केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले हफ्ते समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर एक बयान दिया. उन्होंने कहा कि 2029 तक सभी बीजपी और एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू हो जाएगा. इसके बाद से ही उत्तर प्रदेश में भी यूसीसी लागू करने की सुगबुगाहट तेज हो गई है. शाह के इस बयान पर राजनीति भी तेज हो गई है. विपक्ष का कहना है कि सरकार चुनाव से पहले समाज में ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है. आइए देखते हैं कि अभी देश में समान नागरिक संहिता की क्या स्थिति है और किस राज्य में यह लागू किया गया है.
देश में अभी कहां कहां लागू है यूसीसी
देश में बीजेपी और एनडीए शासित कुल 21 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं. इनमें से केवल उत्तराखंड में ही अभी तक यूसीसी लागू हो पाया है. इसके अलावा गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने यूसीसी कानून पारित कर दिया है. लेकिन ये इन राज्यों के विधेयक राष्ट्रपति के पास मंजूरी के इंतजार में हैं. राष्ट्रपति किसी विधेयक को कितने दिन में मंजूरी देते हैं, इसको लेकर कोई समय सीमा तय नहीं है. इसलिए इस मामले में अभी कोई जल्दबाजी नहीं देखी जा रही है.
इन राज्यों के अलावा इसके अलावा बीजेपी शासित पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में यूसीसी बिल लाने की प्रक्रिया चल रही है. वहीं बीजेपी शासित गोवा में यूसीसी की जगह गोवा सिविल कोड पहले से ही लागू है, जो 1867 के पुर्तगाली नागरिक संहिता पर आधारित है. हालांकि एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी गोवा में ही यूसीसी लागू करने की मांग करते रहे हैं. उनका कहना है कि गोवा सिविल कोड में कुछ धर्मों को अपने मामले तय करने की आजादी दी गई है. इसलिए वो बीजेपी के यूसीसी पर स्टैंड को बरगलाने वाला बताते रहे हैं.
बीजेपी शासित उत्तराखंड ने 2022 के विधानसभा चुनाव के बाज यूसीसी लागू करने की तैयारी शुरू की थी. राज्य में जनवरी 2025 से समान नागरिक संहिता लागू हुई. इसमें विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार के लिए समान नियम हैं. उत्तराखंड में बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है तो विवाह पंजीकरण को अनिवार्य बनाया गया है. इसके साथ ही लिव-इन रिलेशनशिप पर भी कानून है. लिव इन में रह रहे लोगों को इसकी घोषणा करनी होगी और इस संबंध से पैदा हुए बच्चे को वैध माना जाएगा.
यूसीसी से कौन बाहर है
बीजेपी शासित राज्यों के कानून और विधेयकों में एक बात खास है, वह है अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी से बाहर रखना. बीजेपी ने उत्तराखंड का चुनाव यूसीसी की प्रयोगशाला के रूप में किया था. इसकी वजह यह थी कि वहां मुस्लिम आबादी बहुत कम है और उत्तराखंड को देवभूमि माना जाता है और वह एक हिंदू बहुल राज्य है. इसके अलावा हिंदुओं के कुछ बड़े तीर्थस्थल भी उत्तराखंड में ही हैं.इसलिए वहां यूसीसी का बहुत अधिक विरोध नहीं हुआ.
इस बात की संभावना कम है कि उत्तर प्रदेश की इस सरकार में समान नागरिक संहिता लागू हो. क्योंकि प्रदेश में अगले साल के शुरू में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं. इसलिए वहां अभी इसके लिए बहुत अधिक समय नहीं है. चुनाव के बाद अगर बीजेपी की सरकार बनती है तो नई सरकार इस दिशा में आगे बढ़ सकती है. उत्तर प्रदेश के अलावा 2027 में उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें से उत्तराखंड और गोवा में यूसीसी लागू है, गुजरात ने विधेयक पारित कर दिया है. बाकी बचे हिमाचल और पंजाब में विपक्ष की सरकार है. वहीं मणिपुर में बीजेपी की सरकार है,लेकिन वहां जनजाति आबादी को देखते हुए यूसीसी को लेकर अभी बहुत अधिक हलचल नहीं है.
अमित शाह के बयान के बाद बढ़ा विरोध
अमित शाह के बयान के बाद यूसीसी पर सियासत भी तेज हो गई है. असदुद्दीन ओवैसी ने यूसीसी को संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 14 और 29 के खिलाफ बताया है. ओवैसी ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता को खत्म कर इस तरह का कानून लागू नहीं किया जा सकता. वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि जनता समझ रही है कि बीजेपी जिस यूसीसी की बात कर रही है दरअसल उसका फुल फार्म कुछ और है. उन्होंने यूसीसी को Underground Communal Conspiracy बताया है. उनका कहना है कि सरकार को यूसीसी लाने से पहले अपने पुराने वादे पूरे करने चाहिए. वहीं केंद्र शासित जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सरकार की कोशिशों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर कानून को अलग-अलग राज्यों के बजाय संसद में लाया जाना चाहिए.उन्होंने कहा है कि अगर आपके पास बहुमत है, तो इसे संसद में लाएं. आप इसे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्यों कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर यूसीसी केवल बीजेपी शासित राज्यों में लागू होता है, तो इसे 'यूनिवर्सल' (सभी के लिए समान) नहीं कहा जा सकता है. अमित शाह ने 2029 का जिक्र इसलिए किया,क्योंकि उसी साल लोकसभा के चुनाव होने हैं.

समान नागरिक संहिता या यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बहुत पहले करते आया है. बीजेपी की पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ भी इसे चुनावी मुद्दा बनाता रहा. उसने पहली बार इसे 1967 के चुनाव घोषणा पत्र में शामिल किया था. बीजेपी भी इसे अपने घोषणा पत्र में जगह देती रही. पीएम मोदी से पहले बीजेपी ने जो सरकार चलाई, वो गठबंधन की सरकारें थी. इसलिए इस दिशा में बहुत कुछ नहीं हुआ. लेकिन 2014 में मिले बहुमत के बाद वह इस दिशा में आगे बढ़ी. बीजेपी राजनीतिक और संवैधानिक कारणों से इसे संसद की जगह राज्यों की विधानसभाओं के जरिए लेकर आ रही है. दरअसल विवाह- तलाक, गोद लेना, वसीयत, उत्तराधिकार और संयुक्त परिवार से संबंधित मामले संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि पांच के तहत आते हैं. इससे जुड़े कानून बनाने का अधिकार संसद और राज्य दोनों के पास हैं.
ऐसा नहीं है कि यूसीसी का विरोध केवल विपक्ष ही कर रहा है. एनडीए के घटक दलों में भी इसको लेकर असमंजस की स्थिति है. बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने कहा है कि बिहार में यूसीसी लागू नहीं होगा. उसका रुख रहा है कि यूसीसी थोपा नहीं जाना चाहिए बल्कि आम सहमति से लागू होना चाहिए. वहीं लोजपा (रामविलास) और एनसीपी जैसे बीजेपी के सहयोगियों ने अभी तक इस मुद्दे पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं.
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