- मोदी सरकार ने पद्म सम्मान के जरिए अपने वैचारिक विरोधियों जैसे अच्युतानंदन और शिबू सोरेन को भी सम्मानित किया है
- वी.एस. अच्युतानंदन बीजेपी और आरएसएस के कट्टर आलोचक रहे हैं, फिर भी उन्हें पद्म विभूषण दिया गया है
- केरल विधानसभा चुनाव के संदर्भ में अच्युतानंदन को सम्मानित करना बीजेपी के लिए राजनीतिक रणनीति माना जा रहा है
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या के मौके पर घोषित पद्म सम्मान एक बार फिर यह संदेश देते हैं कि मोदी सरकार वैचारिक तौर पर अपने विरोधियों को भी सम्मान देने से पीछे नहीं हटती. रविवार शाम घोषित पद्म सम्मान सूची में दो नाम खास तौर पर चर्चा में रहे, पहले केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज सीपीएम नेता वी.एस. अच्युतानंदन और दूसरे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन. इन दोनों दिवंगत नेताओं को सरकार ने पद्म सम्मान से नवाज़ा है, हालांकि इसके राजनीतिक संदेश और संभावित रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं.
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बीजेपी, RSS के आलोचकों को भी सम्मान
गौर करने वाली बात ये भी है कि अच्युतानंदन बीजेपी–आरएसएस के कट्टर आलोचक रहे हैं. वी.एस. अच्युतानंदन जीवनभर बीजेपी और आरएसएस के तीखे आलोचक रहे. वे इन संगठनों को सांप्रदायिक बताते थे. बीजेपी पर संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाते थे. वे बार‑बार “सेक्युलर ताकतों को बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने” की अपील करते थे. वे कांग्रेस और राहुल गांधी पर भी अक्सर हमलावर रहते थे और राहुल गांधी को “अपरिपक्व” बताते हुए उन पर तंज कसा था. ऐसे में अच्युतानंदन को पद्म विभूषण देने का फैसला राजनीतिक नजरिए से केरल विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.
केरल में अपना जनाधार बढ़ाने के प्रयास में लगी बीजेपी को उम्मीद है कि लेफ्ट समर्थकों के बीच यह कदम सकारात्मक संकेत दे सकता है, कुछ वैसा ही जैसा उसने पश्चिम बंगाल में किया था.
शिबू सोरेन को पद्म भूषण: झारखंड में नए राजनीतिक समीकरण?
झारखंड में भी पद्म सम्मान का राजनीतिक अर्थ निकाला जा रहा है. आदिवासी राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल शिबू सोरेन को पद्म भूषण दिए जाने का फैसला ऐसे समय आया है, जब राज्य में बीजेपी और जेएमएम के बीच संभावित नज़दीकियों की चर्चाएं तेज़ हैं. बिहार चुनाव में एनडीए की बड़ी जीत के बाद अटकलें लगने लगी थीं कि हेमंत सोरेन की जेएमएम कांग्रेस से दूरी बनाकर बीजेपी के साथ आ सकती है.
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इसी संदर्भ में हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन की एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री से मुलाकात की खबरें भी आई थीं, तब कहा गया था कि शिबू सोरेन को भारत रत्न या पद्म सम्मान देकर केंद्र जेएमएम को संकेत दे सकता है. अब सम्मान की घोषणा के बाद राजनीतिक हलकों में इन अटकलों को और बल मिला है. माना जा रहा है कि बीजेपी आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए शिबू सोरेन के प्रभाव का लाभ लेना चाहती है, क्योंकि तमाम कोशिशों के बावजूद यह वोट बैंक वह अपने पक्ष में मजबूती से नहीं जोड़ पाई है.
विरोधियों को सम्मान देने की मोदी सरकार की पुरानी मिसालें
मोदी सरकार द्वारा वैचारिक और राजनीतिक विरोधियों को सम्मान देने की यह कोई पहली मिसाल नहीं है. कई अवसरों पर सरकार ने बड़े राजनीतिक चेहरों को पद्म पुरस्कार या भारत रत्न से सम्मानित किया है. अक्सर महत्वपूर्ण चुनावी परिस्थितियों में.
- 2023 में मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण (मरणोपरांत)
- 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न
- 2024 में आंध्र प्रदेश चुनाव से पहले पी.वी. नरसिंह राव को भारत रत्न (मरणोपरांत)
- 2021 में असम के पूर्व सीएम तरुण गोगोई को पद्म भूषण
- 2017 में शरद पवार को पद्म विभूषण
- 2022 में गुलाम नबी आज़ाद को पद्म भूषण
इसके अलावा कांग्रेस के एस.सी. जमीर, तोखेहो सेमा, PDP नेता मुजफ्फर बेग और अकाली दल के तरलोचन सिंह को भी मोदी सरकार पद्म सम्मान दे चुकी है
2024 में सरकार ने पी.वी. नरसिंह राव के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भी मरणोपरांत भारत रत्न दिया. उसी साल बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन को भी भारत रत्न से सम्मानित किया गया. 2022 में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को पद्म भूषण की पेशकश भी हुई, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था.
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