राफेल एम ग्रोसी दुनिया में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण और सुरक्षित उपयोग पर निगाह रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के डायरेक्टर जनरल हैं. उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद का बड़ा दावेदार माना जा रहा है.ग्रोसी ने ऑस्ट्रिया के वियना में NDTV के साइंस एडिटर पल्लव बागला से एक्सक्लूसिव बातचीत की. इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे को तार्किक बताया. ग्रोसी का यह बयान इसलिए भी खास है क्योंकि वो न केवल संयुक्त राष्ट्र का अगला प्रमुख बनने के प्रमुख दावेदार हैं बल्कि वो IAEA के प्रमुख और एक अनुभवी ग्लोबल डिप्लोमैट भी हैं.
सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी
ग्रोसी ने कहा,''मुझे लगता है कि भारत जैसे देशों का और ऐसे अन्य देश भी हैं, उनका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की इच्छा रखना बिल्कुल तार्किक है.'' उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह मांग बदलती ग्लोबल ऑर्डर को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि 2026 की दुनिया 1945 की दुनिया जैसी नहीं है. यह कहते हुए उन्होंने भारत और अन्य उभरती ताकतों की उस मुख्य दलील को रेखांकित किया जो लंबे समय से दी जा रही है कि संयुक्त राष्ट्र का मौजूदा ढांचा पुराना हो चुका है और उसमें तत्काल सुधार की जरूरत है.
उन्होंने सेक्रेटरी जनरल की भूमिका की संस्थागत सीमाओं का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा, ''सेक्रेटरी जनरल के पास कोई जादुई छड़ी नहीं होती जिससे वे तय कर सकें कि कौन सा फार्मूला अपनाया जाए.'' उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद के गठन से जुड़े फ़ैसले सदस्य देशों की व्यापक सहमति से ही लिए जाने चाहिए. हालांकि उन्होंने संयम दिखाया, लेकिन उनका संदेश साफ था. उन्होंने कहा कि औपचारिक सदस्यता हो या न हो, दुनिया में भारत का महत्व और प्रभाव तो है ही. उन्होंने कहा,''सुरक्षा परिषद में सीट हो या न हो, दुनिया में भारत का प्रभाव और वजन बना हुआ है.'' उन्होंने कहा कि यह भारत के बढ़ते भू-राजनीतिक और आर्थिक दबदबे को दिखाता है.
कितना जरूरी है संयुक्त राष्ट्र में सुधार
इससे भी अधिक जरूरी बात यह थी कि ग्रोसी ने इस मौके का प्रयोग संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग करने के लिए किया. उन्होंने किसी खास बदलाव का सुझाव तो नहीं दिया, लेकिन यह साफ कर दिया कि बदलाव होना तय है. उन्होंने कहा, ''कभी न कभी सुधार तो होगा ही.'' उन्होंने मौजूदा संस्थाओं को अच्छे से काम करने लायक बनाने की तत्काल चुनौतियां भी बताईं. उन्होंने कहा,''मुझे इस बात की चिंता है कि अभी हो क्या रहा है. हमारे पास जो दुनिया है, उसका हम क्या करें? सुरक्षा परिषद का हम क्या करें.''

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के मुख्यालय में एनडीटीवी के साइंस एडिटर पल्लव बागला.
IAEA प्रमुख ने यह बात ऐसे समय की है, जब संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का उत्तराधिकारी बनने की दौड़ तेज हो गई है. गुटेरेस एक जनवरी 2017 से इस पद पर हैं. वो इस साल 31 दिसंबर को अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे है. जनवरी 2027 में एक नया महासचिव कार्यभार संभालेगा. इस मुकाबले ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है. पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद पर किसी महिला को सौंपने के लिए जोरदार समर्थन दिख रहा है.चुनाव मैदान में मौजूद उम्मीदवारों में कई महिलाएं भी हैं. इनमें चिली की पूर्व राष्ट्रपति मिशेल बाचेलेट और संयुक्त राष्ट्र की वरिष्ठ अधिकारी रेबेका ग्रिनस्पैन के नाम भी शामिल हैं.
यूएन महासचिव पद के लिए क्यों मजबूत है ग्रोसी की दावेदारी
हालांकि, ग्रोसी इस दौड़ में इसलिए अलग नजर आते हैं क्योंकि उन्हें दुनिया के कुछ सबसे संवेदनशील संकटों को संभालने का गहरा अनुभव है. साल 2019 से IAEA के प्रमुख के तौर पर वो ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हुई बातचीत के केंद्र में रहे हैं. वो लगातार बातचीत और इंगेजमेंट पर जोर देते रहे हैं. उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि ईरान संकट का स्थायी समाधान पाने का एकमात्र रास्ता कूटनीति ही है.
यूक्रेन संकट को संभालने के उनके तरीके ने भी सबका ध्यान खींचा है. ग्रोसी ने यूक्रेनी परमाणु केंद्रों के आसपास परमाणु सुरक्षा सुनिश्चित करने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है. इसमें युद्ध के दौरान जापोरिज्जिया परमाणु संयंत्र की मरम्मत की अनुमति देने के लिए हुई वार्ता भी शामिल है. तनावपूर्ण जियो-पॉलिटिकल हालात में भी बातचीत जारी रखने की उनकी क्षमता को उनकी उम्मीदवारी की एक बड़ी खूबी के रूप में देखा जा रहा है.
भारत के परमाणु कार्यक्रम पर क्या बोले IAEA के महानिदेशक
भारत के लिए ग्रोसी का भारत के परमाणु कार्यक्रम और रणनीतिक बढ़त का लगातार समर्थन करना भी उतना ही अहम है. NDTV के साथ हुई कई बातचीत में ग्रोसी ने भारत की परमाणु यात्रा को तार्किक और व्यवस्थित बताया है. उन्होंने भारत के परमाणु विस्तार की योजनाओं और नीतिगत सुधारों का भी समर्थन किया है. उन्होंने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक अहम वैश्विक खिलाड़ी बताया है.
वैश्विक शासन में भारत की जगह के बारे में ग्रोसी की बातें अहम हो जाती हैं. सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए भारत के दावे को तार्किक बताकर, ग्रोसी ने कम से कम सैद्धांतिक रूप से उस तर्क का समर्थन किया है कि संयुक्त राष्ट्र को आज की हकीकत के हिसाब से बदलना चाहिए. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असरदार बहुपक्षवाद केवल संस्थागत बदलाव पर नहीं, बल्कि इस बात पर अधिक निर्भर करेगा कि बंटी हुई दुनिया में मौजूदा संस्थाएं कैसे काम करती हैं. वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भारत की भूमिका पर जोर देते हुए ग्रोसी ने कहा,''भारत के साथ मिलकर काम करना, जैसा कि मैंने IAEA में किया है, बहुत जरूरी होगा."
ऐसे समय जब संयुक्त राष्ट्र युद्ध, जलवायु संकट और बदलते ग्लोबल आर्डर के बीच नेतृत्व में अहम बदलाव की ओर बढ़ रहा है, ग्रोसी की बातें निरंतरता और बदलाव, दोनों का संकेत देती हैं. उनकी बातें इस बात को स्वीकारोक्ति हैं कि संयुक्त राष्ट्र की वैधता इस बात पर अधिक निर्भर करेंगी कि वह 21वीं सदी की भू-राजनीतिक हकीकत के हिसाब से खुद को कितनी अच्छी तरह से ढालता है और इस बातचीत के केंद्र में भारत मजबूती से मौजूद होगा.
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