दसवीं की मार्कशीट में जब फेल लिखा देखा, तो लोगों ने ताना मारा- 'ये लड़का जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा.' लेकिन उस लड़के ने सोच लिया था कि बर्तन धोने पड़ें तो धो लूंगा, लेकिन कुछ बड़ा जरूर करूंगा." एक आम हलवाई का बेटा भी 500 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर सकता है. जीरो से हीरो की इस कड़ी में आज कहानी समर कूल (Summercool) के चेयरमैन संजीव कुमार गुप्ता की.
हलवाई की दुकान से शुरुआत
संजीव का बचपन हापुड़ के पास एक छोटे से गांव सपनावत में बीता. परिवार का हलवाई और परचून (किराना) का काम था. संजीव जब मिठाई के थाल लेकर स्कूल जाते थे, तो बच्चे उनका मजाक उड़ाते थे. ऊपर से पढ़ाई में भी मन नहीं लगता था. इसी बीच दसवीं में फेल होने का ठप्पा लगा. लेकिन अगले साल अच्छे नंबरों से पास हुए. जब गांव के कुछ लड़के मुंबई गए, तो संजीव के मन में भी विचार आया कि अब गांव छोड़कर कुछ बड़ा करना है. मां उन्हें मामा के पास गाजियाबाद भेज दिया.
600 रुपये की नौकरी और 25000 की जमा पूंजी
मामा के यहां 600 रुपये महीने की पगार पर संजीव ने कूलर बनाने और एकाउंट्स का काम सीखा. इसके बाद अपने छोटे भाई राजीव को साथ जोड़ा और दोस्तों से 25,000 रुपये उधार लिए. घर वालों से एक पैसा नहीं मांगा, क्योंकि खुद्दारी रग-रग में थी. सेक्टर 23 में एक छोटे से कमरे से 'समर कूल' की नींव रखी गई.

पहला कूलर: 2000 का माल 1600 में
शुरुआती दिन बिल्कुल भी आसान नहीं थे. संजीव और उनके भाई खुद लोहे की चादरें लाते, खुद मोटर-पंप बनाते, खुद वेल्डिंग और पेंट करते थे. यहां तक कि तैयार कूलर रिक्शे पर लादकर खुद ही बेचने जाते थे. जब वे बाजार में जाते, तो लोग यह कहकर माल वापस कर देते कि 'नाम ही नहीं सुना, कल को खराब हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा?' संजीव ने डीलर्स को भरोसा दिलाया, "मोटर-पंप एक्स्ट्रा ले लो, कुछ पैसे रोक लो, पर माल रखकर देखो." बाजार में जो कूलर 2000 का मिलता था, संजीव ने उसे 1600 में बेचा. क्वालिटी इतनी शानदार थी कि माउथ पब्लिसिटी ने सारा काम कर दिया. देखते ही देखते डिमांड बढ़ने लगी और 1995 आते-आते उन्होंने कूलर के सारे पार्ट्स खुद बनाने शुरू कर दिए. संजीव के कूलर में दम था. धीरे-धीरे यूपी का नंबर वन और देश का टॉप-3 ब्रांड बन गया.
जब जलकर खाक हो गई करोड़ों की मेहनत
2003 में एक बड़ी फैक्ट्री लगाई गई. लेकिन हर सफल कहानी में एक क्लाइमैक्स जरूर आता है. अप्रैल का महीना था, फैक्ट्री में वेल्डिंग की एक चिंगारी उठी और देखते ही देखते करोड़ों की फैक्ट्री जलकर राख हो गई. सिर पर 25 लाख का भारी-भरकम लोन था. इंश्योरेंस था, पर वो नाकाफी था. उस वक्त सप्लायर्स और डीलर्स ने संजीव को भरपूर सपोर्ट किया. परिवार ने गहने तक बेच दिए. संजीव ने हार नहीं मानी. सिर्फ एक हफ्ते के भीतर उन्होंने अस्थाई वायरिंग कराकर फिर से प्रोडक्शन शुरू कर दिया. इस जज्बे ने बाजार में उनकी साख को इतना बढ़ा दिया कि लोगों का उन पर भरोसा बन गया

आज 500 करोड़ का साम्राज्य
जिस ब्रांड ने सिर्फ लोहे के कूलर से शुरुआत की थी, आज वो प्लास्टिक के स्लीक कूलर, एलईडी टीवी, वॉशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर और किचन अप्लायंसेस समेत 150 से ज्यादा प्रोडक्ट्स बनाता है. संजीव का मानना है कि 'जो वक्त के साथ नहीं बदलता, वो खत्म हो जाता है.' इसीलिए उन्होंने लोहे के भारी-भरकम कूलर्स को हटाकर हल्के, मजबूत और स्टाइलिश प्लास्टिक कूलर्स की एक पूरी रेंज खड़ी कर दी. जो लड़का कभी मिठाई के थाल ले जाता था, आज वो 500 करोड़ के टर्नओवर वाले ग्रुप का मालिक है. हर साल 15 करोड़ का मुनाफा कमाता है. आज समरकूल के ब्रांड एंबेसडर अजय देवगन हैं.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं