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अर्श से फर्श पर पहुंचा TMC का 'डायमंड हार्बर मॉडल', फाल्टा के नतीजे से बंगाल की राजनीति के क्या मिल रहे संकेत?

हाल के सालों में “डायमंड हार्बर मॉडल” बंगाल का सबसे चर्चित राजनीतिक और प्रशासनिक प्रयोगों में से एक रहा है, जो सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी और उनके संसदीय क्षेत्र से जुड़ा है. लेकिन फाल्टा में लड़ाई से पहले टीएमसी का मैदान छोड़ना इस मॉडल के अंत की ओर इशारा कर रहा है.

अर्श से फर्श पर पहुंचा TMC का 'डायमंड हार्बर मॉडल', फाल्टा के नतीजे से बंगाल की राजनीति के क्या मिल रहे संकेत?
  • फाल्टा में TMC ने लड़ाई से पहले ही मैदान छोड़ दिया, जिससे डायमंड हार्बर मॉडल की विश्वसनीयता पर सवाल उठे.
  • अभिषेक बनर्जी के करीबी जहांगीर ने उपचुनाव से पहले ही मैदान छोड़ दिया, जिससे बीजेपी को जीत में आसानी मिली.
  • डायमंड हार्बर मॉडल स्थानीय शासन की एक शैली है, जिसमें कल्याणकारी योजनाओं और तेज बुनियादी ढांचा विकास पर जोर था
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कोलकाता:

“कुख्यात डायमंड हार्बर मॉडल अब ‘तृणमूल का नुकसान' मॉडल बन गया है.” फाल्टा विधानसभा सीट पर दोबारा हुई वोटिंग में TMC को मिली करारी हार के कुछ ही देर बाद बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने यह तंज कसा था. उन्होंने आगे कहा, “एक धोखेबाज, जो पैराशूट से उतरा, उसने खुद को कमांडर घोषित कर लिया था. ऐसा कोई अपराध नहीं है जो इस ठग ने न रचा हो. अपना अपराध सिंडिकेट खड़ा करने के लिए इस ‘बाघ की खाल ओढ़े बिल्ली' ने लोकतंत्र का गला घोंटने से भी परहेज नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि पिछले चुनाव को तमाशा बना दिया गया और तृणमूल ने इस विधानसभा क्षेत्र में डेढ़ लाख वोटों की बढ़त हासिल की. 15 साल बाद जब लोगों को अपनी मर्जी से वोट डालने की आजादी मिली, तो सच्चाई सामने आ गई.”

अभिषेक के करीबी जहांगीर ने लड़ने से पहले ही छोड़ा मैदान

बंगाल की राजनीति में TMC का गढ़ कहा जाने वाला “डायमंड हार्बर मॉडल” उस समय धराशायी दिखा, जब अभिषेक बनर्जी के करीबी जहांगीर ने उपचुनाव से कुछ घंटे पहले ही मैदान छोड़ दिया. जिससे बीजेपी को अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र में आसान जीत मिल गई. पिछली लोकसभा चुनाव में अभिषेक बनर्जी ने इसी सीट से राज्य में सबसे बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी.

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बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया मॉडल

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह ‘डायमंड हार्बर मॉडल' को काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था, लेकिन अब वह उल्टा पड़ गया है. लेखक और राजनीतिक विश्लेषक स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने कहा, “इस मॉडल के निर्माता ने खुद इसकी तारीफ की थी. चूंकि यह पूरी तरह पुलिस और प्रशासनिक समर्थन पर आधारित था, इसलिए जैसे ही पुलिस और प्रशासन नियंत्रण से बाहर हुआ, मॉडल ढह गया.”

हाल के सालों में “डायमंड हार्बर मॉडल” बंगाल का सबसे चर्चित राजनीतिक और प्रशासनिक प्रयोगों में से एक रहा है, जो सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी और उनके संसदीय क्षेत्र से जुड़ा है.

आखिर क्या है डायमंड हार्बर मॉडल

यह मॉडल स्थानीय स्तर पर शासन की एक ऐसी शैली को दर्शाता है, जिसमें कल्याणकारी योजनाओं का वितरण, तेज बुनियादी ढांचा विकास और सीधा राजनीतिक संपर्क शामिल है. खासतौर पर कोविड महामारी के दौरान, जब माइक्रो मैनेजमेंट की जरूरत थी. उस दौरान डायमंड हार्बर को आक्रामक टेस्टिंग और निगरानी के चलते एक सफल कंटेनमेंट मॉडल के रूप में पेश किया गया, जिससे पॉजिटिविटी दर में कथित तौर पर तेजी से कमी आई, जबकि राज्य के अन्य हिस्सों में केंद्र के दिशा-निर्देशों के पालन को लेकर विवाद चल रहा था.

सेवाश्रय स्वास्थ्य शिविर, पेंशन सहित कई कार्यक्रम  

इस मॉडल के केंद्र में ‘सेवाश्रय' स्वास्थ्य शिविर, पेंशन सहायता अभियान और “एक डाके अभिषेक” हेल्पलाइन जैसे बड़े सार्वजनिक सेवा कार्यक्रम हैं. तृणमूल कांग्रेस ने इस चुनाव के अपने घोषणापत्र में भी ‘सेवाश्रय' का ढांचा अपनाया और घर-घर स्वास्थ्य सुविधा का वादा किया—जो इस चुनाव में उसका शायद एकमात्र नया वादा था.

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मुफ्त मेडिकल परामर्श, दवाएं जैसी भी सुविधाएं

रिपोर्ट्स के अनुसार इन कार्यक्रमों के तहत लाखों लोगों को मुफ्त मेडिकल परामर्श, जांच, दवाइयां और अस्पतालों में रेफरल जैसी सुविधाएं मिलीं. अभिषेक बनर्जी ने इस पहल को शुभेंदु अधिकारी के गढ़ नंदीग्राम तक भी पहुंचाया, लेकिन वहां भी उन्हें हार का सामना 
करना पड़ा.

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का भी अहम स्तंभ

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास इस मॉडल का एक और अहम स्तंभ रहा. ‘संप्रीति फ्लाईओवर', चारिल ब्रिज, सड़कों का उन्नयन, जल शोधन संयंत्र और परिधान केंद्र (अपैरल हब) जैसी परियोजनाएं तेज क्रियान्वयन और प्रशासनिक समन्वय के उदाहरण के रूप में पेश की गईं, जो टीएमसी सांसद की जवाबदेही को दर्शाती हैं.

अभिषेक बनर्जी के कारण VIP ट्रीटमेंट मिला

हालांकि, इस मॉडल का महत्व अब उससे उपजे राजनीतिक विमर्श में भी है. विपक्ष का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र को “VIP ट्रीटमेंट” मिलता है, जो व्यापक शासन व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करता है.

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अभिषेक ने पावर ब्रोकर्स को दी खुली छूट

राजनीतिक विश्लेषक और लेखक सयान्तन घोष ने NDTV से कहा, “यह मॉडल अभिषेक बनर्जी के साथ जुड़ा जरूर है, लेकिन यह ममता बनर्जी की जड़-स्तर की राजनीति से काफी अलग है, जिसके आधार पर पार्टी 2011 में सत्ता में आई थी. यह मॉडल ज्यादा केंद्रीकृत कैडर प्रबंधन और वोटर टर्नआउट कंट्रोल पर आधारित था,यानी सूक्ष्म नियंत्रण और क्षेत्रीय वर्चस्व.”

उन्होंने आगे कहा, “अभिषेक बनर्जी ने पावर ब्रोकर्स को खुली छूट दे दी, जिससे वे TMC के दबंग बन गए. वे बंगाल में अपना एक अलग मजबूत नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे. आज के चुनाव नतीजे यह संकेत देते हैं कि यह सिर्फ एंटी-इंकंबेंसी का मामला नहीं है, बल्कि डर, धमकी और वर्चस्व की राजनीति के खिलाफ प्रतिक्रिया है—जो ममता बनर्जी की राजनीति से अलग है.”

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