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तमिलनाडु की सियासी जमीन पर चमका नया सितारा, लेकिन बहुमत से अब भी 10 कदम की दूरी... सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए अब क्या करेंगे थलापित विजय

चुनाव प्रचार में विजय ने खुद को ‘द्रविड़ राजनीति के विकल्प’ के रूप में पेश किया. उन्होंने DMK और BJP दोनों पर तीखे हमले किए. ऐसे में अब किसी भी बड़े दल के साथ जाना उनके उस नैरेटिव को कमजोर कर सकता है, जिसने उन्हें यहां तक पहुंचाया. दूसरी तरफ, अगर वह ‘प्योर’ राजनीति पर टिके रहते हैं और गठबंधन से बचते हैं, तो सत्ता उनसे दूर रह सकती है.

तमिलनाडु की सियासी जमीन पर चमका नया सितारा, लेकिन बहुमत से अब भी 10 कदम की दूरी... सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए अब क्या करेंगे थलापित विजय
नई दिल्ली:

तमिलनाडु की राजनीति में यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण बदलने का संकेत भी है. अभिनेता से नेता बने थलापति विजय ने अपने पहले ही चुनाव में स्थापित द्रविड़ दलों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए खुद को सबसे बड़े खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया है. उनकी पार्टी TVK 108 सीटों पर जीत के साथ राज्य में खुद को स्थापित कर चुकी है, लेकिन 118 के बहुमत के आंकड़े से अब भी 10 कदम की दूरी सत्ता की राह को जटिल बना रही है.

यह परिणाम एक स्पष्ट संदेश देता है. तमिलनाडु की जनता बदलाव चाहती है, लेकिन पूर्ण सत्ता किसी एक के हाथ में सौंपने को अभी तैयार नहीं है. ऐसे में ‘किंग' बनने के बाद ‘किंगमेकर' बनने की चुनौती अब खुद विजय के सामने है.

द्रविड़ राजनीति के बीच तीसरे ध्रुव का उभार

तमिलनाडु में एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता जैसे फिल्मी चेहरों ने पहले भी राजनीति में सफलता पाई है, लेकिन रजनीकांत और कमल हासन जैसी बड़ी हस्तियां अपनी लोकप्रियता को वोट में तब्दील नहीं कर सकीं. विजय इस पैटर्न को तोड़ते दिखे.

जीत के बाद प्रमाणपत्र लेते विजय

जीत के बाद प्रमाणपत्र लेते विजय

उनकी रैलियों में उमड़ी भीड़, खासकर युवाओं और शहरी मतदाताओं की भागीदारी, यह बताती है कि TVK ने ‘एंटी-इन्कम्बेंसी' और ‘नए विकल्प' दोनों भावनाओं को सफलतापूर्वक कैश किया. दलित और ईसाई वोट बैंक में सेंध, जो परंपरागत रूप से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ जाता था, इस बार निर्णायक रूप से खिसकता दिखा.

विजय के सामने चार रास्ते

अब असली लड़ाई चुनाव जीतने की नहीं, सरकार बनाने की है. विजय के सामने चार स्पष्ट विकल्प हैं. लेकिन हर विकल्प अपने साथ राजनीतिक कीमत और जोखिम लेकर आता है.

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1. कांग्रेस के साथ गठबंधन 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पहले ही समर्थन का संकेत दे चुकी है. यह विजय के लिए सबसे सहज रास्ता हो सकता है. कम वैचारिक टकराव, और तुरंत बहुमत के करीब पहुंचने का मौका. लेकिन सवाल यह है कि क्या विजय ‘नई राजनीति' के अपने नैरेटिव को बनाए रखते हुए कांग्रेस के साथ खड़े दिखना चाहेंगे?

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2. NDA या BJP का साथ: वैचारिक समझौते की चुनौती

भारतीय जनता पार्टी को विजय पहले ही ‘वैचारिक दुश्मन' बता चुके हैं. ऐसे में NDA के साथ जाना उनके कोर वोटर खासतौर पर अल्पसंख्यक और उदारवादी वर्ग को असहज कर सकता है. हालांकि, अगर सत्ता प्राथमिकता बनती है, तो राजनीति में ‘नो परमानेंट फ्रेंड, नो परमानेंट एनिमी' का सिद्धांत भी लागू हो सकता है.

3. AIADMK के साथ पोस्ट-पोल डील 

अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ गठबंधन सबसे व्यवहारिक विकल्प दिखता है. चुनाव से पहले बातचीत टूटी थी, लेकिन अब सत्ता की जरूरत दोनों को करीब ला सकती है. AIADMK भी पुनर्जीवन की तलाश में है और विजय के साथ आना उसके लिए ‘पॉलिटिकल ऑक्सीजन' साबित हो सकता है.

तमिलनाडु में जीत का जश्न मनाते TVK कार्यकर्ता.

तमिलनाडु में जीत का जश्न मनाते TVK कार्यकर्ता.

4. छोटे दल + निर्दलीय का ले सकते हैं सहारा

पट्टाली मक्कल काची, देसिया मुरपोक्कु द्रविड़ कड़गम, विदुथलाई चिरुथैगल काची और अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर विजय ‘थर्ड फ्रंट' मॉडल बना सकते हैं. यह विकल्प उन्हें पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता देगा, लेकिन स्थिरता पर सवाल खड़े करेगा. क्योंकि ऐसी सरकारें अक्सर दबाव में रहती हैं.

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क्या विजय अपने ही नैरेटिव से समझौता करेंगे?

चुनाव प्रचार में विजय ने खुद को ‘द्रविड़ राजनीति के विकल्प' के रूप में पेश किया. उन्होंने DMK और BJP दोनों पर तीखे हमले किए. ऐसे में अब किसी भी बड़े दल के साथ जाना उनके उस नैरेटिव को कमजोर कर सकता है, जिसने उन्हें यहां तक पहुंचाया. दूसरी तरफ, अगर वह ‘प्योर' राजनीति पर टिके रहते हैं और गठबंधन से बचते हैं, तो सत्ता उनसे दूर रह सकती है.

किंग बने विजय, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू

तमिलनाडु में यह जनादेश अधूरा नहीं, बल्कि ‘संतुलित' है. जहां जनता ने बदलाव तो चुना है, लेकिन पूरी ताकत किसी एक को नहीं दी. एम के स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और AIADMK के बीच दशकों से चल रही राजनीति के बीच अब विजय तीसरे ध्रुव के रूप में उभरे हैं. लेकिन राजनीति में उभरना जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल होता है टिके रहना. विजय के सामने अब असली चुनौती है, क्या वो ‘सिस्टम बदलने' की राजनीति करेंगे या ‘सिस्टम का हिस्सा' बनकर सत्ता हासिल करेंगे?

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