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'तो क्या हमें अपना आदेश बदलना पड़ेगा', सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर NGO की याचिका सुनने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ ने आवारा कुत्तों पर दिये फैसले पर स्‍पष्‍टीकरण देने के लिए याचिका दायर की थी, जिससे सुनने से अदालत ने इनकार कर दिया. अदालत ने एनजीओ को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट जाने की सलाह दी है.

'तो क्या हमें अपना आदेश बदलना पड़ेगा', सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर NGO की याचिका सुनने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर फैसले में बदलाव करने से किया इनकार
  • सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर अपने हालिया आदेश में बदलाव करने से साफ इनकार कर दिया है
  • सुप्रीम कोर्ट ने NGO की याचिका पर सुनवाई करने के बजाय पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट जाने की सलाह दी
  • NGO ने अदालत से कहा था कि आदेश आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या की अनुमति नहीं देता है
नई दिल्‍ली:

Supreme Court on Stray Dogs: सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर फैसले में बदलाव करने से इनकार कर दिया है. फैसले पर स्पष्टीकरण के लिए दाखिल अर्जी पर सुनवाई से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट जा सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट में यह अर्जी NGO एनीमल आर पीपल टू की ओर से दायर की गई थी, जिसमें अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की गई थी कि हाल ही में दिए गए उसके आदेश को आवारा कुत्तों की अंधाधुंध हत्या की अनुमति के रूप में न समझा जाए.

CM भगवंत मान के बयान के बाद उठा सवाल 

यह मामला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने आया था. अदालत ने एनजीओ के वकील से कहा कि वह इस मुद्दे को संबंधित हाई कोर्ट, विशेष रूप से पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के समक्ष उठाएं. NGO की ओर से वकील अनिल कुमार मिश्रा ने अदालत में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 19 मई के आदेश का गलत अर्थ निकाला जा रहा है. उन्होंने पंजाब के CM भगवंत मान के उस सार्वजनिक बयान का उल्लेख किया, जिसमें कथित तौर पर 'आवारा कुत्तों को खत्म करने' की बात कही गई थी. साथ ही खालसा कॉलेज से कुत्तों को हटाने की मीडिया रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया. 

जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, "अगर मुख्यमंत्री कोई बयान देते हैं, तो क्या इसका मतलब यह है कि हमें अपना आदेश बदलना पड़ेगा?" वकील ने बाद में आवेदन वापस लेकर हाई कोर्ट जाने की अनुमति मांगी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह आवेदन पर विचार नहीं कर रही है और याचिकाकर्ता हाई कोर्ट जा सकते हैं. 

NGO ने अपनी याचिका में क्‍या कहा था?

NGO ने अपनी अर्जी में कहा था कि एबीसी एक्ट, 2023 के तहत कुत्तों को यूथेनेशिया (दया मृत्यु) केवल सीमित परिस्थितियों में और तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही दी जा सकती है. NGO का कहना था कि अदालत का पिछला आदेश किसी भी तरह से आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या या ज़हर देकर मारने की अनुमति नहीं देता है.  याचिका में यह भी मांग की गई थी कि 'आक्रामक' कुत्तों की स्पष्ट परिभाषा तय की जाए, ताकि सामान्य आवारा कुत्तों को मनमाने ढंग से आक्रामक घोषित कर उनकी हत्या न की जा सके. एनजीओ ने सुझाव दिया था कि किसी कुत्ते को आक्रामक घोषित करने का फैसला एक समिति करे, जिसमें सरकारी पशु चिकित्सक, पशु कल्याण NGO का प्रतिनिधि और स्थानीय निकाय का सदस्य शामिल हो.  

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सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्‍तों को लेकर क्‍या दिया है आदेश

गौरतलब है कि 19 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जिन इलाकों में आवारा कुत्तों की संख्या बहुत बढ़ गई है और कुत्तों के काटने या हमले की घटनाएं लगातार हो रही हैं, वहां संबंधित अधिकारी कानून के तहत आवश्यक कदम उठा सकते हैं. अदालत ने कहा था कि रेबीज से ग्रस्त, लाइलाज बीमार या 'स्पष्ट रूप से खतरनाक/आक्रामक' कुत्तों के मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए यूथेनेशिया की जा सकती है. यह आदेश जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने आवारा कुत्तों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान मामले में दिया था. अदालत ने तब बच्चों और बुजुर्गों पर कुत्तों के हमलों की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई थी. 

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