- नेपाल में 26 अगस्त को ग्लेशियर के टूटने के बाद आई अचानक बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई.
- संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने इसे हिंदूकुश हिमालय की बढ़ती नाजुकता का गंभीर संकेत बताया है.
- वैज्ञानिक और स्थानीय समुदाय लंबे समय से इस क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के खतरे की चेतावनी देते रहे हैं.
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर के टूटने के बाद बर्फ, चट्टानों और मलबे का भारी हिस्सा अचानक नीचे की तरफ खिसका और यह मलबा ल्हेंडे नदी में जा पहुंचा और इसके बाद पानी के साथ तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहने लगा. इस पानी ने आगे चलकर भयावह फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया. हिमालयी इलाकों में ऐसी बाढ़ सामान्य नदी वाली बाढ़ से अलग होती है. इसमें लोगों को तैयारी का बहुत कम समय मिलता है. पहाड़ों से पानी बेहद तेज रफ्तार से नीचे आता है और अपने साथ मिट्टी, पत्थर, पेड़ और बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े तक बहाकर ले जाता है. नेपाल में यही हुआ.
हिमालयी सीमा क्षेत्र से निकलने वाला भोटेकोशी नदी का पानी इस आपदा के बाद बेहद उफान पर आ गया. नदी का पानी आगे बढ़ता गया और उत्तरी तथा मध्य नेपाल के कई इलाकों में तबाही मचाता चला गया. कई गांव और कस्बे प्रभावित हुए. सड़कें और दूसरी जरूरी सुविधाएं क्षतिग्रस्त हुईं और हाइड्रोपावर स्टेशनों को भी भारी नुकसान पहुंचा.
788 मौतें और 2,500 से ज्यादा लोग लापता
30 अगस्त तक नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण यानी NDRRMA के मुताबिक मौतों का आंकड़ा 788 तक पहुंच गया था लेकिन इससे भी अधिक चिंता वाली बात यह है कि अब भी ढाई हजार से अधिक लोग लापता बताए गए हैं.
आपदा के पांचवें दिन भी राहत और बचाव दल मलबे और प्रभावित इलाकों में लोगों की तलाश कर रहे थे. समय बीतने के साथ यह खोज और मुश्किल होती जा रही थी.
भारत के दृष्टिकोण से भी यह आपदा बेहद गंभीर है. नेपाल में 275 से ज्यादा भारतीय और 128 भारतीय मूल के लोग लापता या संपर्क से बाहर बताए गए थे. विदेश मंत्रालय ने 149 ऐसे लोगों की सूची साझा की जिन्हें बचाया गया था.
संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन से जोड़ा
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने इस आपदा को सिर्फ एक स्थानीय प्राकृतिक घटना के तौर पर देखने से आगे बढ़कर इसे जलवायु संकट से जोड़ने की बात कही. उनके मुताबिक हिंदुकुश हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है और वैज्ञानिक तथा स्थानीय समुदाय कई वर्षों से यहां जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को लेकर चेतावनी देते रहे हैं.
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि हर बाढ़ या हर ग्लेशियर घटना सीधे सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से होती है. लेकिन बढ़ता तापमान पर्वतीय पर्यावरण की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है और ऐसी घटनाओं के लिए परिस्थितियां ज्यादा अनुकूल बना सकता है. यही वजह है कि हिमालय को लेकर वैज्ञानिक चिंता लगातार बढ़ रही है.
हिंदुकुश हिमालय इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
हिंदुकुश हिमालय बर्फ से ढकी पहाड़ियों की एक विशाल श्रृंखला है. यह पूरा क्षेत्र एशिया की जल सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. यहां मौजूद ग्लेशियर और बर्फ कई बड़ी नदियों के जल चक्र का हिस्सा हैं. इन नदियों पर करोड़ों लोगों की खेती, पीने के पानी, ऊर्जा और रोजमर्रा की जिंदगी निर्भर करती है. लेकिन यही क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील भी है.
तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों और बर्फ से जुड़े सिस्टम में बदलाव आता है. पहाड़ी झीलों, ग्लेशियरों और ढलानों की स्थिति बदल सकती है. कहीं अचानक पानी का दबाव बढ़ सकता है तो कहीं भारी बारिश और बर्फ पिघलने की घटनाएं मिलकर बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती हैं.
अगर ऐसे इलाके में आबादी, सड़क, पुल, बिजली परियोजनाएं और दूसरे बुनियादी ढांचे तेजी से बढ़ रहे हों, तो किसी प्राकृतिक घटना का नुकसान कई गुना बढ़ सकता है.
असली खतरा पूरी पहाड़ी व्यवस्था है
नेपाल की घटना एक और बड़ी बात समझाती है. हिमालय में खतरा सिर्फ यह नहीं है कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं. असली चुनौती यह है कि जलवायु परिवर्तन, कमजोर पहाड़ी ढलान, अचानक भारी मात्रा में पानी का नीचे के इलाके में आना, ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं और इंसानी इन्फ्रास्ट्रक्चर साथ मिलकर खतरे को और बड़ा कर सकते हैं. जैसा कि नेपाल में देखा गया, जब पहाड़ों से पानी और मलबा तेजी से नीचे आया, तो सड़क या पुल जैसी कोई भी संरचना उसके रास्ते में टिक नहीं सकी. इससे एक तरफ नदी के किनारे बसी बस्तियों में मची तबाही से इंसानी जिंदगियां उजड़ी तो दूसरी तरफ बिजली परियोजना जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा.
इसलिए हिमालय में विकास से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण से पहले गहन अध्ययन करना बेहद जरूरी है. यहां ऊपरी इलाकों में ग्लेशियर जलाशय कहां कहां हैं और भविष्य में पानी और मलबा किस रास्ते से आ सकता है इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील
Photo Credit: AFP
साइमन स्टील का संदेश क्या बताता है?
संयुक्त राष्ट्र के क्लाइमेट चीफ का संदेश मूल रूप से दो हिस्सों में है. पहला, दुनिया को जीवाश्म ईंधन यानी कोयला, तेल और गैस पर अपनी निर्भरता तेजी से कम करनी होगी. तो दूसरा, जिन इलाकों पर जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है, वहां जलवायु को सामान्य स्थिति तक लाने पर निवेश करना होगा.
इसके साथ ही जल्द से जल्द चेतावनी देने में सक्षम सिस्टम को लगाना, मजबूत बुनियादी ढांचे, जोखिम वाले इलाकों की बेहतर मैपिंग हो, स्थानीय समुदायों की तैयारी और आपदा के समय तेजी से बचाव करने की व्यवस्था हो.
नेपाल की त्रासदी भारत के लिए भी चेतावनी क्यों है?
नेपाल और भारत की भौगोलिक स्थिति को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता. हिमालयी क्षेत्र में होने वाली घटनाओं का असर सीमा के दूसरी तरफ भी पड़ सकता है. नेपाल की नदियां आगे चलकर भारत में प्रवेश करती हैं. इसलिए पहाड़ी इलाकों में अचानक आने वाली बाढ़, मलबे का बहाव या इन्फ्रास्ट्रक्चर का होने वाला नुकसान का असर तराई के क्षेत्रों तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि इस क्षेत्र में हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए सिर्फ एक देश की तैयारी पर्याप्त नहीं होगी.
भारत, नेपाल, चीन और हिमालय से जुड़े दूसरे देशों के बीच बेहतर रियल टाइम डेटा शेयरिंग, अर्ली वार्निंग और आपदा समन्वय की जरूरत लगातार बढ़ रही है. नेपाल की त्रासदी इस जरूरत की याद दिलाती है. हिमालय को बचाना उन करोड़ों लोगों की सुरक्षा करना भी है जिनकी जिंदगी इन पहाड़ों और उनसे निकलने वाली नदियों से जुड़ी है.
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