भारतीय जनता पार्टी ( बीजेपी) और कांग्रेस इन दोनों का काम करने का तरीका बिल्कुल अलग है. बीजेपी 2014 के बाद जिस तरीके से अपने पार्टी के अंदर के कनफ्लिक्ट को मैनेज करते आ रही है उससे वह लगातार मजबूत हो रही है और कई राज्यों में सरकार बना चुकी है. साथ ही तीसरी बार केंद्र में सरकार बना चुकी है. जबकि यही कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट की कमी की वजह से कांग्रेस बार-बार केंद्र और राज्य में सरकार बनाने में असफल होती हुई दिखाई दे रही है.
बीजेपी की कई राज्यों में सरकार है लेकिन क्यों नहीं होती कर्नाटक वाली स्थिति
बीजेपी में कई राज्यों में सरकार होने के बावजूद कांग्रेस जैसा खुला झगड़ा या मुख्यमंत्री बदलने का ड्रामा बहुत कम दिखता है। इसके पीछे पार्टी का आर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर और राजनीतिक कारण हैं:-
सेंट्रलाइज कमान
बीजेपी में पार्टी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोदी , गृह मंत्री अमित शाह , पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और संघ का पूरा कंट्रोल है. सीएम चुनना, बदलना, मंत्रिमंडल तय करना सब दिल्ली से होता है. कोई सीएम अपने आप को “अजेय” नहीं मानता.
एक नेता, एक पद का सख्त नियम
कोई बड़ा नेता एक साथ प्रदेश अध्यक्ष + सीएम या केंद्रीय मंत्री + प्रदेश प्रभारी नहीं रहता. इससे गुटबाजी कम होती है और काम की जिम्मेदारी अलग अलग हो जाती है.
आरएसएस का बैकबोन
ज्यादातर सीएम और बड़े नेता आरएसएस बैकग्राउंड से आते हैं. अनुशासन में रहना उनके डीएनए में है. बगावत करने पर सामाजिक बहिष्कार का डर रहता है. इसलिए बगावत के बजाए मिलकर रास्ता निकालने पर काम होता है.
किसी भी सीएम को तुरंत हटाने की ताकत
बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व इतना पावर रखता है कि वह कभी भी किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को बिना किसी कारण के बदल सकता है और उस पर विवाद भी नहीं होता . 2023 में येदियुरप्पा को 2 साल में हटाया. कोई भी CM नहीं कह सकता कि मैं 5 साल पूरे करूंगा.
जाति से ऊपर “हिंदुत्व” का छाता
बीजेपी में जाति महत्वपूर्ण है, लेकिन “हिंदुत्व + मोदी” का ब्रांड उससे बड़ा है. इसलिए जातीय नेता भी खुलकर बगावत नहीं करते.
पुरस्कार और डर का बैलेंस
बागी या रिटायर नेता को तुरंत राज्यपाल, उपराष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री बना दिया जाता है. साथी जो नेता अच्छा काम करता है उसको पार्टी इनाम भी देती है जैसे कई बड़े नेता हैं. जिन्होंने पार्टी के लिए अच्छा काम किया पार्टी ने उन्हें केंद्र से लेकर राज्यपाल तक का पद दिया जिसमें शिव प्रताप शुक्ला, ओम माथुर, धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव जैसे नेता हैं जो पार्टी के लिए अच्छा काम किया और उन्हें पार्टी ने इनाम दिया.
• कमान बहुत मजबूत और साफ है.
• अनुशासन का डर है.
• असंतुष्ट नेताओं को बाहर निकालने के बजाय उन्हें एडजस्ट कर लिया जाता है.
बीजेपी मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी
- सभी बड़े फैसले सीएम चेंज, टिकट वितरण केंद्रीय नेतृत्व से ही तय होते हैं. राज्य नेता “एक्जीक्यूट” करते हैं, न कि तय.
