बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस गौतम पटेल को जान से मारने की कथित धमकियों का मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश तक पहुंच गया है. भारत के मुख्य न्यायाधीश ने लंदन में भारतीय उच्चायोग से इस मामले पर बात की है. सूत्रों के मुताबिक सीजेआई को उच्चायोग ने बताया है कि जस्टिस पटेल और उनके परिवार के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं. जस्टिस पटेल और उनके परिवार का कहना है कि उन्हें पिछले करीब 10 महीने से धमकियां मिल रही हैं. ये धमकियां दाऊदी बोहरा समुदाय के उत्तराधिकार से जुड़े एक पुराने विवाद पर दिए उनके फैसले से जुड़ी हैं. जस्टिस पटेल का कहना है कि अप्रैल 2024 के उनके उस फैसले में सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन को दाऊदी बोहरा समुदाय का सही 'दाई-अल-मुतलक' (आध्यात्मिक प्रमुख) घोषित किया गया था.
धमकियों से भरी चिट्ठियां और घर में घुसने की कोशिश
जस्टिस पटेल और उनका परिवार अभी यूनाइटेड किंगडम (यूके) में रह रहा है. उन्होंने आरोप लगाया है कि 2025 से उन्हें डराने-धमकाने की कोशिशें कई बार की गई हैं. हालिया खबरों के मुताबिक अगस्त 2025 में लंदन के बाहरी इलाके में स्थित उनके घर में घुसने की कोशिश की गई थी. इस मामले की सूचना स्थानीय पुलिस को दी गई थी. इसके कुछ दिनों बाद तीन सितंबर 2025 को उनकी बेटी और दामाद के नाम एक धमकी भरा पत्र उनके घर पहुंचा. इस पत्र में खास तौर पर दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार मामले का जिक्र था.इस पत्र में जस्टिस पटेल पर गलत और भ्रष्ट फैसला सुनाने का आरोप लगाया गया था. इस पत्र में दावा किया गया था कि दाऊदी बोहरा समुदाय के एक 'ताकतवर समूह' ने एक आपराधिक गिरोह की मदद ली है.पत्र में उन्हें चेतावनी दी गई थी कि अगर सितंबर के आखिर तक उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो जज और उनके परिवार को नुकसान पहुंचाया जाएगा.
पत्र लिखने वाले की मांगों में यह भी शामिल था कि जस्टिस पटेल हमेशा के लिए भारत छोड़ दें, अपने फैसले को वापस लेते हुए एक यूट्यूब वीडियो बनाएं, सबके सामने यह स्वीकार करें कि उनका फैसला गलत था और यहां तक कि अदालत में अपने ही फैसले के खिलाफ गवाही भी दें.
खबरों के मुताबिक, एक चिट्ठी में उन पर 'भ्रष्टाचार और दबाव के आगे झुकने' का आरोप लगाया गया.पत्र में कहा गया कि उन्होंने 'धोखाधड़ी वाला और गलत' फैसला सुनाया था.
जस्टिस पटेल की बेटी अदिति एजुकेशन टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करती हैं. उन्होंने कहा है कि धमकी देने वालों ने घर में घुसने की कोशिश की जिम्मेदारी भी ली थी.उन्होंने घटना का वीडियो फुटेज एक SD कार्ड पर दिया था.
जस्टिस पटेल के किस फैसले पर है विवाद
जस्टिस पटेल और उनके परिवार को ये धमकियां दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार विवाद पर आए एक अहम फैसले से जुड़ी हैं, जो हाल के भारतीय कानूनी इतिहास में धार्मिक नेतृत्व की सबसे लंबी लड़ाइयों में से एक है. इस मुकदमे में 2014 में सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन की मौत के बाद 'दाई-अल-मुतलक' के पद पर सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन के दावे को चुनौती दी गई थी.
शुरुआत में यह चुनौती बुरहानुद्दीन के सौतेले भाई खुजैमा कुतुबुद्दीन ने दी थी. उनका तर्क था कि उन्हें 'नस्स' (उत्तराधिकार सौंपने की धार्मिक प्रक्रिया) के जरिए उत्तराधिकारी बनाया गया था. लेकिन 2016 में कुतुबुद्दीन की मौत के बाद, उनके बेटे ताहिर फखरुद्दीन ने कानूनी लड़ाई जारी रखी. उनका दावा था कि उनके पिता ने बाद में उन्हें 'नस्स' सौंपी थी. जस्टिस पटेल ने 23 अप्रैल, 2024 को सुनाए फैसले में,सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन के दावे को सही ठहराया था, जिससे बॉम्बे हाई कोर्ट में सालों से चल रही कानूनी लड़ाई खत्म हो गई.
कौन हैं जस्टिस गौतम पटेल?
26 अप्रैल 1962 को मुंबई में जन्मे जस्टिस गौतम शिरीष पटेल को बॉम्बे हाई कोर्ट में सेवा देने वाले सबसे सम्मानित न्यायविदों में से एक माना जाता है. मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज और गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से ग्रेजुएट होने के बाद, उन्होंने 1987 में वकालत शुरू की थी. सालों तक उन्होंने कमर्शियल, कॉरपोरेट और सिविल मुकदमों में अपनी पहचान बनाई. उन्होंने पर्यावरण से जुड़े कई अहम जनहित मुकदमों में भी पैरवी की.
पर्यावरण कानून के क्षेत्र में उनके काम में संजय गांधी नेशनल पार्क, मैंग्रोव संरक्षण, शहरी योजना, मेलघाट नेशनल पार्क, मुंबई की मिल जमीन और खुली जगहों को बचाने से जुड़े मामले शामिल थे. साल 1994-95 में, उन्हें कैलिफोर्निया के सॉसलिटो में पैसिफिक एनर्जी एंड रिसोर्सेज सेंटर में पर्यावरण कानून पर केंद्रित पहली इंटरनेशनल फेलोशिप मिली. इस प्रोग्राम में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के बोल्ट हॉल स्कूल ऑफ लॉ में कोर्सवर्क और सिएरा क्लब लीगल डिफेंस फंड के साथ इंटर्नशिप शामिल थी.
जस्टिस पटेल ने वकीलों के लिए भी काम किया. वो 1999 और 2005 के बीच बॉम्बे बार एसोसिएशन में तीन-तीन साल के लिए दो बार मानद सचिव रहे. जज बनने से पहले तक वो एसोसिएशन की स्थायी समिति में बने रहे. साल 2008 और 2011 के बीच उन्होंने गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, मुंबई में पार्ट-टाइम लेक्चरर के तौर पर एडमिनिस्ट्रेटिव लॉ, कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ और एनवायरनमेंटल लॉ पढ़ाया.
कोर्टरूम के बाहर, जस्टिस पटेल अपनी लेखनी और लोगों के बीच सक्रियता के लिए जाने जाते हैं.उन्होंने तीन साल तक 'मुंबई मिरर' के लिए एक साप्ताहिक कॉलम लिखा. उन्होंने 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली', 'टाइमआउट मुंबई' और 'मुंबई रीडर' जैसे प्रकाशनों के लिए लेख और समीक्षाएं लिखीं. उन्होंने शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सुनने में अक्षम लोगों की मदद के क्षेत्र में काम करने वाले कई चैरिटेबल ट्रस्ट और फाउंडेशन के ट्रस्टी के तौर पर भी काम किया है.
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