- अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना के इतिहास में फाइव-स्टार रैंक पाने वाले एकमात्र जांबाज हैं
- साल 1965 की जंग में उन्होंने सिर्फ एक घंटे के भीतर लड़ाकू विमानों को आसमान में उतार दिया था
- पाकिस्तान की रिसालपुर मिलिट्री फ्लाइंग एकेडमी में आज भी सम्मान से लगी है उनकी तस्वीर
एक ऐसा जाबांज, जो सिर्फ एक नाम नहीं... भारतीय आसमान की सुरक्षा का दूसरा नाम था. हम बात कर रहे हैं देश के इकलौते मार्शल ऑफ द इंडियन एयरफोर्स, अर्जन सिंह की. कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं. उनका जन्म एक ऐसे नामी सैन्य परिवार हुआ, जिसने पीढ़ियों से वतन की सेवा को ही अपना धरम माना था. जब खून में ही देशप्रेम बह रहा हो, तो राह कैसे जुदा हो सकती थी. अर्जन सिंह का जन्म 15 अप्रैल 1919 को पंजाब के लायलपुर (आज पाकिस्तान में) में हुआ था.
पिता रिसालदार थे, दादा रिसालदार मेजर हुकुम सिंह ने दशकों तक सेना में रहकर दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे, और परदादा सुल्तान सिंह भी जांबाज घुड़सवार सेना का हिस्सा थे. यानी अर्जन सिंह को अपनी मिट्टी और विरासत से तोहफे में मिला था. लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने भारतीय वायुसेना का दामन थाम लिया. जब उम्र खेलने-कूदने की होती है, महज 19 साल की उस उम्र में अर्जन सिंह को 'एम्पायर पायलट ट्रेनिंग कोर्स' के लिए चुन लिया गया. साल 1939 में वे बतौर पायलट ऑफिसर देश की सेवा में तैनात हो गए. साल 1964 में उन्हें 'चीफ ऑफ द एयर स्टाफ' की कमान सौंपी गई. लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी.

जब पाकिस्तान की हेकड़ी सिर्फ एक घंटे में निकाल दी
तारीख थी 1 सितंबर 1965. दोपहर के ठीक 4 बज रहे थे. रक्षा मंत्रालय का कमरा नंबर 108, साउथ ब्लॉक. उस वक्त वहां एक बेहद संवेदनशील और गुप्त बैठक चल रही थी. माहौल में भारी तनाव था. रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण, सेना प्रमुख जनरल कुमारमंगलम और एयर मार्शल अर्जन सिंह के बीच गंभीर सलाह-मशविरा चल रहा था.
असल में, पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ 'ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम' शुरू कर दिया था. उसकी सेना छंब सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ रही थी. रक्षा मंत्री चौहान ने अर्जन सिंह की आंखों में देखते हुए पूछा, "क्या वायुसेना तुरंत मदद भेज सकती है?"
अर्जन सिंह ने बिना एक पल गंवाए कहा, "सर, सिर्फ एक घंटे में." इतिहास गवाह है कि ठीक एक घंटे के भीतर पठानकोट से भारतीय लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी और पाकिस्तानी सेना के हौसले पस्त कर दिए.

पाकिस्तान की एकेडमी में लगी अर्जन सिंह की तस्वीर
साल 1965 की जंग शुरू होने से ठीक तीन दिन पहले का एक ऐसा वाकया है, जो बहुत कम लोग जानते हैं. पाकिस्तान के एयर मार्शल असगर खान और अर्जन सिंह कभी गहरे दोस्त हुआ करते थे और दोनों ने इम्फाल की जंग में साथ काम किया था. जब 'रन ऑफ कच्छ' की लड़ाई शुरू हुई, तो असगर खान ने अर्जन सिंह को एक गुप्त फोन कॉल जंग में भारतीय वायुसेना न उतारने की गुहार लगाई थी. बदले में असगर खान ने भी पाकिस्तानी वायुसेना न उतारने का भरोसा दिलाया. अर्जन सिंह ने भारतीय सरकार से बात कर इस पर सहमति जताई और दोनों देशों की वायुसेनाएं उस समय पीछे रहीं. हालांकि बाद में पाकिस्तान की सरकार ने असगर खान के इस कदम पर नाराजगी जताई थी, लेकिन यह दो सैनिकों के बीच के आपसी भरोसे की मिसाल थी.
रक्षा विशेषज्ञ पुष्पिंदर सिंह जब एक बार पाकिस्तान की रिसालपुर फ्लाइंग एकेडमी गए, तो मार्शल असगर खान ने अर्जन सिंह से उनकी एक तस्वीर मांगवाई थी. अर्जन सिंह ने अपनी तस्वीर पर दस्तखत करके उन्हें दी. आज भी वो तस्वीर सरहद पार पाकिस्तान की रिसालपुर एकेडमी में पूरे सम्मान के साथ लगी हुई है.

मार्शल असगर खान (बाएं) के साथ एयर मार्शल अर्जन सिंह.
सादगी ऐसी कि दिल जीत ले
अर्जन सिंह की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी चुंबकीय शख्सियत. लंबा-चौड़ा कद्दावर शरीर, हमेशा चेहरे पर एक रोबीली मुस्कान और बात करने का बेहद शानदार अंदाज. उनके करीबी रहे एयर वाइस मार्शल कपिल काक बताते हैं कि अर्जन सिंह को गोल्फ खेलने और बागवानी का बेहद शौक था. वे इतने मिलनसार थे कि एक अदने से फौजी को भी कभी यह महसूस नहीं होने देते थे कि वे वायुसेना के सबसे बड़े अफसर से बात कर रहे हैं. उनके दिमाग में घमंड नाम की कोई चीज नहीं थी.

इस ऐतिहासिक जीत के बाद अर्जन सिंह देश के पहले 'एयर चीफ मार्शल' बने. उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया. उनकी निस्वार्थ सेवा को सलाम करते हुए भारत सरकार ने साल 2002 में उन्हें 'मार्शल ऑफ द इंडियन एयरफोर्स' (फाइव-स्टार रैंक) के सर्वोच्च खिताब से नवाजा. वे भारतीय वायुसेना के इतिहास में इस मुकाम तक पहुंचने वाले इकलौते अधिकारी बने.
मार्शल अर्जन सिंह की याद हर हिंदुस्तानी के दिल में ताजा रहेगी. हमारे नीले आसमान को सुरक्षित रखने वाले इस महान सेनानायक के हम हमेशा ऋणी रहेंगे.
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