- एडजस्ट करने का फॉर्मूला-वरिष्ठ नेताओं को मंत्री या राज्यपाल या अन्य कोई महत्वपूर्ण जिसपर बात बन जाए पद दिया जाता हैं या कहीं ना कहीं एडजस्ट किया जाता है.
- अनुशासन का डर-सोशल मीडिया मॉनिटरिंग, बगावत पर विधायकी खतरे में. “एक पद” नियम से गुटबाजी कम.
•बीजेपी और एनडीए में विवादों का निपटारा एक बहुत सख्त,ˈहाइअराकि और गैर-लोकतांत्रिक तरीके से होता है. बाहर से सब शांत दिखता है क्योंकि कोई भी फैसला सार्वजनिक बहस में नहीं आता.
राष्ट्रीय स्तर (केंद्र सरकार + पार्टी)
कौन फैसला लेता है
सरकार और पार्टी स्तर पर सभी बड़े फैसले केंद्रीय नेतृत्व ही करता है जो सर्वमान्य होता है.
क्या-क्या मामला देखते हैं -
सीएम चुनना,हटाना , बड़े राज्य में सरकार बचाना, केंद्रीय मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी , बड़े सहयोगी दलों को मनाना।
राज्य स्तर:
बड़े राज्य (यूपी , एमपी , गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि)
पार्टी और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी मामले का निपटारा करते है.
जिम्मेदारी
सीएम का चयन,बदलाव , मंत्रिमंडल विस्तार ,बड़े जातीय समीकरण
राज्य स्तर – छोटे-उत्तर-पूर्व राज्य
पार्टी महासचिव, महासचिव संगठन और संबंधित केंद्रीय मंत्री मामले को देखते हैं.
जिला-बूथ स्तर तक अनुशासन
प्रदेश संगठन महासचिव + जिला प्रभारी
कोई विधायक, मंत्री बगावत करे तो उसका निपटारा , पार्टी कार्यकर्ता में अनुशासन रखना , पार्टी संबंधित सभी काम समय पर पूरा करना , करवाना । सोशल मीडिया पोस्ट तक मॉनिटर करना.
एनडीए सहयोगी दलों के बड़े विवाद
शीर्ष नेतृत्व व्यक्तिगत रूप से देखता है
सीट बंटवारा , मंत्रिमंडल में हिस्सा , नीतीश, चंद्रबाबू, शिंदे, अजित पवार जैसे बड़े नेताओं का मामला .
छोटे एनडीए सहयोगी (1-5 सीट वाले)
अक्सर गृह मंत्री अमित शाह या पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा तय कर लेते हैं।
ताजा उदाहरण बिहार का है
पार्टी ने अभी बिहार विधानसभा में 203 सीट जीत कर इतिहास रच दिया. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान बीजेपी ने एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग को बखूबी मैनेज किया. यह प्रक्रिया लंबी चर्चाओं, मध्यस्थता और रणनीतिक समझौतों के बाद पूरी हुई, जिसका फायदा एनडीए को 202 सीटों की भारी जीत के रूप में मिला. बीजेपी ने न केवल गठबंधन को एकजुट रखा, बल्कि छोटे दलों को संतुष्ट कर वोट ट्रांसफर सुनिश्चित किया.कई लेवल पर बैठकें हुईं ,पहली बैठक राज्य स्तर पर हुई जिसमें सम्राट चौधरी , नित्यानंद राय के स्तर पर हुई .
इसके बाद विनोद तावड़े ,राष्ट्रीय महासचिव और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के स्तर हुई. फिर बात नहीं बनी तो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के स्तर पर लगभग सीट तय हो गई अंत में कुछ सीटों के लिए गृहमंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा ने एक साथ बैठ कर रास्ता निकाल लिया और सबकुछ फाइनल हो गया. बीजेपी का पूरा स्ट्रक्चर ऐसे ही काम करता है नीचे से लेकर ऊपर तक यहीं वजह है कि बीजेपी के अंदर कॉन्फ्लिक्ट की स्थिति ना के बराबर है .
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