विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि चुनाव आयोग SIR करा सकता है. चुनाव आयोग के पास SIR कराने की शक्ति है. बिहार की मतदाता सूचियों के SIR का आदेश देकर चुनाव आयोग ने 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' का उल्लंघन नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एसआईआर प्रक्रिया पर उठाए जा रहे चार सवालों के जवाब देकर पूरी स्थिति को साफ कर दिया है. ऐसा माना जा रहा है कि अब एसआईआर का मुद्दा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. हालांकि, कानून के जानकारों का मानना है कि याचिकाकर्ताओं के पास अब भी 2 विकल्प बचे हैं.
SIR से जुड़े वो 4 सवाल, जिनका SC ने दिया जवाब
सवाल नंबर-1 : क्या भारत के इलेक्शन कमीशन के पास SIR जैसी कार्रवाई करने का अधिकार है?
जवाब- सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मामले में चुनाव आयोग ने कुछ भी अपनी शक्तियों से बाहर जाकर नहीं किया है. भारत के इलेक्शन कमीशन के पास SIR जैसी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है.
सवाल नंबर-2 : क्या SIR के तहत जांच किसी जायज मकसद पर आधारित है. अगर ऐसा है, तो क्या इलेक्शन कमीशन द्वारा अपनाए गए उपाय, हासिल किए जाने वाले लक्ष्यों के हिसाब से सही है?
जवाब - अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें सूची में शामिल किया है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता. यह नहीं माना जा सकता कि एसआईआर का उद्देश्य लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना था. अगर कोई दस्तावेज सही नहीं पाया जाता है, तो चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने से इनकार कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग नागरिकता तय कर रहा है.
सवाल नंबर-3 : क्या SIR के तहत जांच करने में इलेक्शन कमीशन द्वारा अपनाया गया तरीका रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 के नियमों के खिलाफ है या उनका उल्लंघन करता है?
जवाब- हमारी सुविचारित राय में, यह विवादित SIR 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' (Representation of the People Act) और उसके नियमों की जगह नहीं लेता है. बल्कि, यह धारा 21(3) द्वारा निर्धारित सटीक कानूनी सीमाओं के भीतर, अनुच्छेद 326 के तहत दिए गए संवैधानिक आदेश में नई जान डालता है. इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों से बढ़कर कोई कार्य किया है. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और अनुच्छेद 326 में कोई टकराव नहीं है.
सवाल नंबर-4 : क्या SIR प्रक्रिया पूरी तरह से वैध है, क्या इस दौरान हर पहलू का ध्यान रखा गया?
जवाब: जब कानून खुद ही किसी भी समय, दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर और उस तरीके से, जिसे चुनाव आयोग उचित समझे, एक विशेष संशोधन की अनुमति देता है, तो इस विवादित प्रक्रिया को केवल इसलिए अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि यह नियमित संशोधन के लिए तय की गई सामान्य प्रक्रियाओं के हर पहलू के अनुरूप नहीं है.
याचिकाकर्ताओं के पास अब ये 2 विकल्प
ऑप्शन-1 : मामले में रिव्यू पिटीशन
SIR मामले में अब रिव्यू पिटीशन फाइल कर सकते है. इसमें भी याचिकाकर्ता ये मांग कर सकते हैं कि इस मामले का फिर से रिव्यू किया जाए. पुनर्विचार याचिका सर्कुलेशन में होती है, जिसे जज अपने चैंबर में डिसाइड करते हैं. याचिकाकर्ता कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ बड़ी बैंच को अपील नहीं कर सकते हैं. यहां दो जजों की बैंच फैसला सुना चुकी है.
ऑप्शन-2 : क्यूरेटिव पिटीशन, अंतिम विकल्प
अगर रिव्यू पिटिशन में बात न बने, तो याचिकाकर्ता क्यूरेटिव पिटीशन में जा सकते हैं. हालांकि, इस मामले में गुंजाइश ज्यादा बची नहीं है. क्यूरेटिव पिटीशन किसी अंतिम निर्णय के खिलाफ दायर की जाने वाली अंतिम और असाधारण अपील है.
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एसआईआर के विरोध में खड़े तमाम राजनीतिक दल ये दलील दे रहे थे कि चुनाव आयोग इस प्रक्रिया के जरिए सिटिजनशिप की ओर जा रहा है. लेकिन नागरिकता तय करना, चुनाव आयोग की शक्ति और अधिकार नहीं है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को ठीक करने के लिए ये कदम उठाया है. चुनाव आयोग का मकसद है कि मतदाता सूची में सिर्फ वैध मतदाताओं के नाम ही शामिल हों. इसका सिटिजनशिप से कोई लेना देना नहीं है.
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