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नाबालिग दुल्हन से संबंध गैरकानूनी- समझिए मुस्लिम पर्सनल लॉ के किस प्रावधान से कोर्ट ने दी लड़कियों को सुरक्षा

28 साल के युवक ने 16 साल की लड़की से मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी की, दोनों ने मर्जी से संबंध बनाए लेकिन युवक पर पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज हो गया. पति और पत्नी ने मिलकर याचिका दायर की और अब दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश आया है. पढ़िए कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कुछ कहा है.

नाबालिग दुल्हन से संबंध गैरकानूनी- समझिए मुस्लिम पर्सनल लॉ के किस प्रावधान से कोर्ट ने दी लड़कियों को सुरक्षा
दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला- नाबालिग दुल्हन से संबंध बनाना हर सूरत में गैरकानूनी

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध माने जाने वाले विवाह का हवाला देकर नाबालिग पत्नी से यौन संबंध के मामले में आपराधिक कार्रवाई से नहीं बचा जा सकता. अगर लड़की की उम्र 18 साल से कम है तो उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने को हर सूरत में सेक्सुअल असॉल्ट या रेप माना जाएगा, भले मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वह आपकी पत्नी ही क्यों न हो. कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि POCSO कानून और भारतीय न्याय संहिता (BNS) में बच्चों को दी गई कानूनी सुरक्षा सबसे ऊपर है. जस्टिस संजीव नरूला ने 23 सितंबर के एक आदेश में यह बात कही.

चलिए समझते हैं कि मामला क्या है, कोर्ट ने क्या कहा है और मुस्लिम पर्सनल लॉ के किन प्रावधानों से लड़कियों को सुरक्षा दी है.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 16 साल की लड़की से शादी करने वाले 28 साल के व्यक्ति से जुड़ा था. कोर्ट ने युवक के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति कानून की नजर में बच्चा है और उस लड़की की सहमति भी यौन संबंध को वैध नहीं बनाती है. दरअसल, दोनों साथ रहने लगे और लड़की प्रेग्नेंट हो गई. प्रेग्नेंसी के दौरान जब वह सरकारी हॉस्पिटल गई, तो उसकी उम्र का पता चला. दुर्भाग्य से, जून में लड़की ने एक मृत बच्चे को जन्म दिया.

जब हॉस्पिटल ने पुलिस को इस मामले की सूचना दी, तो पति के खिलाफ 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज' यानी POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया. लड़की ने कहा कि शादी दोनों परिवारों की सहमति से हुई थी और उस पर कोई जबरदस्ती या दबाव नहीं डाला गया था. लड़की ने पहले अपने पति की जमानत अर्जी का भी समर्थन किया था और अपनी प्रेग्नेंसी के दौरान उसकी मौजूदगी की मांग की थी.

मुस्लिम पर्सनल लॉ क्या कहता है और कोर्ट ने क्या तर्क दिया?

अपनी याचिका में इस कपल (पति-पत्नी) ने तर्क दिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अगर कोई मुस्लिम लड़की जो युवावस्था (प्यूबर्टी) प्राप्त कर चुकी है, वह शादी करने के लिए सक्षम है. याचिका में तर्क दिया गया कि चूंकि शादी वैध है तो इसका मतलब है कि शादी के बाद अगर यौन संबंध बनाया जाता है तो उस पर आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए.

लेकिन कोर्ट ने यह मानने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी का वैध होना ही बाद के यौन संबंधों की आपराधिकता को दूर कर देता है. कोर्ट ने कहा, "सिर्फ इसलिए FIR रद्द कर देना कि दोनों पक्ष खुद को विवाहित बताते हैं और याचिकाकर्ता नंबर 2 (लड़की) याचिकाकर्ता नंबर 1 (पुरुष) का सपोर्ट करती है, असल में POCSO एक्ट में बच्चों के एक ऐसे समूह के लिए वैवाहिक अपवाद (marital exception) शामिल करने जैसा होगा, जिसके लिए संसद ने अलग से कोई प्रावधान नहीं किया है."

शादी के कानूनी होने और बच्चों से यौन संबंध में साफ अंतर है- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि शादी करने से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ जाती. शादी से पहले 16 साल का लड़का या लड़की शादी के बाद भी उसी उम्र के रहते हैं. इसके अलावा कोर्ट ने शादी की कानूनी मान्यता और नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने के आपराधिक नतीजों के बीच का अंतर भी स्पष्ट किया. कोर्ट ने कहा कि भले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी को वैध माना जाए, लेकिन इससे POCSO एक्ट या भारतीय न्याय संहिता (BNS) के नियमों में कोई छूट नहीं मिल सकती.

जस्टिस नरुला ने कहा, "निष्कर्ष यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादी के आधार पर, उस समय 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने के मामले में POCSO या BNS से कोई छूट नहीं मिल सकती."

मुस्लिम पर्सनल लॉ के और किन हिस्सों पर उठते हैं सवाल

  •  बिगैमी यानी एक से ज्यादा शादी: हिंदू कानून में HMA, 1955 की Section 5(i) के तहत शादी के समय किसी भी पक्ष का पहले से पति या पत्नी नहीं होना चाहिए. ऐसी शादी Section 11, HMA के तहत अमान्य मानी जाती है. वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ में, अगर किसी की एक से ज्यादा पत्नियां हैं और वह कुरान के निर्देशों के अनुसार उनके साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करता, तब जाकर यह शादी खत्म करने का आधार हो सकता है.
  • शादी की उम्र: मुस्लिम कानून में शादी के लिए कोई कानूनी उम्र तय नहीं है. शरिया में युवावस्था (puberty) को शादी की उम्र माना जाता है, जिसे कानूनी तौर पर 15 साल माना जाता है.
  • 18 साल से पहले शादी और यौन संबंध: हिंदू कानून में HMA, Section 13(2)(iv) के तहत अगर लड़की की शादी 15 साल की उम्र से पहले हुई है, तो वह 18 साल की उम्र से पहले शादी को खत्म कर सकती है, चाहे यौन संबंध बने हों या नहीं. लेकिन मुस्लिम कानून में अगर यौन संबंध हो चुके हैं, तो 15 साल से पहले शादी होने को तलाक का आधार नहीं माना जा सकता.

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