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Supreme Court का बड़ा फैसला: High Court के आदेश पर लगाई रोक! कम अटेंडेंस वाले Law Students को परीक्षा में नहीं

Delhi High Court Attendance Judgement Stay : सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली HC के उस निर्देश पर रोक लगा दी है, जिसमें कम अटेंडेंस वाले लॉ स्टूडेंट्स को परीक्षा में बैठने की इजाजत दी गई थी. कोर्ट का कहना है कि इससे कॉलेज का अनुशासन बिगड़ रहा है.

Supreme Court का बड़ा फैसला: High Court के आदेश पर लगाई रोक! कम अटेंडेंस वाले Law Students को परीक्षा में नहीं
Bar Council of India BCI Petition Supreme Court : जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह फैसला बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.

Law College Minimum Attendance Rules India : देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने लॉ की पढ़ाई करने वाले छात्रों की अटेंडेंस को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस पिछले साल के आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि कम अटेंडेंस (Low Attendance) के आधार पर कानून के छात्रों को परीक्षाओं में बैठने से नहीं रोका जा सकता.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह फैसला बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. इस याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के उन निर्देशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें लॉ स्टूडेंट्स के लिए अटेंडेंस अनिवार्य की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बार काउंसिल की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कहा, "इस मामले में जवाब देने की आखिरी तारीख 21 जुलाई तय की जाती है. तब तक के लिए विवादित फैसले के पैराग्राफ 249 के क्रियान्वयन और असर पर रोक रहेगी. हालांकि, यह फैसला भविष्य में लागू होगा."

अदालत ने देश भर के लॉ कॉलेजों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद देश भर के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) और अन्य लॉ कॉलेजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. 

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की, "आजकल कोई भी छात्र अनिवार्य उपस्थिति नहीं चाहता. स्थिति यह है कि जो छात्र कॉलेज से पास होकर निकल चुके हैं, वे भी इस मुद्दे पर छात्रों का समर्थन कर रहे हैं."

देरी पर BCI से सवाल और अनुशासन की बात

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से यह भी पूछा कि उन्होंने हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देने में इतनी देर क्यों की? बेंच ने सवाल किया, "आप अदालत में इतनी देरी से क्यों आए?" इस पर BCI के चेयरमैन और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि इस देरी के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं.

इसी मामले से जुड़े एक अन्य केस में पेश हुए देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने हाई कोर्ट के फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया. उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट का यह आदेश उन छात्रों को बढ़ावा दे रहा है जो अनुशासन का पालन नहीं करना चाहते. 

उन्होंने कहा, "छात्र कॉलेज ही नहीं जा रहे हैं." इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जताते हुए कहा, "क्या यह फैसला छात्रों को कॉलेज न जाने का अधिकार देता है? दिल्ली हाई कोर्ट ने तो इस मामले में सचमुच खुद ही कानून बना दिया है."

क्या था दिल्ली हाई कोर्ट का वो फैसला?

दरअसल, नवंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया था. कोर्ट ने कहा था कि किसी भी मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज या विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र को सिर्फ कम अटेंडेंस के आधार पर परीक्षा देने या अपनी पढ़ाई जारी रखने से वंचित नहीं किया जा सकता.
हाई कोर्ट ने यह दिशा-निर्देश साल 2017 में एमिटी यूनिवर्सिटी के लॉ छात्र सुशांत रोहिल्ला की दुखद आत्महत्या के बाद खुद से संज्ञान (Suo Moto) लेते हुए शुरू की गई एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिए थे. 

आरोप था कि सुशांत की अटेंडेंस कम होने के कारण कॉलेज प्रशासन और कुछ फैकल्टी मेंबर्स ने उन्हें काफी परेशान किया था, जिसके चलते उन्हें पूरा साल दोहराना पड़ रहा था. इसी तनाव में आकर उन्होंने सुसाइड कर लिया था.

NMIMS कॉलेज की याचिका और बायोमेट्रिक विवाद

इससे पहले 13 मई को सुप्रीम कोर्ट ने NMIMS कॉलेज की एक ऐसी ही याचिका पर BCI से जवाब मांगा था. कॉलेज का तर्क था कि हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद से छात्रों द्वारा मुकदमों की "बाढ़" आ गई है. छात्र कम अटेंडेंस होने पर भी जबरन परीक्षा में बैठने की अनुमति मांग रहे हैं, जिससे एकेडमिक अनुशासन और संस्थागत स्वायत्तता कमजोर हो रही है.

इसके अलावा, आज कोर्ट के सामने लॉ कॉलेजों में लागू की जा रही बायोमेट्रिक अटेंडेंस (Biometric Attendance) को चुनौती देने वाली याचिका भी सुनवाई के लिए आई. छात्रों के वकील ने दलील दी, "बायोमेट्रिक डेटा को सुरक्षित रखने के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं. यह सारा निजी डेटा प्राइवेट कंपनियों को आउटसोर्स कर दिया जाएगा." 

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्राइवेसी वाले मामले को भी मुख्य मामले के साथ जोड़ते हुए कहा कि वह अब इस पर 21 जुलाई को विस्तृत सुनवाई करेगा.

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