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हल्द्वानी हिंसा मामला: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अय्यूब की डिफाल्ट बेल रद्द की

अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया है. ऐसा न करने पर ट्रायल कोर्ट को उन्हें हिरासत में लेने के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं.

हल्द्वानी हिंसा मामला: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अय्यूब की डिफाल्ट बेल रद्द की
  • उत्तराखंड के बनभूलपुरा में हुई हिंसा मामले में दो मुख्य आरोपियों की डिफॉल्ट बेल सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी है
  • कोर्ट ने नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपियों को 2 सप्ताह में सरेंडर करने का आदेश दिया
  • राज्य सरकार ने इस फैसले को कानून व्यवस्था बनाए रखने और त्वरित जांच के लिए बड़ी जीत बताया है
नैनीताल:

उत्तराखंड के हल्द्वानी के बनभूलपुरा में हुई हिंसा के मामले में दो मुख्य आरोपियों जावेद सिद्दीकी और अरशद अय्यूब की डिफाल्ट बेल रद्द हो गई है. सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया है. कोर्ट ने दोनों आरोपियों को दो हफ्ते के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने को कहा है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उत्तराखंड सरकार द्वारा नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाया है.

यह मामला 8 फरवरी 2024 को जुड़ा है, जहां हिंसक भीड़ ने पुलिस पर फायरिंग की, पत्थर और पेट्रोल बम फेंके, पुलिस वाहनों को जलाया और महिला पुलिसकर्मियों को थाने में बंद कर आग लगा दी. इस घटना के संबंध में भारतीय दंड संहिता, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और आर्म्स एक्ट समेत कई धाराओं में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं.

राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल जतींदर कुमार सेठी और स्टैंडिंग काउंसिल आशुतोष कुमार शर्मा ने पक्ष रखा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला पूरी तरह गलत था. अदालत ने माना कि यह एक बड़े स्तर की हिंसा, आगजनी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला है, जिसमें बड़ी संख्या में आरोपी शामिल है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने जांच पर अनावश्यक और तथ्यात्मक रूप से गलत टिप्पणियां कीं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी ने मामले की गंभीरता और बड़े पैमाने को देखते हुए तेजी से और प्रभावी तरीके से जांच की.

साथ ही कोर्ट ने यह पाया कि आरोपियों ने समय रहते जांच अवधि बढ़ाने और जमानत खारिज होने के आदेश को चुनौती नहीं दी और करीब दो महीने बाद अपील दायर की, जिससे उन्होंने डिफॉल्ट बेल का अधिकार खो दिया.

अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया है. ऐसा न करने पर ट्रायल कोर्ट को उन्हें हिरासत में लेने के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं.

इस फैसले को राज्य सरकार ने बड़ी जीत बताया है. पुलिस विभाग का कहना है कि यह निर्णय कानून-व्यवस्थ बनाए रखने और गंभीर मामलों में त्वरित जांच के महत्व को दर्शाता है, जिससे बल को मनोबल बढ़ाने में मदद मिलेगी.

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आशीष भार्गव
Senior Editor – Legal News
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