इंसान की बुनियादी जरूरतों में सबसे अहम होती है- सिर पर छत. और इसके लिए जरूरी है एक इमारत. जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है और आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे तेजी से इमारतें बनाई जा रही हैं. हम इतनी तेजी से इमारतें बना रहे हैं, उस हिसाब से हर महीने एक पूरा का पूरा न्यूयॉर्क के बराबर का एक शहर बनकर तैयार हो जा रहा है.
'द कन्वर्जेशन' की रिपोर्ट बताती है कि इन इमारतों से सिर पर छत तो आ जाती है लेकिन साथ ही इससे क्लाइमेट चेंज भी हो रहा है. इमारतें बनाने में दुनिया को गर्म करने वाला भारी मात्रा में उत्सर्जन भी होता है.
कितनी इमारतें बन रहीं?
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि जिस हिसाब से आबादी बढ़ रही है, उस हिसाब से 2030 तक 3 अरब यानी 40% आबादी को एक अच्छे घर की जरूरत होगी. इनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए हर दिन 96,000 घर बनाने पड़ेंगे.
आर्किटेक्चर 2030 के मुताबिक, हर महीने न्यूयॉर्क के बराबर का नया शहर बनकर तैयार हो रहा है. इसके मुताबिक, 2020 से 2060 के बीच दुनियाभर में 240 अरब वर्ग मीटर का नया फ्लोर एरिया जुड़ने का अनुमान है.
इस हिसाब से हर साल 6 अरब वर्ग मीटर का फ्लोर एरिया बढ़ेगा. न्यूयॉर्क का फ्लोर एरिया लगभग 50 करोड़ वर्ग मीटर है. यानी, 40 सालों तक हर महीने दुनिया में एक पूरा न्यूयॉर्क शहर जुड़ जाएगा.
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क्लाइमेट को कैसे पहुंचता है नुकसान?
हालांकि, जब भी कोई नई इमारत बनती है तो क्लाइमेट को उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. जब भी हम कोई इमारत बनाते हैं तो हम ऐसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं जो बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती हैं. इसे 'एम्बॉडीड कार्बन' कहा जाता है.
'द कनवर्जेशन' की रिपोर्ट के मुताबिक, एम्बॉडीड कार्बन की मात्रा को समझने के लिए एक वर्ग मीटर फ्लोर बनाने में लगभग आधा टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है. अब जरा कल्पना कीजिए कि अगर हर महीने न्यूयॉर्क के आकार का एक शहर बन रहा है तो उत्सर्जन कितना ज्यादा होगा.

कितना उत्सर्जन होता है, इसके लिए ऑस्ट्रेलिया में एक स्टडी की गई है. ऑस्ट्रेलिया में अभी 17 करोड़ वर्ग मीटर ऑफिस स्पेस है और 2049 तक इसमें 10 करोड़ वर्ग मीटर और बढ़ जाएगा. इस स्टडी में पाया गया कि 2024 से 2049 के बीच 13.8 करोड़ टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होने का अनुमान है.
ये अनुमान तो सिर्फ ऑफिस स्पेस के लिए बनने वाली इमारतों का ही है. अगर इसमें रिहायशी और दूसरी इमारतों को भी शामिल किया जाए, तो उत्सर्जन का आंकड़ा कहीं ज्यादा होगा.
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फिर क्या किया जा सकता है?
'द कन्वर्जेशन' ने अपनी रिपोर्ट में कुछ उन तरीकों के बारे में भी बताया, जिनको आजमाकर उत्सर्जन को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
इसमें बताया गया है कि लो कार्बन वाला कंक्रीट, लकड़ी के ढांचों का इस्तेमाल करना, मजबूत और टिकाऊ मटैरियल का इस्तेमाल करना और नए कंस्ट्रक्शन की बजाय पुराने को ही रेनोवेट किया जाए तो उत्सर्जन में काफी कमी आ सकती है.
अगर इन सभी तरीकों को एकसाथ आजमाया जाता है तो कुल उत्सर्जन में 4.7 करोड़ टन से ज्यादा की कमी आ सकती है.
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