसके बाद भूपेन्द्र यादव. जो कि चुनाव के प्रभारी मंत्री थे. इनके नीचे दिलीप घोष जिनसे वर्कर जुड़ा हुआ था. समीत भट्टाचार्य जो बंगाली चुनाव के भद्रलोक का चेहरा बने. और फिर शुभेन्दु अधिकारी जिन्हें स्ट्रीट फाइटर की तरह हर जगह इस्तेमाल किया गया. इसके अलावा सुनील बंसल के साथ जैसा कि हम सबलोग जानते हैं कि बीजेपी के पास चुनाव लड़ने की एक वेल ऑयल्ड मशीनरी है. हर चुनाव से पहले वो सिस्टम एक्टिव हो जाता है. इसे ऐसे समझें
प्रचार का अंकगणित
- बीजेपी की जीत को मुमकिन बनाने वाले प्रचार का अंकगणित समझ लीजिए.
- 50 केन्द्रीय नेताओं की चुनाव में ड्यूटी लगाई गयी. 400 नेता BJP के अनुषांगिक संगठनों से तैनात किए गए थे. 900 नेता ऐसे थे जो पश्चिम बंगाल में बाहर से आए थे. 294 विधानसभा प्रभारी .
- 43 संगठन जिला प्रभारी.10 विभाग प्रभारी.05 ज़ोन प्रभारी. 294 विस्तारक प्रति असेंबली,छह महीने से काम कर रहे थे. सके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जमीनी काम सालों पहले से जारी था.
नरेटिव बनाने वाले रैली-रोडशो:
21 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली,रोडशो. 40 गृहमंत्री अमित शाह की रैली,रोडशो.14 योगी आदित्यनाथ की रैली,रोडशो. 17 नितिन नवीन की रैली
विजय की परिक्रमा और पूर्व तैयारी
चुनाव की चरणबद्ध तैयारी को असान भाषा में ऐसे समझिए.
टोली नंबर-1
सबसे पहले पश्चिम बंगाल के बाहर से पदाधिकारी.सांसद.विधायक.सक्रिय कार्यकर्ताओं की एक टोली पहुंचती है. वो निर्धारित विधानसभाओं में जनसंपर्क करके पार्टी की मौजूदगी और सक्रियता के सबूत देती है.जिससे लगता है कि bjp जोरदारी से मैदान में है.
टोली नंबर-2
इसके बाद ऐसी टोली पहुंचती है जिसमें स्थानीय समुदाय.जाति.धर्म.क्षेत्र.प्रवासी. लोगों के परिचित
होते हैं. ये वोटर के साथ bjp के परिचय को गहरा बनाते हैं.पार्टी के वोटबैंक में खींचते हैं.पर्सनल टच की राजनीति
टोली नंबर-3
चुनाव प्रचार और सूचना प्रसार से जुड़े लोगों से बनती है.इसमें ज्यादा बड़ा
हिस्सा स्थानीय लोगों का होता है.ये पार्टी के एजेंडे.मेनिफेस्टो को आम वोटर तक पहुंचाते हैं
टोली नंबर-4
वोटिंग मैनेजमेंट के लोग होते हैं. पन्ना प्रमुख.पेज प्रमुख जैसे लोग.जिनपर वोटिंग के दिन वोटर को घर से निकाल कर पोलिंग बूथ तक लाने और वोट डलवाने की जिम्मेदारी होती है.
टोली नंबर-5
इन्फॉरमेशन और सोशलमीडिया एक्सपर्ट की मदद से तैयार होती है और वोटर्स के बीच में नरेटिव बनाने और बिगाड़ने का काम करती है.
चुनाव प्रबंधन के इस विजिबिल सिस्टम के अलावा भी कई तरह के लोग और तंत्र सक्रिय रहते हैं जो धीरे धीरे बीजेपी को जीत की ओर खींचने का काम करते हैं. और इस तरह से वो तस्वीर तैयार हुई जिसे भारतीय राजनीति के इतिहास में बड़ी घटना की तरह देखा और पेश किया जा रहा है.
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