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पति ने 3 महीने में 3 बार कहा 'तलाक', हाईकोर्ट बोला- इस तरीके पर नहीं है भारत में कानूनी रोक

मुस्लिम तलाक के एक मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि 'तलाक-ए-हसन' प्रतिबंधित नहीं है. इसमें पति ने तीन अलग-अलग महीने में तीन बार तलाक कहा था. कोर्ट ने नए असम कानून के तहत रजिस्ट्रेशन का निर्देश दिया और पत्नी को चुनौती देने का अधिकार भी बरकरार रखा. क्या है मामला जानिए इस रिपोर्ट में

पति ने 3 महीने में 3 बार कहा 'तलाक', हाईकोर्ट बोला- इस तरीके पर नहीं है भारत में कानूनी रोक

क्या तीन अलग-अलग मौकों पर 'तलाक' बोलकर शादी खत्म की जा सकती है? गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने कुछ ऐसा ही मामला पहुंचा, जहां एक शख्स ने दावा किया कि उसने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत 'तलाक-ए-हसन' दिया है और अब उसके रजिस्ट्रेशन की जरूरत है. सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि 'तलाक-ए-हसन' भारत में प्रतिबंधित नहीं है. हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि ऐसे मामलों का रजिस्ट्रेशन अब पुराने नहीं, बल्कि असम के नए कानून के तहत होगा. दरअसल हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण देव चौधरी की अदालत में याचिकाकर्ता ने बताया कि उसकी शादी 2016 में हुई थी, लेकिन कुछ वर्षों बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद बढ़ने लगे. उसके अनुसार, 2018 में उसकी पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर चली गई और इसके बाद दोनों के बीच दूरी लगातार बनी रही.

सुलह की कोशिशें हुईं, लेकिन बात नहीं बनी

याचिकाकर्ता का कहना था कि रिश्ते को बचाने के लिए कई बार समझौते और सुलह की कोशिशें की गईं. हालांकि ये प्रयास सफल नहीं हुए. आखिरकार उसने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत 'तलाक-ए-हसन' का रास्ता अपनाने का फैसला किया. उसने अदालत को बताया कि 22 मार्च, 26 अप्रैल और 27 मई 2026 को उसने अलग-अलग अवसरों पर तलाक का उच्चारण किया. इसके बाद उसने संबंधित प्राधिकरण के पास तलाक के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन दिया, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका. यहीं से विवाद अदालत तक पहुंचा.

अदालत में क्या था असली विवाद?

पहली नजर में आपको मामला तलाक की वैधता का लग सकता है, लेकिन अदालत के सामने बड़ा सवाल यह भी था कि रजिस्ट्रेशन होगा तो किस कानून के तहत होगा. याचिकाकर्ता की दलील थी कि 'तलाक-ए-हसन' पर भारत में कोई कानूनी रोक नहीं है और उसने धार्मिक कानून के मुताबिक आवश्यक प्रक्रिया पूरी की है. इसलिए उसके तलाक का पंजीकरण किया जाना चाहिए. दूसरी तरफ राज्य सरकार ने कहा कि जिस कानून के तहत पहले ऐसे मामलों का रजिस्ट्रेशन होता था, वह अब अस्तित्व में नहीं है. असम में लागू 1935 का पुराना कानून खत्म किया जा चुका है और ऐसे में उस कानून के तहत नियुक्त प्राधिकरण के पास अब किसी तलाक का पंजीकरण करने का अधिकार नहीं है.

नए कानून के तहत होगी जांच

अपने आदेश में जस्टिस चौधरी ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा अपनाया गया 'तलाक-ए-हसन' भारत में प्रतिबंधित नहीं है और मौजूदा समय में इसे वैध माना जाता है. हालांकि अदालत ने पुराने बारपेटा प्राधिकरण को तलाकनामा पंजीकृत करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि 1935 का कानून खत्म हो चुका है और उसके तहत बनाया गया पद भी अब अस्तित्व में नहीं है. 

 इसके बजाय अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह असम कंपल्सरी रजिस्ट्रेशन ऑफ मुस्लिम मैरिजेज एंड डिवोर्स एक्ट, 2024 के तहत क्षेत्राधिकार वाले मैरिज एंड डिवोर्स रजिस्ट्रार से संपर्क करे. हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित रजिस्ट्रार को पहले यह जांच करनी होगी कि तलाक वास्तव में याचिकाकर्ता ने ही दिया है या नहीं.

साथ ही उसकी पहचान का सत्यापन भी किया जाएगा. इसके बाद रजिस्ट्रार यह तय करेगा कि 2024 के कानून की धारा 12 के तहत तलाक का पंजीकरण किया जाना चाहिए या नहीं. अदालत ने यह भी कहा कि यदि रजिस्ट्रार पंजीकरण से इनकार करता है तो याचिकाकर्ता को 2024 कानून की धारा 17 के तहत अपील का अधिकार होगा.

पत्नी को चुनौती देने की छूट

इस मामले में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि पत्नी अदालत में उपस्थित नहीं हुई. रिकॉर्ड के अनुसार उसे नोटिस भेजे गए थे, लेकिन वह सुनवाई में शामिल नहीं हुई. फिर भी हाईकोर्ट ने साफ किया कि उसकी गैरमौजूदगी का मतलब यह नहीं है कि उसके अधिकार समाप्त हो गए हैं. अदालत ने कहा कि यदि पत्नी चाहे तो किसी सक्षम न्यायिक या कानूनी मंच पर जाकर 'तलाक-ए-हसन' को चुनौती दे सकती है.
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क्या होता है 'तलाक-ए-हसन'?

'तलाक-ए-हसन' मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है. इसमें पति एक बार में तीन तलाक नहीं देता, बल्कि अलग-अलग अंतराल पर तीन बार तलाक का उच्चारण करता है. इन अंतरालों का उद्देश्य पति-पत्नी को अपने फैसले पर पुनर्विचार और सुलह का अवसर देना माना जाता है. यही वजह है कि इसे 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किए गए 'तलाक-ए-बिद्दत' यानी तत्काल तीन तलाक से अलग माना जाता है. तत्काल तीन तलाक में एक ही बार में विवाह समाप्त करने की कोशिश की जाती थी, जबकि 'तलाक-ए-हसन' की प्रकृति अलग है.

असम का नया कानून क्यों महत्वपूर्ण है?

असम सरकार ने 2024 में असम कंपल्सरी रजिस्ट्रेशन ऑफ मुस्लिम मैरिजेज एंड डिवोर्स एक्ट लागू किया था. इस कानून ने औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे 1935 के कानून की जगह ली. सरकार का कहना था कि इससे मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनेगी. साथ ही नाबालिगों के विवाह जैसे मामलों पर निगरानी भी बेहतर हो सकेगी.गुवाहाटी हाईकोर्ट का ताजा फैसला इसी नई कानूनी व्यवस्था के तहत रजिस्ट्रेशन का रास्ता दिखाता है.
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