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बकरीद क्यों मनाई जाती है,जानवरों की कुर्बानी को लेकर क्या हैं नियम? NDTV को मौलानाओं ने दिए हर सवाल के जवाब

Eid-Al-Adha Bakrid 2026: मौलाना इरफान साहब ने बताया कि गोश्त खाना ही बस बकरीद का उद्देश्य नहीं है. उन्होंने बताया कि यह त्योहार मुख्य रूप से इस बात का प्रतीक है कि एक सच्चे आस्तिक को ईश्वर की रजा (इच्छा) के लिए अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए.

बकरीद क्यों मनाई जाती है,जानवरों की कुर्बानी को लेकर क्या हैं नियम? NDTV को मौलानाओं ने दिए हर सवाल के जवाब
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  • बकरीद का त्योहार 28 मई को मनाया जाएगा, जो जिल हिज्जा महीने की 10वीं तारीख से निर्धारित होता है
  • हजरत इब्राहिम की परीक्षा में हजरत इस्माइल की जगह दुम्बा कुर्बान हुआ था, इसलिए कुर्बानी की परंपरा चली आ रही है
  • कुर्बानी के लिए स्वस्थ, जंगली न होने वाले बकरे और भैंस जैसे जानवरों का चयन आवश्यक होता है
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नई दिल्ली:

Bakrid 2026: ऐसा हो सब इंसान हों ख़ुश इतने कि हर रोज़,इक दूसरे से कहता फिरे ईद-ए-मुबारक... 28 मई को देश और दुनिया में ईद अल अजहा यानी बकरीद का त्योहार मनाया जाएगा. कुर्बानी के दिन वाले इस खास त्योहार पर लोग एक दूसरे से मिल आपसी भाईचारे का संदेश देते हैं. ईद की तरह इस दिन का मुकर्रर भी चांद के दीदार के बाद ही तय होता है. कुर्बानी के अपने नियम हैं जैसे कुर्बानी कहां देनी है, किन जानवरों की कुर्बानी जायज है और कुर्बानी का मकसद क्या है? तो इन सवालों के जवाब जानने के लिए एनडीटीवी ने मौलाना सूफीयान और मौलाना इरफान साहब से खास बातचीत की. 

क्यों मनाई जाती है बकरीद? (Why Bakrid Is Celebrated)

बकरीद क्यों मनाई जाती है? इस सवाल पर मौलाना इरफान साहब ने बताया कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उन्हें सपने में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया था. हजरत इब्राहिम के लिए उनके बुढ़ापे में पैदा हुए बेटे, हजरत इस्माइल (अलैहिस्सलाम), उनकी सबसे अजीज और प्यारी चीज थे. इब्राहिम ने अल्लाह के इस आदेश को स्वीकार किया और जब उन्होंने अपने बेटे इस्माइल को इस सपने के बारे में बताया, तो बेटे ने भी खुशी-खुशी अल्लाह की राह में कुर्बान होने की सहमति दे दी.

जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हुए और उन्होंने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाने की कोशिश की, तो अल्लाह उनके इस सच्चे समर्पण और तकवा निष्ठा को देख खुश हुआ और इस कुर्बानी को स्वीकार कर लिया. अल्लाह के हुक्म से फरिश्तों ने ऐन वक्त पर हजरत इस्माइल को हटाकर उनकी जगह एक दुम्बा (भेड़/मेमना) रख दिया. इस तरह हजरत इस्माइल सुरक्षित रहे और दुम्बे की कुर्बानी हो गई. तब से लेकर आज तक बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी देने की परंपरा शुरू हो गई.

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बकरीद का भी चांद से कनेक्शन 

जैसे ईद का त्योहार चांद का दिखना तय करता है, लगभग उसी तरह बकरीद के लिए भी चांद का दीदार जरूरी है. मौलाना सूफियान ने एनडीटीवी को बताया कि बकरीद का त्योहार जिल हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. जिल हिज्जा का चांद नहीं दिखने के कारण दिल्ली की जामा मस्जिद,इमारत शरिया और मरकजी रुयत-ए-हिलाल कमेटी की ओर से 19 मई से इस महीने की शुरुआत मानी गई है.इसके आधार पर बकरीद 28 मई को तय की गई है. 

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कुर्बानी को लेकर क्या नियम हैं?(What Are The Rules For Qurbani?)

मौलाना सूफियान और मौलाना इरफान साहब दोनों ने कुर्बानी के नियम को लेकर अपनी बात रखी है. एनडीटीवी से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि किस तरह के जानवरों की कुर्बानी के लिए लाया जाता है. उन्होंने बताया कि कुर्बानी के लिए खास तौर पर बकरा,भैंस और गाय प्रयोग में लाए जाते हैं. गाय काटने को लेकर देश में प्रतिबंध है इसलिए भैंस और बकरे को ही हम लोग बकरीद पर कुर्बानी के लिए लाते हैं.

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इसके अलावा बकरे को 1 साल पूरा होने पर और भैंस को 2 साल पूरा होने पर ही काटने का अधिकार है. मौलाना सूफियान ने बताया कि ध्यान देने वाली बात ये है कि उन्हीं जानवरों को काटने का अधिकार है जो जंगली नहीं हैं, पूरी तरीके से फिट हैं. इसका मतलब उस जानवर की कुर्बानी बिल्कुल नहीं दी जाएगी जो बीमार हो शरीर से विकलांग हो या किसी और समस्या से जूझ रहा हो. 

मौलाना सूफियान ने आगे बताया कि यह भी ध्यान देना है कि बकरे और भैंस की कुर्बानी खुले में होकर अपने घर में दी जाए. उसे काटने के बाद गंदगी वाली चीजों को फेंकने के लिए केवल निश्चित स्थानों में जाएं. नगर निगम भी कुछ डेडिकेटेड स्पॉट बना रखे हैं. इसके अलावा जानवर की कुर्बानी के वक्त किसी भी तरह की फोटो-वीडियो की शूटिंग नहीं होगी. किसी को उसकी तस्वीरें फोटो वीडियो नहीं भेजे जाएंगे. 

'कुर्बानी सिर्फ गोश्त खाना नहीं'

मौलाना इरफान साहब ने बताया कि गोश्त खाना ही बस बकरीद का उद्देश्य नहीं है. उन्होंने बताया कि यह त्योहार मुख्य रूप से इस बात का प्रतीक है कि एक सच्चे आस्तिक को अल्लाह की रजा (इच्छा) के लिए अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए. कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है.एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए,दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए, तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए रखा जाता है. इस त्योहार का उद्देश्य सिर्फ मांस बांटना या रस्म निभाना नहीं है, बल्कि इंसानों के बीच भाईचारा, आपसी एकता और समाज के गरीब तबके की मदद करने की भावना को बढ़ावा देना है.

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