दुनिया को अगर कोई दो चीज चला रही है तो वह है तेल और गैस. इनकी किल्लत पड़ जाए तो दुनिया पर बड़ी आफत आ जाती है. यही कारण है कि अब भारत भी समंदर में तेल और गैस का खजाना ढूंढने में अपनी पूरी ताकत लगा रहा है. सरकार ने हाल ही में 84,084 करोड़ रुपये वाली 'समुद्र मंथन स्कीम' को मंजूरी दी है, जिसका मकसद समंदर की गहराई में तेल और गैस की खोज करना है.
लेकिन जिस कच्चे तेल से पूरी दुनिया चल रही है, वह आया कहां से? जमीन और समंदर की गहराई में कच्चे तेल के बनने की कहानी बेहद रोमांचक है. यह कोई रातो-रात में नहीं बना है. इसके लिए करोड़ों साल लगे हैं.
कहां से आया कच्चा तेल?
आज से करोड़ों साल पहले पृथ्वी पर डायटम और शैवाल जैसे छोटे-छोटे जीव रहा करते थे. जब ये जीव मरते थे तो ये समंदर या जमीन की तलहटी पर जम जाते थे.
छोटे-छोटे ये जीव जब जिंदा थे, तब सूरज से ऊर्जा सोखते थे और उसे अपने शरीर में कार्बन के रूप में जमा करते थे. मरने के बाद इनके अवशेष समंदर, नदी या झील की तलहटी में जम जाते थे और रेत, कीचड़ या चट्टानों की परतों के नीचे दब जाते थे.
लाखों-करोड़ों सालों में ये अवशेष और ज्यादा नीचे दबते चले गए. ऑक्सीजन न होने के कारण ये मरे हुए जीव सड़कर पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाते. जैसे-जैसे ये अवशेष और गहरे दबते गए, ऊपर की परतों के भारी दबाव के कारण ये एक मोम जैसे गाढ़े पदार्थ में बदल गए, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'केरोजन' कहा जाता है. समय के साथ केरोजन 'कैटाजेनेसिस' नाम की प्रक्रिया से गुजरता है, जो इसे 'हाइड्रोकार्बन' में बदल देती है.
कच्चे तेल को जीवाश्म ईंधन भी कहा जाता है और इसलिए ये एक आम धारणा है कि ये डायनासोर से बना होगा लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि जमीन और समंदर की तलहटी में जीव डायनासोर के दौर से भी पहले से दबे हुए हैं.
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तेल और गैस कैसे बनती है?
जैसे-जैसे केरोजन धरती की गहराई में जाता है, वहां पृथ्वी की गर्मी और ऊपर का दबाव बहुत बढ़ जाता है. जब तापमान 90 डिग्री से 160 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है तो केरोजन हाइड्रोकार्बन यानी कच्चे तेल में बदल जाता है. अगर तापमान 160 डिग्री से ऊपर चला जाता है, तो यह प्राकृतिक गैस में तब्दील हो जाता है. यही वजह है कि कुओं की खुदाई के दौरान तेल और गैस अक्सर एक साथ मिलते हैं.
कितनी गहराई पर होता है कच्चा तेल?
ऐसा लगता है कि तेल और ज्यादा गहराई में मिलता जा रहा है. लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है. असल में, तेल तो हमेशा ऊपर की ओर ही बढ़ा है. असल में, तेल निकालने के लिए ड्रिलिंग ज्यादा गहरी और दूर तक करनी पड़ती है, क्योंकि ऊपर और आसानी से मिलने वाले तेल के भंडार खत्म हो चुके हैं.
1949 में ड्रिल किए गए तेल के कुओं की औसत गहराई 3,500 फीट थी. 2008 तक यह औसत बढ़कर 6,000 फीट हो गया और अभी मौजूद सबसे गहरा कुआं 40,000 फीट गहरा है. यह माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से भी 11,000 फीट ज्यादा है.
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कैसे पता चलता है कि तेल कहां मिलेगा?
भू-वैज्ञानिक यानी जियोलॉजिस्ट तेल खोजने में माहिर होते हैं. इसे अक्सर 'ऑयल एक्सप्लोरेशन' कहा जाता है. भू-वैज्ञानिक ऐसी जगहें ढूंढते हैं जहां तेल मिलने की सभी संभावनाएं हों, यानी जहा 'ऑयल ट्रैप' हो और 'ब्लैक गोल्ड' मिल सके. तेल अक्सर जमीन के नीचे बने विशाल भंडारों में मिलता है, जहां कभी पुराने समुद्र हुआ करते थे. ये भंडार जमीन के नीचे या समुद्र की तलहटी के नीचे हो सकते हैं.
तेल निकालने के शुरुआती दिनों में, भू-वैज्ञानिक मिट्टी, सतह की चट्टानों और दूसरी बाहरी चीजों का अध्ययन करके यह पता लगाते थे कि नीचे तेल हो सकता है या नहीं. बाद में सैटेलाइट इमेजिंग और कई तकनीकी तरक्की हुईं, जैसे ग्रेविटी मीटर, पृथ्वी मैग्नेटिक फील्ड की जांच करने के तरीके और 'स्निफर' जो हाइड्रोकार्बन की गंध का पता लगाते हैं.
आजकल सबसे आम तरीका है शॉक वेव पैदा करना. ये लहरें चट्टानों की परतों से गुजरती हैं और वापस सतह पर आती हैं, जहां उनसे तेल के भंडारों के संकेतों का पता लगाया जा सकता है. यह काम 'सिस्मिक सोर्स डिवाइस' से किया जाता है, जैसे कंप्रेस्ड-एयर गन, थंपर ट्रक या विस्फोटक. इसके बाद, वे जमीन पर GPS कोऑर्डिनेट्स या पानी में मार्कर बॉय का इस्तेमाल करके उस जगह को मार्क करते हैं.
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दुनिया में कितना तेल बचा है?
जैसा कि दशकों से हो रहा है, तेल का प्रोडक्शन अभी भी बढ़ रहा है. इसलिए एक्सपर्ट्स यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि तेल कब खत्म होगा, या क्या कभी खत्म भी होगा. यह कोई आसान हिसाब-किताब नहीं है क्योंकि अभी तक यह ठीक-ठीक पता नहीं है कि धरती के उन हिस्सों में कितना तेल छिपा है जहां अभी तक खोज नहीं हुई है.
हालांकि, ब्रिटिश पेट्रोलियम (BP) ने एक अनुमान लगाया है. BP ने मौजूदा टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके अनुमान लगाया है कि अभी जो मौजूदा भंडार हैं, उन्हीं से तेल निकाला जाता है तो 2067 तक कच्चा तेल खत्म हो सकता है.
इसका मतलब है कि अगर नए रिजर्व नहीं खोजे गए, खपत कम नहीं की गई या नई टेक्नोलॉजी विकसित नहीं की गई, तो 2067 में तेल का प्रोडक्शन बंद हो सकता है.
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