मॉनसून को दो महीने हो गए हैं. दो महीने और बाकी हैं. लेकिन बीते दो महीनों- जून और जुलाई में मॉनसून पर अल-नीनो का असर साफ दिखाई दिया. मौसम विभाग का कहना है कि दो महीने- अगस्त और सितंबर में भी इसका असर दिखेगा और सामान्य से कम ही बारिश होने की संभावना है.
मौसम विभाग के मुताबिक, जून और जुलाई में सामान्य से 13% कम बारिश हुई है. जून में 35% से ज्यादा कमी थी लेकिन जुलाई में अच्छी बारिश ने इस कमी को पूरा किया. जुलाई में 280.5 मिलीमीटर को सामान्य बारिश माना जाता है लेकिन इस महीने 283.3 मिमी बारिश हुई.
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लेकिन अगस्त और सितंबर में भी बारिश कम होने की संभावना है. मौसम विभाग ने बताया कि अगस्त और सितंबर में बारिश सामान्य से 94% कम रह सकती है. अगस्त-सितंबर में सामान्य बारिश 422.8 मिमी है.
मॉनसून का कमजोर होना सीधा-सीधा जेब पर भारी पड़ता है. तभी तो 2011 के बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था- 'मॉनसून ही भारत का असली वित्त मंत्री है.'
भारत की आर्थिक सेहत और मॉनसून
भारतीय अर्थव्यवस्था, खासकर कृषि के लिए मॉनसून बहुत जरूरी है. देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है, इसलिए मॉनसून का अच्छा होना या कमजोर होना, दोनों ही देश की आर्थिक सेहत पर असर डालता है.
केंद्र सरकार के मुताबिक, 64% भारतीय खेती पर निर्भर हैं और खेती मुख्य रूप से मॉनसून पर टिकी है. भारत में खेती लायक सिर्फ 55% जमीन में ही सिंचाई की सुविधा है और बाकी का हिस्सा बारिश पर निर्भर है. इसका मतलब हुआ कि खेती की जमीन का एक बड़ा हिस्सा बारिश के पैटर्न में बदलाव से बुरी तरह प्रभावित हो सकता है.
अच्छा मॉनसून कृषि उत्पादन बढ़ाता है, GDP की वृद्धि में मदद करता है, और ग्रामीण इलाकों में कमाई और खपत को बढ़ाता है.
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Photo Credit: IANS
कैसे असर डालता है कमजोर मॉनसून?
कमजोर मॉनसून से जीडीपी पर भी सीधा असर पड़ सकता है. देश की जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 14 फीसदी के आसपास है लेकिन आधे से ज्यादा भारतीय इससे जुड़े हुए हैं.
कोटक म्युचल फंड की रिपोर्ट के मुताबिक, कमजोर मॉनसून से खेती से होने वाली कमाई और गावों में मजजूरी बढ़ने की रफ्तार धीमी हो सकती है. साथ ही FMCG प्रोडक्ट्स, टू-व्हीलर, ट्रैक्टरों और घरों पर होने वाले खर्च पर भी असर पड़ सकता है.
रिपोर्ट कहती है कि हाल के दशकों के आंकड़ों से पता चलता है कि अल-नीनो का कुल जीडीपी ग्रोथ पर अकेले बहुत कम असर पड़ा है, जब तक कि इसके साथ गंभीर सूखा न पड़ा हो.
स्टडीज बताती हैं कि अल-नीनो और सूखे की स्थिति एक साथ होने पर ग्रोथ में 0.20 से 0.65% की कमी आ सकती है, जबकि बारिश में थोड़ी कमी से आमतौर पर अस्थायी और असमान असर ही पड़ता है, न कि व्यापक मंदी.
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Photo Credit: IANS
आपकी जेब पर कैसे पड़ता है असर?
कमजोर मॉनसून का मतलब है महंगाई बढ़ना. हमारी रोजमर्रा की महंगाई का 37% से 40% हिस्सा सिर्फ खाने-पीने की चीजों से तय होता है.
जब मॉनसून कमजोर होता है तो फसलों की पैदावार पर असर पड़ता है. इतना ही नहीं, भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% खाद्य तेल आयात करता है. कमजोर मॉनसून के कारण अगर देश में तिलहन (सोयाबीन, मूंगफली) और दालों (अरहद, उड़द) की पैदावार घटती है तो इनके दाम 15 से 25% तक बढ़ जाते हैं.
कोटक म्युचल फंड की रिपोर्ट बताती है कि जब भी पहले अल-नीनो का असर पड़ा है तो उस साल सब्जियों की कीमतों में तेजी देखी गई है. अगर इस साल भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिलता है तो महंगाई दर में 0.20 से 0.25% की बढ़ोतरी हो सकती है, भले ही खाने-पीने की दूसरी चीजों की कीमतें काबू में रहें.
मॉनसून कैसे असर डालता है? इसे ऐसे समझिए कि रिजर्व बैंक (RBI) ने पहले 2026-27 में जीडीपी में 6.9% की ग्रोट रेट का अनुमान लगाया था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 6.6% कर दिया. दूसरी तरफ महंगाई का अनुमान बढ़ा दिया है. RBI ने पहले 2026-27 में महंगाई दर 4.6% रहने का अनुमान लगाया था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 5.1% कर दिया. RBI का कहना है कि 2026-27 में ग्रोथ थोड़ी कम और महंगाई ज्यादा रह सकती है, क्योंकि इस साल कमजोर मॉनसून तो रहेगा ही, साथ ही कच्चा तेल भी महंगा होगा.
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