देश में पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी लेबल लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ा संदेश दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे क्या खा रहे हैं और उनके भोजन में कितनी चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट मौजूद है. कोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल नियमों का नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य, विशेष रूप से बच्चों के भविष्य से जुड़ा हुआ है. सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) से पूछा कि आखिर अब तक इस दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए. अदालत ने केंद्र को दो सप्ताह का अंतिम समय देते हुए चेतावनी दी कि अगली सुनवाई में फैसला सुनाया जा सकता है.
क्या है पूरा मामला?
मामला पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल (Front-of-Pack Warning Label) से जुड़ा है. प्रस्ताव है कि जिन खाद्य उत्पादों में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट निर्धारित सीमा से अधिक हो, उनके पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी दी जाए ताकि उपभोक्ता खरीदने से पहले पूरी जानकारी प्राप्त कर सकें. याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि 7 मार्च को हुई FSSAI की बैठक में लिए गए फैसले सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं.

Packaged Food: पैकेज्ड फूड पर वार्निंग लेबल
Photo Credit: Photo: Pexels
सरकार से नाराज दिखी अदालत
मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ कर रही थी. सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ब्रिजेंदर चाहर से पूछा कि आखिर अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है. पीठ ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों का सरकार पर दबाव है और सरकार उस दबाव के आगे झुक रही है. अदालत ने कहा कि उसका उद्देश्य किसी उद्योग या कंपनी को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि जनहित की रक्षा करना है.
"क्या सरकार खुद करेगी या हमें आदेश देना पड़ेगा?"
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से सीधा सवाल किया. पीठ ने पूछा कि क्या सरकार खुद इस व्यवस्था को लागू करना चाहती है या फिर अदालत को आदेश जारी करना पड़ेगा.
पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि यदि सरकार आवश्यक कदम नहीं उठाती है तो न्यायालय खुद आदेश पारित करेगा. पीठ ने केंद्र से पूछा कि वह स्वयं फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने की दिशा में कदम उठाएगा या अदालत को आदेश पारित करना पड़ेगा.
केंद्र ने रखी अपनी दलील
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि यदि प्रस्तावित चेतावनी प्रणाली लागू की जाती है तो कई पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थ भी इसके दायरे में आ सकते हैं.
एएसजी ने यह भी कहा कि विकसित देशों के खाद्य मानक भारतीय भोजन प्रणाली से अलग हैं. वहां भोजन में नमक, चीनी और वसा की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए उन्हीं मानकों को सीधे भारत पर लागू करना उचित नहीं होगा. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि वसा की सीमा 10 ग्राम प्रतिदिन मानी जाए तो दो अंडों में भी लगभग 11 ग्राम वसा हो सकती है और ऐसे में अंडों पर भी चेतावनी चिन्ह लग सकता है.

Packaged Food: सुप्रीम कोर्ट पैकेज्ड फूड को लेकर सख्त
Photo Credit: iStock
कोर्ट बोला, "उपभोक्ता को जानकारी मिलनी चाहिए"
अदालत ने केंद्र की दलीलों से सहमति नहीं जताई. पीठ ने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य किसी उत्पाद की बिक्री रोकना नहीं है बल्कि लोगों को जानकारी देना है. कोर्ट ने कहा कि निर्माताओं को यह व्यवस्था पसंद न आए, क्योंकि इसका असर कारोबार पर पड़ सकता है, लेकिन अंतिम फैसला हमेशा उपभोक्ता का होगा. अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को यह जानकारी होगी कि उत्पाद में अधिक नमक, चीनी या फैट है तो वह सोच-समझकर निर्णय ले सकेगा.
यह भी पढ़ें : 5 स्टार होटल से इंदिरा कैंटीन तक जांच दायरे में; कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री बोले- लोगों का स्वास्थ्य सबसे अहम
MSME का मुद्दा भी उठा
केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि पारंपरिक खाद्य पदार्थों से जुड़े कारोबार में बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) शामिल हैं. सरकार के अनुसार ऐसे उत्पादों से करीब एक-तिहाई MSME राजस्व जुड़ा हुआ है. इसलिए किसी भी नीति का असर लाखों छोटे कारोबारियों पर पड़ सकता है. हालांकि अदालत ने कहा कि उसका उद्देश्य किसी विशेष उत्पाद या व्यापार को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि उपभोक्ता के स्वास्थ्य हितों की रक्षा करना है.
निर्माता पक्ष की दलीलों पर भी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कुछ खाद्य उत्पाद निर्माताओं की ओर से भी पक्ष रखने की कोशिश की गई. वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने दलील रखनी चाही, लेकिन अदालत ने कहा कि इस मामले में नागरिकों का स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता है. पीठ ने सवाल किया कि निर्माता इस विषय पर इतने "डेसपेरेट" क्यों हैं? वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने सुझाव दिया कि विभिन्न खाद्य उत्पादों की अलग-अलग श्रेणियां तय की जानी चाहिए, क्योंकि नमकीन काजू और चिप्स जैसे उत्पादों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा. इस पर अदालत ने कहा कि देश में बहुत कम लोग नियमित रूप से ड्राई फ्रूट्स खरीद पाते हैं, जबकि बड़ी संख्या में बच्चे पैकेज्ड स्नैक्स और जंक फूड का सेवन करते हैं.
"क्या भारत को अविकसित देश ही रहना चाहिए?"
केंद्र की इस दलील पर कि विकसित देशों के मानकों को भारत में अपनाना कठिन है, सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया दी. पीठ ने कहा, "क्या भारत को एक अविकसित देश ही रहना चाहिए?" अदालत ने कहा कि दुनिया को यह दिखना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों और विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर है.
केंद्र को दो सप्ताह का अंतिम समय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वह 10 फरवरी 2026 के आदेश में पहले ही अपनी चिंताएं और सुझाव स्पष्ट कर चुका है. अब अदालत ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह का समय दिया है ताकि वह अपना अंतिम निर्णय रिकॉर्ड पर रख सके. पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह केंद्र सरकार के लिए "आखिरी मौका" है. यदि अगली सुनवाई तक संतोषजनक फैसला नहीं लिया गया तो अदालत आगे के निर्देश जारी करेगी और मामले पर अंतिम फैसला सुनाएगी.
यह भी पढ़ें : पैगंबर मोहम्मद पर कथित टिप्पणी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की PIL, सोशल मीडिया गाइडलाइन पर ये कहा
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं