- मध्यपूर्व एशिया में युद्ध के कारण भारत का 40% कच्चा तेल और 90% एलपीजी आयात बाधित हुआ है जिससे कीमतें बढ़ी हैं
- सरकारी तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी लगभग दो लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है
- RBI ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को ₹2.86 लाख करोड़ के सरप्लस फंड ट्रांसफर की मंजूरी दी है
मध्यपूर्व एशिया में 84 दिन से जारी युद्ध और संकट का साया भारत की ऑयल और गैस अर्थव्यवस्था पर गहराता जा रहा है. स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के ज़रिये तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही बाधित होने से यहां से भारत पहुंचने वाला 40% कच्चा तेल, करीब 50% एलएनजी (LNG) और 90% एलपीजी (LPG) का आयात बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. इस संकट के दौरान सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतें बढ़ायी हैं. पिछले एक हफ्ते में पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतों में दो बार बढ़ोतरी की गयी है. लेकिन इसके बावजूद पेट्रोल और डीजल पर सरकारी तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी काफी ज्यादा है.
इस वित्तीय संकट से जूझ रहे भारत सरकार के लिए एक राहत भरी खबर आयी. भारतीय रिज़र्व बैंक ने ऐलान किया कि उसके केंद्रीय बोर्ड ने लेखा वर्ष (Accounting Year) 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को कुल ₹2,86,588.46 करोड़ के सरप्लस फंड्स के ट्रांसफर को मंजूरी दे दी है. पिछले साल आरबीआई केंद्रीय बोर्ड ने ₹2.68 लाख करोड़ के सरप्लस फंड्स के ट्रांसफर की मंजूरी दी थी.

ज़ाहिर है, आरबीआई से केंद्र सरकार को ट्रांसफर होने वाला ₹2.86 लाख करोड़ रुपये का फंड वित्तीय संकट को कम करने में मदद कर सकता है, क्योंकि मध्यपूर्व एशिया में संकट के दौरान तेल और गैस आयात का बिल काफी ज़्यादा बढ़ चुका है. इस दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत भी काफी कमज़ोर हो गया है.
- ऐसे में क्या भारत सरकार तेल कंपनियों को राहत देने के लिए एक Bail-out पैकेज पर विचार करेगी?
- क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी को रोकने के लिए Bail-out पैकेज एक विकल्प हो सकता है?
इस सवाल पर पूछे जाने पर पेट्रोलियम और गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने इस सोमवार को कहा था, "तेल कंपनियों के लिए किसी Bailout पैकेज पर अभी विचार नहीं हुआ है. उनकी Under-Recoveries और नुकसान ज़्यादा हैं. अभी सरकारी तेल कंपनियों को हर दिन होने वाला नुकसान करीब 750 करोड़ के आसपास है. इसमें पेट्रोल, डीजल और LPG का आयात खर्च शामिल है."
मध्यपूर्व एशिया में जारी संकट और तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमत ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. पेट्रोलियम मंत्रालय की Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक मध्यपूर्व एशिया में युद्ध शुरू होने से फरवरी, 2026 में कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी, जो 84 दिनों से जारी युद्ध और टकराव की वजह से 21 मई, 2026 को बढ़कर 109.31 डॉलर/बैरल तक पहुंच गई.

यानी, मध्यपूर्व एशिया में युद्ध की वजह से कच्चे तेल की औसत कीमत फरवरी, 2026 के मुकाबले 21 मई, 2026 तक 40.3 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ गयी, कुल 58.39% की बढ़ोतरी. मई महीने के पहले 21 दिनों के दौरान कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत 107.96 डॉलर प्रति बैरल के ऊँचे स्तर पर बनी हुई है.
भारत अपनी ज़रूरत का 85% से ज़्यादा कच्चा तेल और करीब 60% LPG अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से आयात करता है. इसमें से करीब 40% कच्चा तेल और 90% LPG स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के ज़रिये भारत पहुंचता था. लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की वजह से स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के ज़रिये कार्गो जहाज़ों की आवाजाही बुरी तरह से बाधित हो रही है, और कच्चे तेल के आयात पर भारत का कुल खर्च करीब 60% तक बढ़ चुका है.

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लेकिन ये महत्वपूर्ण है कि संकट के इस दौर में राज्यों ने VAT/Sales Tax में कोई कमी नहीं किया है. राज्य सरकारों को पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले VAT/Sales Tax से हर साल लाखों करोड़ रुपये की कमाई होती है. इसीलिए, संकट के इस दौर में भी राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर VAT/Sales Tax घटाने के लिए तैयार नहीं हैं.
ऐसे में देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस बाज़ार में बढ़ती अनिश्चितता और आयात के बढ़ते खर्च का बोझ झेल रही सरकार आरबीआई से ट्रांसफर होने वाले ₹2.86 लाख करोड़ रुपये के सरप्लस फंड्स का आगे किस तरह इस्तेमाल करती है.
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