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कांग्रेस, TMC, RJD समेत पूरे विपक्ष की SIR पर तमाम आपत्तियां सुप्रीम कोर्ट में खारिज

बिहार, बंगाल में मतदाता सूची की जांच की प्रक्रिया SIR को लेकर खूब राजनीति हुई थी. विपक्षी दलों ने इसे वोट चोरी का तरीका बताया था. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने SIR को प्रक्रिया को वैध बताते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया को जायज बताया है. सर्वोच्च अदालत के फैसले से विपक्षी दलों की आपत्तियां खारिज हो गईं.

कांग्रेस, TMC, RJD समेत पूरे विपक्ष की SIR पर तमाम आपत्तियां सुप्रीम कोर्ट में खारिज
राहुल गांधी, ममता बनर्जी और तेजस्वी यादव... SIR पर इन विपक्षी दलों के नेताओं से सबसे ज्यादा सवाल उठाए थे.
  • मतदाता सूची की जांच की SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है.
  • सुप्रीम कोर्ट ने SIR की प्रक्रिया को वैध बताया. कोर्ट के आदेश से विपक्षी दलों की आपत्तियां खारिज हो गई है.
  • बिहार, बंगाल में SIR के दौरान भारी सियासी बवाल मचा था. लेकिन अदालत के फैसले ने इन आपत्तियों को कोरा बताया.
नई दिल्ली:

SC on SIR: 2025 में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुए मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण कार्य (SIR) को लेकर भारी सियासी बवाल मचा था. विपक्षी दलों ने SIR के जरिए वोट चोरी के आरोप लगाया था. लेकिन अब देश की सर्वोच्च अदालत ने एसआईआर पर अहम फैसला सुनाते हुए विपक्षी दलों की तमाम आपत्तियों को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची की जांच का पूरा अधिकार है. फैसला सुनाते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ‘‘हमारा मानना ​​है कि चुनावी SIR स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाता है.''

SIR के खिलाफ क्या दाखिल की गई थी याचिका?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कांग्रेस, राजद, टीएमसी सहित अन्य विपक्षी दलों की आपत्तियां खारिज हो गई हैं. SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं में दावा किया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उससे संबंधित नियमों के तहत निर्वाचन आयोग को इतने व्यापक स्तर पर SIR कराने का अधिकार नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची की जांच के अधिकार की बात कही.

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SIR के खिलाफ किन लोगों ने दायर की थी याचिका?

शीर्ष न्यायालय ने 29 जनवरी को इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था. इन याचिकाओं में गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) की याचिका भी शामिल थी. इसके अलावा राजद की ओर से राज्यसभा सांसद मनोज झा, टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा, योगेंद्र यादव सहित अन्य ने भी एसआईआर के खिलाफ यायिकाएं दाखिल की थी. 

कहां से शुरू हुआ SIR, कितने नाम हटाए गए?

बिहार में एसआईआर अभियान का पहला चरण चलाया गया था. इस प्रक्रिया के तहत बिहार में 65 लाख वोटरों का नाम डॉफ्ट लिस्ट से हटा दी गई थी. मामला कोर्ट पहुंचा, फिर कोर्ट के फैसले से निर्वाचन आयोग ने SIR अभियान के तहत प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख लोगों के नाम सार्वजनिक किए थे.

SIR के किन लोगों के नाम हटाए गए?

SIR की प्रक्रिया के तहत तीन कैटगरी वाले वोटरों के नाम हटाए गए. 

  1. मृत- वो वोटर जिनकी मौत हो चुकी थी.
  2. प्रवासी- वो वोटर जो कहीं और बस चुके थे.
  3. दोहरीकरण- वो वोटर जिनके नाम दो जगहों की मतदाता सूची में थी. 

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बिहार के बाद किन 12 राज्यों में हुआ SIR?

बिहार में SIR के सफल समापन के बाद इस अभ्यास के दूसरे चरण में छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित 9 राज्यों और अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी सहित 3 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया हुई. 

बंगाल में SIR को लेकर मचा बवाल, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

बिहार के बाद बंगाल में चले एसआईआर अभियान को लेकर जमकर सियासी बवाल मचा. बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले हुए एसआईआर प्रक्रिया को लेकर टीएमसी ने चुनाव आयोग पर तीखे हमले किए. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया चलती रही. 

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बंगाल, यूपी में एसआईआर से कितने नाम कटे?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले चले एसआईआर की प्रक्रिया के तहत 91 लाख वोटरों को नाम हटाए गए. यूपी में 2.89 करोड़ वोटरों को नाम मतदाता सूची से हटाए गए. इसी तरह अन्य राज्यों में भी लाखों वोटरों को नाम हटाए गए. 

SIR को लेकर विपक्षी दलों की आपत्तियां क्या थी?

SIR की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों की आपत्तियों में सबसे अहम बात यह थी कि चुनाव आयोग विपक्षी दलों के वोटरों के नाम काट रही है. राजद, कांग्रेस, टीएमसी सहित अन्य दलों ने याचिकाओं में इस प्रक्रिया पर सवाल उठाने के साथ-साथ इन दलों के नेताओं ने भी चुनावी रैलियों में वोट चोरी के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को वैध ठहराया. 

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लेखक के बारे में
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प्रभांशु रंजन
Chief Sub Editor
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