- कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद शुद्धिकरण मामले में राहुल गांधी हमलावर हैं
- कांग्रेस ने उत्तराखंड के हर थाने में भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का फैसला किया है
- राहुल गांधी ने दलित और पिछड़े वर्गों को साधने की तैयारी में हैं
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद शुद्धिकरण के मामले पर अब सियासत तेज हो गई है. इस बात को लेकर उत्तराखंड में राहुल गांधी के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कराई गई जिसके बाद दिल्ली में दिल्ली में कांग्रेस की सांसद और उत्तराखंड की प्रभारी कुमारी शैलजा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की और कहा कि 7 सितंबर को कांग्रेस इस मुद्दे पर प्रदर्शन करेगी.
कांग्रेस के नेताओं ने भी उत्तराखंड में बीजेपी नेताओं पर एफआईआर करवाने के लिए थाने थाने के चक्कर लगा रहे है और अब यह तय किया गया है कि उत्तराखंड के हर थाने में एक एफआईआर दर्ज कराई जाएगी. कांग्रेस का कहना है कि जातिगत मतभेद और सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाले किसी भी काम के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए.
तीन हफ्ते बाद क्यों बना मुद्दा?
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि खरगे की रैली के तीन हफ्ते बाद यह घटना इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन रहा है. कांग्रेस कार्यसमिति की जो बैठक 19 अगस्त को हुई थी उसमें भी कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने साथ हुए इस मामले का जिक्र किया था और यह भी कहा था कि जिस ढंग से कांग्रेस के नेताओं को खासकर कार्यसमिति के सदस्यों को यह मुद्दा उठाना चाहिए था वो नहीं किया गया.
उसके बाद राहुल गांधी 29 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं और शुद्धिकरण के मुद्दे को उठाते हैं और जिन्होंने भी यह काम किया है उस पर कार्रवाई की मांग की. मगर इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले 22 अगस्त को राहुल गांधी ने पुणे में छात्रों की गूंज प्रोग्राम में मनुस्मृति पर काफी कुछ कहा था और पुरुष प्रधान समाज पर खूब निशाना साधा.
पुणे का यह प्रोग्राम लड़कियों पर केंद्रित था जो काफी सुर्खियों में रहा. राहुल गांधी के मनुस्मृति पर दिए गए बयान पर काफी विवाद भी हुआ और अब खरगे से जुड़ा शुद्धिकरण का मामला. क्या दोनों मुद्दों में कोई संबंध हैं और क्या यह सब एक रणनीति के तहत किया जा रहा है.
जेनजी को जोड़ने की कोशिश में राहुल गांधी, चुनाव है सबसे बड़ा फैक्टर
याद कीजिए अंबेडकर ने 1927 में ही मनुस्मृति की प्रतियां जलाकर अपना विरोध जताया था, तब से लेकर अब तक मनुस्मृति पर चर्चा होती रहती है और बोलचाल में मनुवादी शब्द का खूब इस्तेमाल होता है. राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार इस शब्द का इस्तेमाल करते रहते हैं.
राहुल गांधी ने इस मुद्दे में अब जेन जी को जोड़ने की कोशिश की है. अब मनुस्मृति और शुद्धिकरण के मुद्दे का राजनीतिक विश्लेषण करते हैं. अगले साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उसमें से उत्तरप्रदेश में 403 में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व हैं और वहां बीएसपी का एक भी विधायक नहीं है, उसी तरह पंजाब की 117 सीटें में से 37 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है जबकि उत्तराखंड की 70 में से 13 सीटें रिजर्व हैं.
उसी तरह उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 17 रिजर्व सीटों में अभी बीजेपी के पास 8 और सपा के पास 7 और कांग्रेस के पास 1 और एक सीट आजाद समाज पार्टी के पास है,जबकि 2019 में उत्तरप्रदेश की 17 रिजर्व सीटों में से 14 पर बीजेपी का कब्जा था और एक सीट पर अपना दल जीती थी.
यानी उत्तरप्रदेश के दलित वोटों में सपा ने सेंध लगाई है. इसकी एक बड़ी वजह है मायावती के वोट बैंक में लगातार गिरावट. बीएसपी को 2007 विधानसभा चुनाव में जो 30 फीसदी होता था 2022 विधानसभा में घटकर 13 फीसदी रह गया जबकि 2024 लोकसभा में गिर कर 9.4 फीसदी रह गया.
कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने प्रधानमंत्री को खत लिखकर जनगणना में पिछड़ा वर्ग की जाति का कॉलम ना होने की बात लिख चुके हैं यही बात अखिलेश यादव भी कर रहे है कि किस पिछड़ी जाति की कितनी संख्या है यह जनगणना में आनी चाहिए. 1931 के बाद से देश में जाति आधारित जनगणना नहीं हुई है.
बीजेपी ने भी इस मामले में काम किया है पिछड़े वर्ग को संगठन में अधिक भागीदारी देना,मुख्यमंत्री के चयन में इसका ख्याल रखना इसके अलावा सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर के लिए 10 फीसदी का आरक्षण दिया है क्योंकि उन्हें भी पता है कि 2027 का उत्तरप्रदेश का चुनाव और 2029 का लोकसभा का चुनाव भी दलित,पिछड़ा और मनुस्मृति के मुद्दे पर लड़ने का मन विपक्ष बना रहा है.
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