दिल्ली के सत्य निकेतन में एक PG बिल्डिंग ढह गई. मलबे में दबकर 7 छात्रों की मौत हो गई. हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया. लेकिन एक कड़वा सच यह है कि भारत में इमारत गिरने की घटनाएं अब अपवाद नहीं रह गई हैं. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि देश में हर साल औसतन 1,000 से ज्यादा इमारतें ढह रही हैं और बीते 5 सालों में इमारत गिरने की घटनाओं में 5000 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवा दी है. हर हादसे पर सरकार और उनकी एजेंसियां जांच और स्थिति में सुधार के दावे करते हैं लेकिन ऐसे हादसे बदस्तूर जारी रहते हैं. ऐसे में अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या इमारतों का गिरना अब भारत का नया नॉर्मल बनता जा रहा है?
दिल्ली से गुजरात तक... दो दिन, दो हादसे
दिल्ली के PG हादसे की जांच अभी जारी है. इससे पहले गुजरात के गांधीनगर में एक निर्माणाधीन कमर्शियल कॉम्प्लेक्स का हिस्सा गिर पड़ा था, जिसके नीचे 15 मजदूर दब गए. राहत की बात यह रही कि सभी को सुरक्षित निकाल लिया गया. लेकिन ये दोनों घटनाएं एक साथ मिलकर उस खतरे की ओर इशारा करती हैं, जो भारत के शहरों में लगातार बढ़ रहा है. सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं है. सवाल यह है कि हमारे आसपास खड़ी हजारों इमारतों में से कितनी वास्तव में सुरक्षित हैं.
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हर दिन औसतन 3 इमारतें ढह रही हैं
अगर NCRB के आंकड़ों को देखें तो तस्वीर चौंकाती है. साल 2020 से 2024 के बीच देश में हर साल 1,000 से ज्यादा भवन ढहने की घटनाएं दर्ज हुईं. इनमें सबसे बड़ा हिस्सा रिहायशी इमारतों का है. 2020 में 1,051 रिहायशी भवन ढहे. 2021 में यह संख्या 1,158 तक पहुंच गई. 2022 में 1,176 भवनों के साथ यह पांच साल का सबसे खराब साल साबित हुआ. 2023 में 1,123 और 2024 में भी 922 रिहायशी इमारतें ढह गईं. मतलब साफ है. देश में औसतन हर दिन करीब 3 इमारतें गिर रही हैं.
सबसे असुरक्षित वहीं, जहां लोग रहते हैं
इन आंकड़ों का सबसे परेशान करने वाला हिस्सा यह है कि ज्यादातर हादसे कमर्शियल टावरों में नहीं, बल्कि घरों और रिहायशी इमारतों में हो रहे हैं.
पूरे देश में बीते 5 साल में 6,000 लोगों की मौत ऐसे ही हादसों में हुई है जो एक छोटे कस्बे की आबादी के बराबर हो सकती है. दरअसल इमारत गिरने की खबर अक्सर एक दिन की सुर्खी बनती है. लेकिन इनके पीछे छिपी मौतों का आंकड़ा कहीं ज्यादा डराता है. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि 2020 से 2024 के बीच भवन ढहने की घटनाओं में कुल 5,941 लोगों की जान गई. इनमें सिर्फ 2023 में 1,216 लोगों की मौत हुई. 2022 में यह संख्या 1,285 थी. यहां तक कि 2024 में भी 1,047 लोगों की जान चली गई.
हर मौत की एक और कहानी: 70% पीड़ित पुरुष
सरकार के इन आंकड़ों में एक और पैटर्न दिखता है. पिछले पांच वर्षों में भवन ढहने की घटनाओं में मरने वालों में लगभग 70 प्रतिशत पुरुष थे. इसकी एक वजह यह हो सकती है कि निर्माण स्थलों, मजदूरी और जोखिम वाले ढांचागत कार्यों में पुरुषों की संख्या ज्यादा होती है. हालांकि दुखद सच्चाई यह है कि हर हादसे के साथ सैकड़ों महिलाएं और बच्चे भी प्रभावित होते हैं. जब इन मौतों को आबादी के हिसाब से देखा जाता है तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है. मिजोरम में प्रति 10 लाख आबादी पर 44.8 मौतें दर्ज हुईं, जो देश में सबसे ज्यादा हैं. इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्य आते हैं. दिल्ली भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. प्रति 10 लाख आबादी पर 5.7 मौतों के साथ राष्ट्रीय राजधानी उन क्षेत्रों में शामिल है, जहां भवन सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं.
भारत में इमारतें क्यों ढह रही हैं?
देखा जाए तो भारत में तेजी से शहरीकरण हो रहा है. शहरों में आबादी बढ़ रही है और पुरानी इमारतों पर नया बोझ पड़ रहा है. कई जगहों पर नियमों को दरकिनार कर अतिरिक्त मंजिलें बनाई जा रही हैं. इसमें परेशान करने वाली बात ये भी है कि स्थानीय निकायों के पास लाखों इमारतों का नियमित स्ट्रक्चरण ऑडिट करने की क्षमता सीमित ही है. नतीजा यह है कि हादसा होने तक बहुत सी इमारतों की कमजोरी किसी को दिखाई ही नहीं देती.यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सत्य निकेतन की इमारत क्यों गिरी? सवाल यह है कि देश के कितने शहरों में ऐसी इमारतें आज भी खड़ी हैं, जो अगली बड़ी खबर बनने से सिर्फ एक बारिश, एक दरार या एक झटके की दूरी पर हैं.
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