पिछले हफ्ते 54 साल का एक आदमी नाई की दुकान में भगवा वस्त्र पहनकर दाखिल हुआ. उसके सिर पर वर्षों से बढ़ी जटाएं थीं और चेहरे पर लंबी सफेद दाढ़ी. कुछ देर बाद जटाएं जमीन पर थीं. दाढ़ी साफ हो चुकी थी. और वही आदमी कुछ घंटों बाद सीआरपीएफ की वर्दी में खड़ा था. सिर पर कैप थी. पैरों में चमकते जूते थे. सामने आईने में बाबा गिरवर दास नहीं, गिरवर सिंह तोमर खड़े थे.इस एक दृश्य के पीछे 27 साल की कहानी है. ऐसी कहानी जिसमें एक साइकिल है, एक नौकरी है, एक बर्खास्तगी है, अदालतों की अंतहीन तारीखें हैं, अखाड़े हैं, मंदिर हैं, साधुओं के चरणों की धूल है और एक ऐसी वर्दी है जिसे वापस पाने में एक आदमी की जवानी चली गई. क्या है उनकी कहानी जानिए इस रिपोर्ट में
साइकिल की टक्कर ने बदल दी पूरी जिंदगी
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के छिछावली गांव के रहने वाले गिरवर सिंह तोमर ने 1991 में सीआरपीएफ ज्वाइन की थी. वह सिपाही बने. नौकरी चल रही थी. परिवार आगे बढ़ रहा था. फिर असम में तैनाती के दौरान बाजार के पास हुई एक छोटी सी घटना ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी.एनडीटीवी से बातचीत में तोमर ने उस दिन को याद करते हुए कहा,
एक साइकिल ने वर्दी छीन ली, इंतज़ार ने जवानी ... खाकी छूटी तो भगवा ओढ़ लिया, पर उम्मीद नहीं छोड़ी ... 27 साल बाद वर्दी तो लौट आई गिरवर सिंह तोमर के पास ... बाबा गिरवर दास फिर सीआरपीएफ में गिरवर सिंह बन गये ... बस वो साल नहीं लौटे, जो इंसाफ की राह में कहीं खो गए ... pic.twitter.com/ziqODKarck
— Anurag Dwary (@Anurag_Dwary) September 2, 2026
बहुत पुरानी बात है, असम की." शिकायत हुई कि साइकिल टूट गई है. तोमर बताते हैं, "जब मुझसे पूछा गया तो मैंने अधिकारी को पूरी बात बताई. उस आदमी ने शिकायत की थी कि उसकी साइकिल टूट गई, मेरी गाड़ी से टक्कर लगी. मैंने कहा कि मुझे तो पता ही नहीं चला कि कब और कैसे साइकिल गिरी." इसके बाद विभागीय कार्रवाई हुई. मेडिकल कराया गया. अनुशासनात्मक प्रक्रिया चली. और नौ साल की सेवा के बाद गिरवर सिंह तोमर सीआरपीएफ से बाहर कर दिए गए. नौकरी गई तो उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया. 1999 में हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की.

ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले जब वे मुरैना से रवाना हो रहे थे तब स्टेशन पर उन्हें छोड़ने बड़ी संख्या में लोग आए. उन्होंने उन्हें आर्शीवाद भी दिया.
Photo Credit: अनुराग द्वारी
पिछले हफ्ते ही आया CRPF में फिर से वापसी का आदेश
लेकिन यह कहानी सिर्फ आस्था की नहीं थी. बाबा गिरवर दास आश्रमों में थे, लेकिन गिरवर सिंह तोमर अदालत में अपनी लड़ाई लड़ते रहे. 2007 में हाई कोर्ट से उनके पक्ष में फैसला आया. फिर सीआरपीएफ को स्थगन मिल गया. एक बार फिर इंतजार शुरू हुआ.जिस उम्र में उनके साथी प्रमोशन ले रहे थे, तोमर तारीखें ले रहे थे. जिनके साथ उन्होंने कभी परेड की थी, उनमें कई इंस्पेक्टर तक पहुंच गए. और जिस आदमी ने सीआरपीएफ की वर्दी पहनी थी, वह उसी वर्दी को वापस पाने के लिए भगवा वस्त्रों में अदालतों के चक्कर काटता रहा. समय का सबसे बड़ा सबूत उनका चेहरा था.
आखिरकार पिछले हफ्ते सीआरपीएफ अधिकारियों ने अदालत के आदेश का पालन किया.और फिर वह सुबह आई जब बाबा गिरवर दास नाई की दुकान पहुंचे. जटाएं कटीं. दाढ़ी गई. भगवा उतरा. दोपहर तक वह सीआरपीएफ की 85वीं बटालियन के साथ थे. वर्दी फिर उनके शरीर पर थी. लेकिन उम्र वही नहीं थी.
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वर्दी पहनने के बाद अब गिरिवर सिंह ऐसा दिखते हैं
Photo Credit: अनुराग द्वारी
अब कैंपस में भी 'बाबा' के नाम पुकारे जाते हैं
करीब 27 साल के इंतजार के बाद वह दिन भी आ गया, जिसका गिरवर सिंह वर्षों से इंतजार कर रहे थे. 25 अगस्त की रात वे मुरैना से ट्रेन में सवार हुए और 26 अगस्त की सुबह छत्तीसगढ़ के बीजापुर पहुंचे.हालांकि बीजापुर पहुंचने के बाद उनका पहला पड़ाव CRPF कैंप नहीं, बल्कि एक नाई की दुकान थी. वर्षों से साधु जीवन जी रहे गिरवर सिंह ने वहीं अपने लंबे बाल कटवाए और सफेद दाढ़ी भी हटवा दी. साधु के रूप से बाहर निकलकर उन्होंने फिर वही पहचान अपनाई, जो 1999 में उनसे छिन गई थी.
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