Odisha Board Exam Success Story: ओडिशा के नक्सल प्रभावित मलकानगिरि जिले से आई एक छात्रा की सफलता की कहानी न सिर्फ प्रेरणादायक है, बल्कि व्यवस्था और समाज से कई सवाल भी पूछती है. बांधगुड़ा गांव की 15 वर्षीय लक्ष्मी खेमुडु ने जन्म से हाथों की गंभीर दिव्यांगता होने के बावजूद 10वीं बोर्ड परीक्षा पैरों से लिखकर पास की है. व्हीलचेयर पर बैठकर, बिना किसी विशेष रियायत के, उसने आम छात्रों के साथ परीक्षा दी और 240 अंक हासिल किए. दिहाड़ी मजदूर पिता और अनपढ़ मां की बेटी लक्ष्मी ने साबित किया कि संसाधनों की कमी और शारीरिक अक्षमता सपनों की उड़ान नहीं रोक सकती. उसकी यह उपलब्धि गांव से लेकर जिले तक उम्मीद और हौसले की नई मिसाल बन गई है.
पैरों से लिखी इबारत, हौसले से रचा इतिहास
मलकानगिरि जिले के सुदूर बांधगुड़ा गांव की रहने वाली लक्ष्मी खेमुडु ने वह कर दिखाया है, जिसे आम शब्दों में सिर्फ “असाधारण” कहा जा सकता है. जन्म से ही कई शारीरिक अक्षमताओं से जूझ रही लक्ष्मी के हाथ काम करने में सक्षम नहीं हैं. चलने-फिरने के लिए वह व्हीलचेयर पर निर्भर है. इसके बावजूद उसने मैट्रिक बोर्ड परीक्षा पैरों से लिखकर पास की और 240 अंक हासिल किए. परिणाम आने के बाद लक्ष्मी के चेहरे पर आई मुस्कान सिर्फ व्यक्तिगत खुशी नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की जीत थी, जो उसने हर दिन जिया है. गांव में जैसे ही रिजल्ट की खबर फैली, हर कोई इस बच्ची के हौसले को सलाम करता नजर आया.

Odisha Board Exam: लक्ष्मी के पैरों का कमाल
‘स्पेशल कंसेशन नहीं चाहिए', आम छात्र की तरह दी परीक्षा
बोर्ड परीक्षा के दौरान जिला प्रशासन ने लक्ष्मी को वैकल्पिक सुविधा और विशेष मदद की पेशकश की थी. आमतौर पर ऐसे मामलों में लेखक (राइटर) या अन्य सहूलियतें दी जाती हैं, लेकिन लक्ष्मी ने यह सुविधा लेने से इनकार कर दिया. उसने सतीगुडा यू.जी. स्कूल के परीक्षा केंद्र में अन्य छात्रों के साथ बैठकर ही परीक्षा दी. व्हीलचेयर पर बैठकर उसने पैरों से उत्तर पुस्तिका में जवाब लिखे. उसका कहना था कि वह खुद पर भरोसा करना चाहती है और अपने दम पर परीक्षा देना उसके लिए आत्मसम्मान का सवाल था.
भुमिया समुदाय की बेटी, संघर्ष ही पहचान
लक्ष्मी भुमिया आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती है. नक्सल प्रभावित और विकास से पिछड़े इलाके में जन्मी इस बच्ची के लिए पढ़ाई का सफर आसान नहीं रहा. घर की आर्थिक स्थिति कमजोर है, संसाधन सीमित हैं और शारीरिक अक्षमता हर दिन नई चुनौती बनकर सामने आती है. इसके बावजूद लक्ष्मी ने हार मानने से इनकार किया. खड़े न हो पाने के कारण उसने पैरों से लिखने की ट्रेनिंग ली. धीरे-धीरे पैरों की उंगलियों को उसने अपनी ताकत बना लिया और वही उसके “हथियार” बन गए.

Odisha Board Exam: पिता के साथ लक्ष्मी
पिता की उम्मीद: पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बने
लक्ष्मी के पिता नारायण खेमुडु ढेपगुड़ा गांव में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. खुद सिर्फ पांचवीं तक पढ़े नारायण कहते हैं, “बेटी जब पैदा हुई तो लगा था जिंदगी बहुत मुश्किल होगी, लेकिन उसमें पढ़ने की ऐसी जिद थी कि हमने तय कर लिया कि चाहे जैसे हो, पढ़ाएंगे.” नारायण चाहते हैं कि लक्ष्मी आगे प्लस टू और फिर स्नातक तक पढ़े ताकि नौकरी पा सके. वे सरकार से अपील करते हैं कि लक्ष्मी की पढ़ाई में आर्थिक मदद और आगे रोजगार के लिए विशेष सहयोग दिया जाए, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके.
मां की चिंता: ‘हमारे बाद उसका क्या होगा'
मां सुभद्रा खेमुडु खुद अनपढ़ हैं, लेकिन बेटी के सपनों को समझती हैं. चार बच्चों की मां सुभद्रा कहती हैं, “लक्ष्मी टीचर बनना चाहती है. हम चाहते हैं कि सरकार उसकी मदद करे, ताकि वह आगे पढ़ सके.” उनकी सबसे बड़ी चिंता यही है कि जब माता-पिता नहीं रहेंगे तो लक्ष्मी का भविष्य क्या होगा. वे चाहती हैं कि बेटी जल्द से जल्द आत्मनिर्भर बने और समाज में सम्मान के साथ अपनी पहचान बना सके.

Odisha Board Exam: परिवार के साथ लक्ष्मी
छह लोगों का परिवार, सीमित आमदनी, बड़े सपने
लक्ष्मी का परिवार छह सदस्यों का है. तीन छोटे भाई-बहन भी माता-पिता पर निर्भर हैं. सीमित आय में घर चलाना आसान नहीं है, लेकिन आर्थिक तंगी ने लक्ष्मी के सपनों को कभी छोटा नहीं किया. मैट्रिक परीक्षा में सफलता के बाद अब अगली चुनौती कॉलेज तक पहुंचने की है. व्हीलचेयर पर बैठकर रोजाना दूरस्थ कॉलेजों तक जाना आसान नहीं होगा, लेकिन लक्ष्मी और उसका परिवार इस संघर्ष के लिए तैयार है.
सिस्टम के लिए सवाल, समाज के लिए संदेश
लक्ष्मी की कहानी सिर्फ एक छात्रा की सफलता नहीं है, यह शिक्षा व्यवस्था और समाज के लिए आईना भी है. यह दिखाती है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो सीमाएं टूट सकती हैं, लेकिन साथ ही यह भी सवाल उठाती है कि क्या ऐसे बच्चों के लिए पर्याप्त सुविधाएं और अवसर उपलब्ध हैं? पैरों से लिखकर इतिहास रचने वाली लक्ष्मी खेमुडु आज सिर्फ बांधगुड़ा गांव की बेटी नहीं, बल्कि उन हजारों दिव्यांग बच्चों की उम्मीद है, जो अपने सपनों को सच करना चाहते हैं, बस उन्हें थोड़ा साथ चाहिए.
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