- चंद्रशेखर ने 28 अप्रैल, 2017 को न्यायिक अधिकारी पूनम चौधरी को कई फोन किए थे
- उसने खुद को दक्षिण भारत से उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बताया था
- अदालत ने कहा- उसका उद्देश्य अपनी जमानत से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करना था.
नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने ठग सुकेश चंद्रशेखर को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनकर एक अन्य आपराधिक मामले में जमानत की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश के मामले में आठ साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. तीस हजारी अदालत की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा ने चंद्रशेखर को भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा 170 के तहत दो साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने, धारा 189 के तहत दो साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने तथा धारा 507 के तहत चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई.
यह आदेश 29 अगस्त को आया. सोमवार को उपलब्ध हुए इस आदेश में अदालत ने कहा, ‘‘सजा से यह स्पष्ट होना चाहिए कि आपराधिक न्याय व्यवस्था एक बार किए गए सामान्य गैरकानूनी कृत्य और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज को जानबूझकर प्रभावित करने, डराने या उसमें दखल देने के लिए लगातार और सुनियोजित तरीके से किए गए कृत्यों के बीच अंतर करती है.''
तीनों सजाएं एक के बाद एक लगातार चलेंगी
अदालत ने निर्देश दिया कि तीनों सजाएं एक के बाद एक लगातार चलेंगी, जिससे कुल जेल की सजा आठ साल होगी। जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में चंद्रशेखर को एक महीने की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी. अदालत ने 20 अगस्त को चंद्रशेखर को भादंसं की धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी ठहराया था। ये धाराएं किसी अन्य व्यक्ति या पदाधिकारी का रूप धारण करने तथा धमकी देने से संबंधित हैं.
खुद को बताया था सुप्रीम कोर्ट का जज
सजा संबंधी आदेश के अनुसार, चंद्रशेखर ने 28 अप्रैल, 2017 को न्यायिक अधिकारी पूनम चौधरी को कई फोन किए थे. उसने खुद को दक्षिण भारत से उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बताया और अपने दावे को विश्वसनीय बनाने के लिए उसी क्षेत्र के लहजे में बात की. अदालत ने कहा कि उसका उद्देश्य एक अन्य आपराधिक मामले में अपनी जमानत से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करना था. अदालत ने उसके इस कृत्य को न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता पर हमला बताया.
कोर्ट ने और क्या कहा?
अदालत ने कहा, ‘‘जिस व्यक्ति का रूप धारण किया गया, उसका चयन संयोग से नहीं हुआ था.'' अदालत के मुताबिक, चंद्रशेखर ने जानबूझकर संवैधानिक पद से जुड़ी विश्वसनीयता का लाभ उठाने की कोशिश की. अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि न्यायिक अधिकारी को धोखा देने या जमानत हासिल करने में नाकाम रहने को सजा कम करने के आधार के रूप में देखा जाना चाहिए. अदालत ने कहा कि कोशिश असफल हो जाने से किसी दूसरे व्यक्ति का रूप धारण करने का कृत्य कम गंभीर या महत्वहीन नहीं हो जाता.
अदालत ने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान चंद्रशेखर ने वास्तव में अपने कृत्य पर कोई पछतावा या पश्चाताप नहीं दिखाया, बल्कि शिकायतकर्ता न्यायिक अधिकारी की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि मौजूदा तकनीकी दौर में यह मामला विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि डीपफेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार ऑडियो-वीडियो सामग्री, किसी व्यक्ति की आवाज की हूबहू नकल और फर्जी तरीके से भेजे गए संदेश या संचार का इस्तेमाल करके संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों का रूप धारण करना पहले की तुलना में कहीं अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकता है.
पहले ही हिरासत में बिताई गई अवधि का लाभ देने का निर्देश
अदालत ने कहा, ‘‘इस मामले में सुनाई जाने वाली सजा में निश्चित रूप से निवारक संदेश होना चाहिए.'' अदालत ने न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास की रक्षा करने की जरूरत पर जोर दिया. अदालत ने चंद्रशेखर के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सूची पर भी विचार किया, लेकिन कहा कि वे मामले अभी विचाराधीन हैं और उनमें कोई दोषसिद्धि नहीं हुई है. इसलिए उसकी सजा तय करते समय उन मामलों को आधार नहीं बनाया जा सकता. अदालत ने निर्देश दिया कि चंद्रशेखर को पहले ही हिरासत में बिताई गई अवधि का लाभ दिया जाए.
यह भी पढ़ें- 'जैकलीन से जलती थी नोरा फतेही, छोड़ने की करती थी गुजारिश', ठग सुकेश चंद्रशेखर ने लेटर लिख एक्ट्रेस को दी धमकी
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं