आज हम आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हैं, जो न सिर्फ आपको गर्व से भर देगी, बल्कि सोचने पर भी मजबूर कर देगी. ये कहानी है 16 साल के तीन बच्चों की, जिन्होंने साबित कर दिया है कि दुनिया बदलने के लिए उम्र नहीं, इरादे बड़े होने चाहिए. मिलिए अव्याना मेहता, विवान छावछरिया और एरियाना अग्रवाल से. इन तीनों ने 'द अर्थ प्राइज 2026' में एशिया में भारत का परचम लहराया है. ये कोई आम बच्चे नहीं हैं, इन्होने पानी में घुले उस जहर का तोड़ निकाला है जो शायद बड़ी-बड़ी सरकारें और वैज्ञानिक भी इतनी आसानी से नहीं निकाल पाए.
आप और हम अक्सर प्यास बुझाने के लिए पानी पीते हैं, लेकिन क्या आपको पता है उस पानी में न दिखने वाला प्लास्टिक, यानी माइक्रोप्लास्टिक घुला हो सकता है. इन बच्चों ने इसका एक ऐसा देसी और जादुई तोड़ निकाला जो किसी महंगी विदेशी लैब में नहीं, बल्कि हमारी रसोई की एक आम सी चीज से जुड़ा है- इमली के बीज. वही इमली के बीज जिन्हें हम अक्सर कचरा समझकर फेंक देते हैं.
इन्होंने इन बीजों का पाउडर बनाया और उसे नाम दिया 'प्लास-स्टिक' (Plas-Stick). इस पाउडर को पानी में डालिए और कुछ देर बाद सारा अदृश्य प्लास्टिक एक जगह इकट्ठा होकर गुच्छे बन जाता है, जिसे आप एक साधारण चुंबक से बाहर निकाल सकते हैं.

कहां से आया ये आइडिया?
इस आइडिया के पीछे की कहानी भावुक है. ये तीनों एक बार किसी और काम से एक गांव के स्कूल में गए थे. वहां उन्होंने देखा कि एक बच्चा मटके से पानी पी रहा है. उसको नहीं पता था कि वो पानी के साथ प्लास्टिक का जहर भी पी रहा है. उस एक पल ने इन तीनों बच्चों को झकझोर कर रख दिया. इन्हें समझ आ गया कि किताबों में छपा 'पर्यावरण विज्ञान' असल जिंदगी में साफ पानी के लिए एक बहुत बड़ी जंग है.
IIT गुवाहाटी को किया ईमेल-क्या जवाब आया?
रास्ता बिल्कुल भी आसान नहीं था. जीरो से हीरो बनने की इस कहानी में महीनों का पसीना, कई बार की नाकामी और ढेरों प्रयोग शामिल हैं. जब चीजें अटकने लगीं, तो इन्होंने हार नहीं मानी बल्कि आईआईटी (IIT) के एक एक्सपर्ट को बेझिझक ईमेल कर दिया. वहां से जो राह मिली, उसने प्लास-स्टिक को एक सपने से हकीकत में बदल दिया. बाद में आईआईटी गुवाहाटी ने भी इनके इस शानदार आविष्कार पर अपनी मुहर लगा दी.

राजस्थान के छोटे-छोटे गांव-शहरों में घूमे
ये बच्चे सिर्फ अपनी लैब या एसी कमरों तक सीमित नहीं रहे. ये राजस्थान के छोटे-छोटे गांवों, जैसे झुंझुनू और चूरू में गए. वहां के अफसरों का भरोसा जीता और स्कूलों में जाकर बच्चों को अपनी आंखों के सामने पानी साफ करके दिखाया. आज करीब 8 हजार बच्चे और टीचर इनके इस अभियान से जुड़ चुके हैं.
इनकी इसी लगन को देखते हुए इन्हें एशिया के विजेता के रूप में 12,500 डॉलर (करीब 10 लाख रुपये) का इनाम मिला है. लेकिन जब इन्हें ये खबर मिली, तो ये जश्न मनाने की नहीं सोच रहे थे. इनके दिमाग में वो गांव घूम रहे थे जहां इन्हें अभी पहुंचना है. ये इस पैसे से अपने प्रोजेक्ट को इतना बड़ा करना चाहते हैं कि 2026 के अंत तक 40 हजार लोगों तक साफ पानी पहुंच सके.

अव्याना, विवान और एरियाना की कहानी हमें बताती है कि अगर आपके दिल में समाज के लिए कुछ करने की आग है, तो कोई भी मुश्किल आपको रोक नहीं सकती. एक फेंके हुए इमली के बीज से शुरू हुई ये क्रांति आज दुनिया भर में छा गई है. ये हैं हमारे असली हीरो, जिन पर आज पूरे देश को नाज है.
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