Ansh Patidar Success Story: ये कहानी है अर्श से फर्श और फर्श से वापस अर्श तक पहुंचने की. ये कहानी है मध्य प्रदेश के एक छोटे से आदिवासी जिले से निकले एक लड़के की, जिसने सिर्फ 19 साल की उम्र में 50 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर दिया. जरा सोचिए, जिस उम्र में बच्चे कॉलेज बंक करने और वीडियो गेम खेलने के बहाने ढूंढते हैं, उस उम्र में इस लड़के ने न सिर्फ खुद को लगभग एक करोड़ के कर्ज से बाहर निकाला, बल्कि हजारों किसानों की तकदीर भी बदल दी. जीरो से हीरो की इस कड़ी में आज बारी अंश पाटीदार से.
पिता का संघर्ष और आंखों में सपने
अंश मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के बोरला गांव से आते हैं. एक ऐसा पिछड़ा इलाका जहां रोजगार का मतलब या तो मजदूरी है या फिर खेत-खलिहान की धूल. अंश का परिवार पीढ़ियों से खेती से जुड़ा था. उनके पिता धूप, छांव, दिन, रात भूलकर खेतों में पसीना बहाते थे. कभी-कभी तो रात के 12 बजे जब बिजली आती, तो पिता को नींद तोड़कर खेतों में पानी लगाने जाना पड़ता. माटी से जुड़ी इस जिंदगी में सुकून तो था, लेकिन पैसा नहीं.
जब अंश दसवीं में थे, उन्होंने 91% अंक हासिल किए. आंखों में इंदौर जाकर इंजीनियर बनने का सपना तैरने लगा था. लेकिन तभी कुदरत ने कहर बरपाया. लगातार फसलें बर्बाद हुईं. बाजार में भाव नहीं मिला और अंश के पिता भारी कर्ज के दलदल में धंस गए. हालत ये हो गई कि बेटे को बड़े शहर भेजना तो दूर, शायद उसे प्राइवेट से भी निकालकर सरकारी स्कूल में डालना पड़ता. तभी एक मां का दिल पसीजा. अंश की मां ने कहा, "बेटा, तू चिंता मत कर. तू पढ़ने में होशियार है, तू शहर जा. मैं अपने सोने के गहने बेच दूंगी."

एक आइडिया जिसने बदल दी जिंदगी
लेकिन. अंश ने तय कर लिया कि मां के गहने नहीं बिकेंगे. जो करना है, अब इसी गांव की मिट्टी में रहकर करना है. गर्मियों की छुट्टियां थीं. अंश पिता के साथ खेतों में हाथ बंटाने लगे. एक दिन वो पिता के साथ कीटनाशक (Pesticide) खरीदने दुकान पर गए. वहां अंश की पारखी नजरों ने एक खेल पकड़ लिया. दुकानदार ने दो दवाइयां रखीं- एक ब्रांडेड, एक लोकल. दोनों में केमिकल एक ही था, लेकिन कीमत में जमीन-आसमान का फर्क था. अंश ने इंटरनेट खंगाला और समझ गए कि बिचौलियों के इस खेल में किसान कैसे लूट रहा है.
यहीं से बीज पड़ा एक बड़े आइडिया का. "क्यों न सीधा कंपनी से माल उठाकर सस्ते में किसानों को दिया जाए?" जेब में सिर्फ 3000 रुपये की बचत थी. अंश ने गुजरात के एक मैन्युफैक्चरर को ढूंढा, उसे मनाया और थोड़ा सा माल मंगवा लिया. पहला ग्राहक बना पड़ोस का दोस्त. जब उस दोस्त के पिता ने 4 दिन बाद उस दवाई की तारीफ की, तो मानो अंश की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा.
छोटी सी शुरुआत, बड़ी उड़ान
साल 2019. उम्र सिर्फ 15 साल. अंश पाटीदार भारत के वो पहले शख्स बने जिन्हें इतनी कम उम्र में सरकार ने GST नंबर दिया. अंश का रूटीन सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे. शाम 4 बजे स्कूल से आना, और फिर रात 9 बजे तक साइकिल पर गांव-गांव जाकर किसानों को पंप से दवाई का डेमो देना. फिर रात को 1 बजे तक पढ़ाई करना. उनकी इस जी-तोड़ मेहनत ने रंग दिखाया और सिर्फ डेढ़ साल में उनके बिजनेस का टर्नओवर 40 लाख पहुंच गया.
पैरों तले जमीन खिसकना
लेकिन कहते हैं न, हर कहानी में एक ट्विस्ट होता है. इंदौर के एक स्टार्टअप इवेंट में अंश को टेक्नोलॉजी का चस्का लगा. उन्होंने 'एग्रो स्टैंड' (AgroStand) नाम का एक प्लेटफार्म बना डाला. लेकिन बाजार की मार और अनुभव की कमी ने 17 साल की उम्र में उनका ये स्टार्टअप डुबो दिया.
अंश उस छोटी सी उम्र में 95 लाख रुपये के कर्ज में डूब गए. जिस सप्लायर से क्रेडिट पर माल लिया था, उसे पैसे देने थे. जो पैसा किसानों से आया, वो बिजनेस में डूब चुका था. सब कुछ खत्म सा लग रहा था.
राख से उठने वाला फीनिक्स
लेकिन अंश वो मिट्टी नहीं थे जो आसानी से बह जाए. उन्होंने हार नहीं मानी. वो अपने भरोसेमंद किसानों और रिटेलर्स के पास गए. अपनी पूरी सच्चाई उनके सामने रख दी. अंश ने कहा, "आप मुझे थोड़ा एडवांस पेमेंट दीजिए, मैं आपको इसके बदले अतिरिक्त डिस्काउंट दूंगा." जरा सोचिए, उस गांव के लोगों ने उस 17 साल के लड़के की ईमानदारी और जज्बे पर 95 लाख रुपये का दांव लगा दिया. इसी पैसे से अंश ने अपने मैन्युफैक्चरर का कर्ज चुकाया और वो इस चक्रव्यूह से बाहर आ गए.
50 करोड़ का साम्राज्य: जीरो से हीरो
एक बार जब आदमी कर्ज के इस दलदल से निकल आता है, तो उसे कोई नहीं रोक सकता. साल 2022 में अंश ने शुरुआत की 'एरिवा ऑर्गेनिक्स' (Ariva Organics) की. उनका नारा एकदम साफ था- "किसान का खर्च आधा, उत्पादन ज्यादा." उन्होंने किसानों को बायो-पेस्टिसाइड और ड्रोन टेक्नोलॉजी से जोड़ा. ड्रोन के इस्तेमाल से किसानों का 90% पानी, 95% समय और 25% तक दवाई बचने लगी. 2023 आते-आते अंश की कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में था और कंपनी की वैल्यूएशन 50 करोड़ रुपये पार कर गई. उन्होंने 15,000 एकड़ जमीन पर 5,000 से ज्यादा किसानों को फ्री ड्रोन सर्विस उपलब्ध कराई. अंश पाटीदार की ये कहानी हमें चीख-चीख कर एक ही बात बताती है- सफलता की सबसे बड़ी चाबी है कंसिस्टेंसी यानी निरंतरता और अनुशासन. अंश गिरे, फिर उठे, फिर गिरे, फिर दौड़े, लेकिन वो कभी रुके नहीं.
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