- गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि वो 2029 से पहले 21 राज्यों में यूसीसी लागू करना चाहते हैं
- बीजेपी की सहयोगी जेडीयू शुरू से इसका विरोध करती आई है
- बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार ने कहा था कि वो किसी कीमत पर इसे लागू नहीं होने देंगे
मेरी आवाज ही पहचान है, गर याद रहे...लेकिन याद तब रहेगा जब कोई आवाज आए. और इन दिनों बिहार में उस पार्टी से आवाज कम आ रही है जिसकी हाल-फिलहाल तक बिहार में तूती बोलती थी. पार्टी है जेडीयू यानी जनता दल यूनाइटेड और मुद्दा है यूसीसी यानी कॉमन सिविल कोड या समान नागरिक संहिता. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों कहा कि वो बीजेपी या एनडीए शासित 21 राज्यों में 2029 से पहले यूसीसी लागू करना चाहते हैं. जेडीयू के बड़े नेता इस ऐलान पर किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आ रहे हैं. एक श्याम रजक को छोड़कर किसी जेडीयू नेता ने पार्टी का स्टैंड साफ नहीं किया. ये बात बिहार की बदलती राजनीति के बारे में बहुत कुछ कहती है.
सीएम सम्राट चौधरी, डेप्युटी सीएम विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र यादव

नीतीश ने कहा था-किसी कीमत पर यूसीसी नहीं
कभी यूसीसी पर जेडीयू का स्टैंड एकदम साफ था. वो इसका विरोध करती थी. महज तीन साल पहले खुद नीतीश कुमार ने कहा था कि बिहार में किसी भी कीमत पर यूसीसी लागू नहीं होने देंगे. अब नीतीश बिहार से विदा हो चुके हैं. वही पार्टी का चेहरा थे और हैं. लेकिन वो चुप हैं और पार्टी साफ बोल नहीं रही है. तो कहीं ऐसा मैसेज न चला जाए कि जेडीयू की विचारधारा का बीजेपी की विचारधारा में रेगुलराइजेशन हो गया है. पार्टी ने 18 सितंबर को सभी सांसदों और विधायकों की एक बैठक बुलाई है. अभी पता नहीं है कि इसमें यूसीसी पर चर्चा होगी या नहीं?
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बड़ा पेचीदा है मामला
दरअसल ये मामला बहुत पेचीदा है. यूसीसी पर पार्टी खुलकर बोलेगी तो उसे ये भी तय करना होगा कि वो किस हद तक जा सकती है. नीतीश कुमार पार्टी में धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं. अब जब वो बिहार में नहीं हैं और पूरी तरह से एक्शन में भी नहीं हैं तो क्या पार्टी के बाकी लोग मोर्चा संभालेंगे, ये बड़ा सवाल है. आखिर जेडीयू बीजेपी के साथ बिहार में सरकार चला रही है. उधर बीजेपी भी इसे कितना पुश करेगी ये भी देखना होगा. बिना जेडीयू के बीजेपी की बिहार सरकार चलने वाली नहीं. केंद्र में भी बीजेपी को जेडीयू का समर्थन चाहिए. इसी तरह बीजेपी को केंद्र में टीडीपी भी चाहिए. टीडीपी भी फिलहाल इसपर चुप है.

नीतीश कुमार की पार्टी के अलग-अलग सुर
जेडीयू की अलग पहचान नहीं, तो जान नहीं
बीजेपी-जेडीयू को एक दूसरे का साथ चाहिए, ये तो हुई वर्तमान की बात लेकिन भविष्य का क्या? क्या आज बचाने के लिए जेडीयू अपना कल खो देगी? पार्टी अपनी पहचान से समझौता करती है तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. अगर बीजेपी और जेडीयू में विजिबल अंतर नहीं रहा तो बिहार का वोटर इसे कैसे देखेगा? वो कौन सी वजहें होंगी जिसके कारण वोटर बीजेपी के बजाय जेडीयू को वोट देगा. अब जब चुनाव होंगे तो सम्राट सरकार के काम का मूल्यांकन होगा. काम अच्छा हुआ तो सम्राट को इनाम मिलेगा. काम खराब हुआ तो सजा मिलेगी. लेकिन जेडीयू क्या लेकर चुनाव के मैदान में जाएगी. नीतीश का पुराना काम, कितना काम आएगा? यूसीसी जैसे मुद्दों पर जेडीयू का अलग स्टैंड नहीं होगा, उसकी अपनी कोई आवाज नहीं होगी तो फिर उसका क्या औचित्य रह जाएगा? यहां चर्चा ये नहीं है कि यूसीसी खराब है या नहीं, चर्चा है स्टैंड बदलने का. पिछले कुछ चुनाव में जेडीयू को 5-11% तक मुस्लिम वोट मिलते रहे हैं. नीतीश के जाने और यूसीसी जैसे मुद्दों पर जेडीयू के बदले स्टैंड से पार्टी का मुसलमान वोटर छिटक सकता है. अल्पसंख्यक ही नहीं जेडीयू का जो सेक्युलर वोट है, वो भी नाराज हो सकता है. ये हुआ तो बिहार में सियासत शिफ्ट हो सकती है. जेडीयू आज एक अजीब सियासी दोराहे पर खड़ी है.
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